Saturday, 22 June 2019

बालोद का कपिलेश्वर मंदिर समूह

बालोद का कपिलेश्वर मंदिर समूह......!


2012 में दुर्ग जिले से अलग होकर बालोद एक नया जिला बना है। बालोद जलाशयों एवं वनसंपदा से संपन्न क्षेत्र है। यहां का मुख्य कर्म कृषि है। बालोद दुर्ग से 60 किलोमीटर, धमतरी से 40 किलोमीटर एवं राजनांदगांव से 50 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है। राजधानी रायपुर से बालोद 100 किलोमीटर की दुरी पर है। 

बालोद पुरातात्विक स्मारकों के लिये भी प्रसिद्ध है। बालोद शहर के अंतिम छोर पर कपिलेश्वर मंदिर समूह है। इस मंदिर समूह में भगवान शिव, देवी दुर्गा, भगवान गणेश, भगवान कृष्ण, देवी संतोषी और राम जानकी को समर्पित छः मंदिर है। 

भगवान शंकर को समर्पित कपिलेश्वर मंदिर इनमें सबसे बड़ा मंदिर है। पूर्वाभिमुख इस मंदिर में सिर्फ गर्भगृह मात्र है। मंदिर का शिखर भी काफी उंचा है। दोनों तरफ भगवान गणेश की 6 फीट की प्रतिमायें स्थापित है। मंदिर के द्वारशाखा के दायें  और बायें तरफ गंगा यमुना और द्वारपाल की प्रतिमायें स्थापित है। 

 इन मंदिरों समुहों में दुसरा मंदिर भगवान गणेश को समर्पित है। इस मंदिर के गर्भगृह में भगवान गणेश की छ फीट की प्रतिमा स्थापित है। इस मंदिर का शिखर उपर की ओर संकरा होता गया है। मंदिर का शिखर पीड़ा देवल प्रकार में निर्मित है।  

छत्तीसगढ़ में भगवान गणेश की अनेकों प्रतिमायें मिलती है किन्तु अधिकांश प्रतिमायें खुले में या किसी मंदिर के मंडप में स्थापित प्राप्त होती है किन्तु ऐसे मंदिर बेहद की कम प्राप्त होते है जो कि सिर्फ भगवान गणेश को समर्पित है। 

भगवान राम का मंदिर गर्भगृह और मंडप में विभक्त है। इसमें भगवान राम की आधुनिक प्रतिमा स्थापित है।  भगवान कृष्ण और मां दुर्गा के पुराने मंदिरों में इनके आधुनिक प्रतिमायें स्थापित है। संतोषी माता का मंदिर इन सभी मंदिरों में सबसे छोटा है। इस मंदिर का शिखर पीड़ा देवल आकृति में बना हुआ है। मंदिरों के पास बावड़ी या तालाब बनाने की परंपरा यहां पर भी देखने को मिलती है। 

शिव मंदिर के सामने एक बावड़ी बनी हुई है।   जिसमें योद्धाओं की प्रतिमायें स्तंभों पर स्थापित  है। इन मंदिरों का निर्माण काल 15 वी -16 वी सदी माना गया है। 

मंदिरों के शिखर भाग पर नागों की आकृतियां अंकित है जिससे अनुमानित होता है कि यहां पर भी स्थानीय नागवंशी राजाओं का शासन रहा है। इनके शासन काल में ही इन मंदिरों का निर्माण माना गया है। 









बावड़ी

Tuesday, 4 June 2019

देवकर के घुघुस राजा

देवकर के घुघुस राजा......!

छत्तीसगढ़ में ऐसे बहुत से ऐतिहासिक स्थल है जिनकी जानकारी आज भी बहुत ही कम लोगों को है। ऐसा ही एक अल्पज्ञात मंदिर घुघुस राजा को समर्पित है जो कि स्थानीय आदिवासियों में नायक के तौर पर पूजे जाते है।  बेमेतरा जिले के देवकर ग्राम में घुघुस राजा का प्राचीन मंदिर स्थित है। देवकर एक छोटी कस्बाई बस्ती है। 


इस ग्राम में ही नदी के तट पर, मुख्य सड़क से अंदर की ओर यह मंदिर स्थित है। परिसर में दो छोटे मंदिर बने हुए है। मंदिर गर्भगृह एवं मंडप में विभक्त है। ये दोनों ही मंदिर अधिक पुराने नहीं है।  मंदिर के गर्भगृह में भगवान नरसिंह की प्रतिमा स्थापित है। इस खंडित प्रतिमा का मुख घिस गया है।


प्रतिमा पर सिंदूर का लेप चढ़ा हुआ है।  यहां के स्थानीय लोग भगवान नरसिंह  को आदिवासी नायक घुघुस राजा के नाम से पूजा अर्चना करते है। मंदिर के पास हनुमान जी का एक और मंदिर बना हुआ है। मंदिर परिसर में बहुत से सती स्तंभ बिखरे पड़े है। कुछ टूटी हुई प्रतिमायें भी रखी हुई है। 


छ0ग0 पुरातत्व विभाग के अनुसार ये मंदिर 17-18 वी सदी में निर्मित माने गये है। संभवत यहां के स्थानीय जमींदारों ने इन मंदिरों का निर्माण करवाया होगा। ये दोनों मंदिर छ0ग0 पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है।  कभी देवकर जाना हो तो घुघुस राजा के इस मंदिर को अवश्य दर्शन कीजियेगा। 





आदित्य नायक ने बनवाया था गुरुर का काल भैरव मंदिर

बारहवीं सदी में छत्तीसगढ़ के कल्चुरी और बस्तर के नागवंश के मित्रता और शत्रुता के काल में एक राजवंश का उदय हुआ। वह राजवंश था कांकेर क्षेत्र क...