Sunday, 31 December 2023

लोद्रवा का कलात्मक जैन मंदिर

लोद्रवा का कलात्मक जैन मंदिर

मूमल महेन्द्रा की परिणय गाथा से आलोकित लोद्रवा थार के रेगिस्तान का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है। कभी जैसलमेर के भाटी राजपूतो की राजधानी रहा लोद्रवा आज एक भव्य जैन प्रासाद के कारण सैलानियों का आकर्षण का केन्द्र है। श्रद्धा एवं आस्था का केन्द्र यह जैन मंदिर स्थापत्य कला के नये मानकों को प्रदर्शित करता है। 

किलेनुमा विशाल प्रस्तर दीवारों से घिरा यह जैन प्रासाद पंचायतन शैली में निर्मित है। मुख्य द्वार से अंदर मंदिर के सम्मुख विशाल तोरण द्वार स्थापित है जो कि विभिन्न प्रतिमाओं से सुशोभित है। इस द्वार की बारीक नक्काशियां इस बेहद खास बनाती है। मुख्य मंदिर के गर्भगृह में प्रभु पार्श्वनाथ की कसौटी पत्थर की भव्य प्रतिमा स्थापित है। मंडप के गुंबद का वितान बेहद ही अंलकृत है जिसमें पत्थर निर्मित झूमरों को लगाया गया है। 

मंदिर की बाहरी दीवारों पर छोटी छोटी जालियां बनी है जो कि मंदिर के अतुल्यनीय स्थापत्यकला को प्रदर्शित करती है। मंदिर के किनारे एक प्रस्तर अधिष्ठान पर कल्पवृक्ष की प्रतिकृति स्थापित है जहां मन की मुराद पुरी होने की मान्यता प्रचलित है। 

जैसलमेर के प्रसिद्ध पीले पत्थर से बना यह मंदिर की किसी दमकते स्वर्ण आभूषण से कम नहीं है। कला और शिल्पी दोनों का सर्वाच्च प्रतिमान इस मंदिर के स्थापत्य में प्रदर्शित होता है। इस मंदिर का निर्माण 1618 ईस्वी में थाहरूशाह भंसाली ने करवाया था। कालांतर में पुन 1971 के आसपास इस मंदिर का जीर्णाद्धार किया गया है। 

लोद्रवा का मंदिर स्थापत्य में रूचि रखने वाले सैलानियों का पसंदीदा स्थान है। जैसलमेर की यात्रा इस मंदिर के दर्शन के बिना अधुरी ही समझी जानी चाहिए। 

ओम प्रकाश सोनी

जैसलमेर दुर्ग के जैन मंदिर और तोरणद्वार

जैसलमेर दुर्ग के जैन मंदिर और तोरणद्वार 

जैसलमेर दुर्ग में कई प्राचीन जैन मंदिर बने हुए हैं। जिसमे से पार्श्वनाथ प्रभु, एवम संभवनाथ जी का मंदिर सबसे प्राचीन है। श्री पार्श्वनाथ जी का मुख्य मंदिर जैसलमेर के महारावल लक्ष्मण के राजत्वकाल में खरतरगच्छाधीश जिन राजसुरि के उपदेश से बनवाया गया था। इस मंदिर की प्रतिष्ठा 1402 ईसवी में सागर चंद्र सुरि जी के कर कमलों द्वारा करवाई गई थी। इस मंदिर का निर्माण ओसवाल वंश रांका गोत्रीय सेठ श्री जयसिंह जी ने करवाया था। उस समय इस मंदिर का नाम उस समय के महारावल लक्ष्मण के नाम से लक्ष्मण विहार था, परंतु बाद में श्री पार्श्वनाथ जी के नाम से विख्यात हुआ। इस मंदिर में कुल 1253 प्रतिमाएं हैं।

इस मंदिर के पास संभवनाथ जी का मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण 1437 में महारावल लक्ष्मण के काल में हुआ था। इस मंदिर का निर्माण श्री जिन भद्र सुरि जी के उपदेश से चोपड़ा गोत्रिय ओसवाल सेठ शिवरता, महिराज, लोला और लाखण नाम के चार भाईयो ने मिलकर कराया था। इस मंदिर में कुल 533 प्रतिमाएं हैं।

इस मंदिर के सामने शीतल नाथ जी का मंदिर है। शीतलनाथ जी की प्रतिमा अष्ट धातु की है। इस मंदिर का निर्माण 1480 में महारावल देवकरण के राज्यकाल में हुआ था। इस मंदिर का निचला हिस्सा संखलेचा गोत्रिय सेठ खेता ने करवाया था। ऊपरी भाग पिता ने अपनी बेटी वीरा के नाम पर करवाया था। बेटी ने अपने आभूषणों से प्रतिमा पर स्वर्ण परत चढ़वाया था। इसके अतिरिक्त चंद्र प्रभु स्वामी और ऋषभ देव जी के मंदिर भी बने हुए हैं।

ये मंदिर एक किले नुमा संरचना के अंदर है। मुख्य द्वार बेहद ही छोटा होना इस बात की प्रमाण है कि प्राचीन काल में शत्रुओ के आक्रमण से बचने एवम सुरक्षा की दृष्टि से मंदिरो एवम मकानों के मुख्य दरवाजे छोटे छोटे बनाए जाते थे।

लगभग छः सौ साल पुराने इन मंदिरों की स्थापत्य कला एवम इनमे स्थापित प्राचीन प्रतिमाएं देखते ही बनती है। इन मंदिरों में कुल 6600 प्रतिमाओं की पूजा प्रतिदिन होती है। मंदिरो के तोरण, गर्भगृह, शिखर और प्रदक्षिणाओ में बनी जैन एवम अन्य प्रतिमाएं शिल्पियों के श्रम और साधना के साथ साथ उच्च कोटि की कला का स्वरूप प्रस्तुत करती है। मूर्तियों की भाव भंगिमा देखते ही बनती है। मूर्तिकला के उच्च शिखर को प्राप्त इन प्रतिमाओं की तुलना कोणार्क, किराडू, खजुराहो से की जाती है।

जैसलमेर दुर्ग के अंदर ही जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ भगवान का प्राचीन मंदिर अवस्थित है। इस मंदिर के सम्मुख भव्य तोरणद्वार स्थापित है। पीले पाषाण से बना यह तोरण द्वार बेहद ही आकर्षक और कलात्मक है। अनेक मनोहारी प्रतिमाओ से सुसज्जित यह तोरण द्वार दर्शनार्थियों को आश्चर्य में डाल देता है।

तोरण के दोनो ओर देवी देवताओं की मूर्तियां हैं। नायिकाओं की सुंदर प्रतिमाएं, वादक वादनियो की नृत्य मुद्राएं, हाथी, शेर, घोड़ा, सामान्य जनजीवन और बेलबुटो की कारीगरी इस तोरण द्वार को बेहद ही आकर्षक बनाती हैं। उच्च शिखर पर ध्यान मग्न पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा स्थापित है। यह तोरण द्वार जैसलमेर दुर्ग का सर्वाधिक अलंकृत स्थापत्य है। छः सौ साल पुराना यह तोरणद्वार मरुभूमि के शिल्प का जीवंत साक्ष्य हैं।

ओम प्रकाश सोनी 

असिस्टेंट प्रोफेसर सुकमा 


संदर्भ — 1.सुनहरा नगर जैसलमेर नंदकिशोर शर्मा

2 जैसलमेर की सांस्कृतिक धरोहर डा रघुवीर सिंह भाटी

3 जैसलमेर राज्य का इतिहास मांगीलाल व्यास मयंक

रेगिस्तान का सबसे कीमती गहना है जैसलमेर

 रेगिस्तान का सबसे कीमती गहना है जैसलमेर

तालरिया मगरिया रे यह धोरा वाला देश राजस्थान आज पुरी दुनिया से आये अतिथियों को अपनी ओर लुभाता है। थार के रेगिस्तान में चटक रंगों का परिधान और बड़ी बड़ी मुछों की शान आज राजस्थान की पहचान बन चुकी है। राजस्थान के विशाल किले, राजशाही महलों और पुराने मंदिरों की विरासतें पुरे दुनिया भर के पर्यटकों का आकर्षण का केन्द्र बन चुके है।इन खूबियां को अपने में समेटे हुआ जैसलमेर राजस्थान के मरूमंडल का सबसे बेहतरीन पर्यटन स्थल है। 

जैसलमेर के त्रिकुट पहाड़ी पर बना सोनार किला की किसी सिंह की तरह आराम फरमाते हुए लगता है। महारावलों का गौरवमयी इतिहास इस किले की दीवारों पर स्वर्ण अक्षरों से सुशोभित है। पीत पाषाणों से बना सोनार किला सूर्य की किरणों को पाकर स्वर्ण की तरह चमक उठता है और सारे जैसलमेर में स्वर्ण आभा बिखर जाती है। 

किले के आसपास बनी हवेलियां मरूभूमि के स्थापत्य की सबसे शानदार उदाहरण है। जैसलमेर की पटवों की हवेलियों की नक्काशी, कला के सर्वोच्च स्तर को प्रदर्शित करती है। सुंदर गवाक्षों, बारिक जालीदार खिड़कियों और झरोखों से सुसज्जित जैसलमेर हवेलियों का शहर है। यहां की हवेलियां अपने आप में जीवंत संग्रहालय है। इन हवेलियों में सेठ साहुकारों के द्वारा उपयोग की जाने वाली दुर्लभ वस्तुओं का संग्रह राजस्थान की समृद्धि को दर्शाता है। 

किले मे बने जैन मंदिरों की स्थापत्यकला और मूर्तिकला इतनी बेजोड़ है कि पर्यटक को पूर्ण विश्वास हो जाता कि इनका निर्माण तो निश्चित ही देवशिल्पियों ने किया है। पत्थरों पर की गई सोने सी कारीगरी के कारण ही पाषाण का काम सोने से भी महंगा माना जाता है और उन प्रतिमाओं पर अंकित सुत्रधारों के नाम गुम हुए शिल्पकारों को उनकी सही पहचान दिलाती है। इन जैन मंदिरों में मूर्तियां इतनी है जितनी कहीं के सौ मंदिरो में भी नहीं है। सभी प्रतिमाओं में शिल्पकारों की कला का सबसे उच्च स्तर देखने को मिलता है। 

किले में आज भी लोक गायक दपू खां की आवाज कहीं न कहीं से सुनाई पड़ती है। दपू खान साहब ने ही अपनी गायकी से मूमल महेन्द्रा की अमर प्रेम कथा को जग भर में पहुंचाया है। आज भले दपू खान साहब इस दुनिया से रूखसत हो गये किन्तु उनकी आवाज आज भी जैसलमेर के किले में गूंजती रहती है। जल बिन सब सून, इस कहावत पर अमल करते हुए, जैसलमेर के महारावलों ने रेगिस्तान में जल के महत्व को भली भांति समझा, तभी तो उन्होने गड़सीसर तालाब खुदवाया और जैसलमेर की प्रजा की जलापूर्ति की समस्या का स्थायी समाधान किया। गडसीसर में बना टीलो की पोल समाज कल्याण के भाव को दर्शाता है जो रियासत काल में एक गणिका द्वारा बनवाया गया था। 

जैसलेमर की बसाहट से कुछ दुर पर स्थित बड़ा बाग की सुनहरी छतरियां रेगिस्तान की तपन में हीरे की भांति चमकती प्रतीत होती है। उत्कृष्ट नक्काशियों से परिपूर्ण ये छतरियां महारावलों का स्मृति संग्रहालय है। महारावलों का यह खूबसूरत श्मशान प्रस्तर कला का सबसे बड़ा अजायबघर है। छतरियों का इतना विशाल स्मृति संसार शायद ही कहीं देखने को मिले। बड़ा बाग की छतरियों की कला को निहार कर जब पर्यटक कुलधरा के उस पुरानी बस्ती का रूख करता है तो उसे महसूस होता है कि पालीवालों ने रेगिस्तान के बीचों बीच कितनी सुंदर नगरी बसाई थी। 

दशकों से जनशून्य हो चुका कुलधरा का गांव आज पर्यटकों से सर्वाधिक गुलजार नजर आता है। जैसलमेर से कुलधरा के समानांतर बसा लोद्रवा मूमल महेन्द्र की प्रेमकहानी का गवाह है। अमरकोट के राणा महेन्द्र और लुदरवे की मूमल की प्रेम कहानी गांव के कण कण में रची बसी है। यहां का जैन मंदिर की वास्तु शिल्प की अदभूत कारीगरी पर्यटकों को घंटो निहारने को विवश कर देती है। मंदिर में लगा इच्छापूर्ति करने वाला कल्पतरू के नीचे जाते ही आगतुंक अपनी अभिलाषा को पूर्ण करने का वरदान मांगता नजर आता है। 

लोद्रवा से प्रारंभ होते रेत के धोरे सीधे सम की ओर ले जाते है। बालू के विशाल टीलो पर उछल कुद करती गाड़ियां और रेगिस्तान के जहाज पर शानदार सफर हर पर्यटक का सपना होता है। उंट की सवारी का असली आनंद तो रेत को धोरों पर ही मिलता है और यह शौक सम के सिवाय शायद ही कहीं पुरा हो पाता है। रात्रि को कालबेलियां नृत्य करती महिलाओं का नृत्य देख हर मन थिरक उठता है। इतनी सारी खूबियों से परिपूर्ण जगह सिर्फ और सिर्फ जैसलमेर ही हो सकता है जहां का हर कोना, हर इंसान और वो इमारत आपका खुशियों से स्वागत करती है जैसा स्वागत सत्कार बिरले ही नसीब होता है।  

आज जैसलमेर के 867 वे स्थापना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

ओम प्रकाश सोनी 

असिस्टेंट प्रोफेसर सुकमा 


जैसलमेर में श्री राम की दुर्लभ प्रतिमा

जैसलमेर में श्री राम की दुर्लभ प्रतिमा

जैसलमेर दुर्ग संग्रहालय के मूर्ति कक्ष में भगवन श्री राम की बेहद ही दुर्लभ और विस्मयकारी प्रतिमा रखी हुई है। भगवान श्री राम की यह प्रतिमा पूरे विश्व में सबसे अलग है क्योंकि इस प्रतिमा में श्री राम को दाढ़ी मूंछ में प्रदर्शित किया गया है। श्री राम का ऐसा स्वरूप किसी भी अन्य प्रतिमा या चित्र मे देखने को नहीं मिलता है। 

श्री राम की छवि जनमानस में किसी नवयुवक सुकुमार की रची बसी है। बड़ी सी दाढ़ी और मूंछो से सुशोभित श्री राम की यह छवि बेहद ही कौतूहल उत्पन्न करती है। मूर्तिकार के द्वारा प्रतिमा में श्री राम को इस छवि में प्रदर्शित करने का उद्देश्य मुझे यह जान पड़ता है कि श्री राम जब सीता की खोज में थे तब उस समय सीता को पाने के लिए उनकी स्थिति इस तरह सी हो गई थी और दूसरा कारण यह हो सकता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को तत्कालीन राजपूत राजाओ का स्वरूप दिया गया इसीलिए उन्हें दाढ़ी मूंछ में दिखाया गया।

जैसलमेर के जिला संग्रहालय में भी भगवान श्री राम की ऐसी ही एक और प्रतिमा रखी हुई है जिसमें भी राम को दाढ़ी मूछ में दिखाया गया, काले प्रस्तर की वह प्रतिमा खंडित है। इस प्रकार श्री राम की दोनो प्रतिमा बेहद ही आकर्षक और दुर्लभ है। इस प्रतिमा का निर्माण काल पंद्रहवीं सदी है।

श्री राम की यह प्रतिमा मंदिर के शिल्पियों ने जैसलमेर के महारावल को भेंट की थी क्योंकि जैसलमेर में जब भी किसी नये मंदिर का निर्माण किया जाता था तो महारावल को एक उत्कृष्ट प्रतिमा शिल्पियों द्वारा भेंट दी जाती थी।

ओम प्रकाश सोनी

असिस्टेंट प्रोफेसर सुकमा 

कलात्मक छतरियों का संग्रहालय — जैसलमेर का बड़ा बाग

कलात्मक छतरियों का संग्रहालय — जैसलमेर का बड़ा बाग

जैसलमेर पर राज करने वाले महारावलों ने अपने जीवन काल में भव्य सोनार किले का निर्माण बहुत ही उत्तम कारीगरी से करवाया और आज जैसलमेर वास्तुकला एक विचित्र भंडार बन गया है। महारावलो ने अपने स्वर्णिम इतिहास को मृत्यु उपरांत भी छतरियों में संजो रखा है यह एक अद्भुत उपलब्धि है।

जैसलमेर से कुछ दूरी पर स्थित बड़ा बाग एक बेहद ही खूबसूरत एतिहासिक स्मारक है। पहाड़ी पर बने ये सुनहरे स्मारक बेहद ही आकर्षक है। जैसलमेर राजपरिवार की समाधियों का अजायबघर बड़ा बाग एक खुबसूरत शमशान स्थल है। छतरियों में लगे पीले पत्थरो की अद्भुत नक्काशियो को देखकर पर्यटक अचरज से भर जाता है कि शमशान भी भला क्या इतना खूबसूरत हो सकता है।

बड़ा बाग में छोटी मोटी कुल 107 छतरियां है। 1528 में जैसलमेर के 18 वे महारावल जैतसिंह द्वारा दो पहाड़ों के बीच एक बांध बनवा रहे तब उनका देहांत हो गया। इनके पुत्र महारावल लूणकरण ने अपने पिता का उसी पहाड़ी पर अंतिम संस्कार कर छतरी बनवाई और उसमे उनकी मूर्ति स्थापित कर दी। जैतबंध का निर्माण भी पुरा कराया गया। वह बांध आज पर्यंत मौजूद हैं। जैसलमेर के महारावल जैतसिंह की छतरी 1528 ईस्वी में पहली बार जिस पहाड़ी पर बनी थीं तब से लेकर आज पर्यंत तक जैसलमेर के राजपरिवार के सदस्यों का अंतिम संस्कार यहीं होता आया है। 

ये छतरियां पैगोड़ा शैली और मुगल शैली में बनी है। पत्थरों पर बारीक खुदाई और कलाकृतियां इन छतरियो को वास्तुकला का शानदार उदाहरण बनाती है। बड़ा बाग की छतरियां किसी भी मुगल मकबरे से कहीं अधिक आकर्षक है। छतरियों के गुम्बद, उसमे लगी प्राचीन प्रतिमाएं, पत्थरो की बारीक जालियां बड़ा बाग को वास्तुकला का संग्रहालय निरूपित करती है।

बड़ा बाग की छतरियां जैसलमेर आए प्रत्येक पर्यटक के लिए सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र है। आप जैसलमेर आएं और बड़ा बाग की छतरियों को ना देखे तो आपकी जैसलमेर यात्रा अधूरी ही समझो।

ओम प्रकाश सोनी

असिस्टेंट प्रोफेसर सुकमा 

जैसलमेर के सोनार किले का इतिहास

जैसलमेर के सोनार किले का इतिहास 

जैसलमेर एक गौरवशाली ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाला राजस्थान का एक महत्वपूर्ण नगर है। बारहवी सदी में महारावल जैसलदेव ने इस नगर की स्थापना की थी। पश्चिमी सीमा पर बसा यह नगर लगभग आठ सौ सालों तक राजस्थान राज्य का ही नही अपितु समूचे भारत के सीमान्त प्रहरी के रूप में विख्यात रहा है। 

जैसलमेर के पुराने नामों में वल्लमंडल और माड मिलता है। माड नाम अधिक विख्यात है। इस क्षेत्र के लिये माडधरा का विशेषण प्रयुक्त होता है। बस्तर में अबूझमाड़ियों का निवास क्षेत्र अबूझमाड कहलाता है। घने वनों से आच्छादित एवं दुर्गम भौगोलिक विषमताओं के कारण आसानी से वापस आना संभव नहीं है उसी प्रकार रेत के इस विशाल थार को माडधरा संबोधित किया जाता है। दुर दुर फैले रेत के टीले और घने वनों का अबूझमाड़ दोनों ही क्षेत्र अति कष्टदायक है। माड़धरा की बेटी माडेची और बेटा माडेचा कहलाता है। यहां के लोक संसार में महेन्द्र मूमल की प्रेमकहानी ऐसी रची बसी है कि लोकगीतों में मूमल के लिये माडेची शब्द ही आता है :-

म्हारी माडेची मूमल

हालैनी अमरांणै रे देस

जैसलमेर के शुष्क भौगोलिक परिवेश ने स्थानीय जनजीवन को अत्यधिक कठोर बना दिया है। स्थानीय लोग कठोर परिस्थितियों का सामना करते हुए साहसी हो गए है। इन लोगों के साहस से ही इस राज्य को कालान्तर में उत्तर भिड़ किवाड़ के नाम से पुकारा जाने लगा। भाटी राजपूतों की कीर्ति गाथा की गवाह यह माडधरा अपने गौरवशाली इतिहास और उनके मूक गवाह किलो और मंदिरों को संजोये हुए है। जैसलमेर क्षेत्र पर इन्ही भाटी राजपूतों का शासन रहा है। इसी वंश के चंद्रवंशी यादव रावल भाटी जैसल ने 1156 ई में जैसलमेर नगर तथा दुर्ग की स्थापना की थी। 

राजा जैसल के नाम एवं मेरू (पहाड़) पर स्थित होने के कारण इसे जैसलमेरू या जैसलमेर कहते है। मेरू तीन कोनों की होने के कारण इसे त्रिकुटगढ़ भी कहते है। स्वर्ण की तरह पीले पाषाणों से निर्मित यह कलापूर्ण नगर आज विश्व के पर्यटन मानचित्र पर तीव्र गति से उभर आया है। जैसलमेर दुर्ग के पीले पत्थर प्रातकाल की किरणों में सोने सा चमक उठते हैं जिसके कारण इसे सोनार किला कहा गया है। यह सोनार किला मरुभूमि के शीश पर स्वर्ण मुकुट सा सुशोभित है। रावल जैसलदेव के बाद रावल शालिवाहन और मूलराज जयंत सिंह के काल तक दुर्ग का विकास होता रहा।

वर्तमान जैसलमेर शहर के मध्य 250 फीट की त्रिकोण पहाड़ी पर जैसलमेर दुर्ग स्थित है। 99 गोलाकार बुर्ज तथा बलखाते सांप की तरह बनी हुई बुर्जाकार दीवारों के उपर विशाल बेलनाकार व गोल गोल पत्थर रखे हुए है जो उस युग में दुर्ग की रक्षा हेतु हथियार के रूप में काम आते थे। दुर्ग के चार मुख्य दरवाजे है जिसमें प्रथम अखेपोल सन 1722 से 1761 के मध्य उस समय की आवश्यकतानुसार इस बनाया गया। दुसरी सूरजपोल, तीसरी गणेश एवं चौथा हवापोल जिसे महारावल भीम ने 1577 से 1613 में अपने शासनकाल में बनवाया था।

दुर्ग जैसलमेर के विशाल पीले चट्टानों से बना है। इसमें कहीं भी चुने एवं सीमेंट का उपयोग नहीं किया गया है। दुर्ग का निर्माण इस तरह से किया गया है कि दूर से आने वाले शत्रु को उसका प्रवेश द्वार दिखाई नहीं देता है। सूरजपोल के आगे वेरिसाल बुर्ज बना कर दुश्मन को दुर्ग का मुख्य द्वार खोजने हेतु बाध्य करना अपने आप में अनूठी बात है। इस भव्य दुर्ग का निर्माण भिन्न भिन्न चरणो में हुआ है।

बारहवी से चौदहवी सदी तक जैसलमेर पर अलाउद्दीन खिलजी और तुगलक सुलतानों ने हमले किये थे। दुर्ग में बने मंदिरों एवम भवनों को तोड़ दिया गया था। इन आक्रमणों के बाद दुर्ग पर मुसलमानों का अधिकार हो गया था।मुगलों के साथ जैसलमेर के शासकों के संबंध मधुर थे जिसके कारण यहां शांति छाई रही फलस्वरूप दुर्ग में कई मंदिरों एवम भवनों का पुन निर्माण हुआ। 

ओम प्रकाश सोनी 

असिस्टेंट प्रोफेसर सुकमा 

संदर्भ पुस्तके 

1 जैसलमेर राज्य का सामाजिक इतिहास — डा मेघाराम गढ़वीर

2. जैसलमेर की सांस्कृतिक धरोहर — डा रघुवीर सिंह भाटी

3. जैसलमेर की हवेलियां — नंद किशोर शर्मा

4. सुनहरा नगर जैसलमेर — नंद किशोर शर्मा

भागवत धर्म के साक्ष्य का प्राचीन अभिलेख घोसुंडी शिलालेख

भागवत धर्म के साक्ष्य का प्राचीन अभिलेख घोसुंडी शिलालेख।

भाषा लिपि व उत्कीर्णन की दृष्टि से यह शिलालेख भारतीय अभिलेखो में बड़ा महत्त्वपूर्ण है। इसे घोसुंडी के लेख के नाम से भी कहा गया है। इस लेख को सबसे पहले कविराजा श्यामल दास ने प्रकाशित कराया था। इस शिलालेख के प्रकाशन के संबंध मे सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य इसके कई टुकड़ों को मिलाकर संशोधित पाठ प्रस्तुत करना। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के बस्सी और घोसुंडी गांव की सीमा पर एक टुकड़ा मिला था। 

इन टुकड़ों को मिलाकर श्री गौरीशंकर हीराचंद ओझा और हलद्वार ने संशोधित पाठ प्रस्तुत किया। इसके बाद डी आर भंडारकर ने सब टुकड़ों के पाठों को प्रस्तुत करते हुए एपिग्राफिका इण्डिका भाग 22 में विस्तृत लेख लिखा।  डी आर भंडारकर जी ने इस अभिलेख का समय 350 ईसा पूर्व माना है वहीं काशी प्रसाद जायसवाल ने इसकी तुलना खारवेल के लेख से तुलना करते हुए 200 से 150 ईसा पूर्व माना है।(संदर्भ चितौड़गढ़ का इतिहास डा श्री कृष्ण जुगनू)

इस लेख की लिपि ब्राह्मी और भाषा संस्कृत है। यह अभिलेख  बेहद महत्त्वपूर्ण है इसलिए है कि ईसा पूर्व दूसरी तीसरी सदी में भागवत धर्म के अंतर्गत भगवन वासुदेव और संकर्षण की पूजा का उल्लेख है।

पहले लेख में तीन पंक्तियां हैं। इसमें उल्लेखित है भगवान् वासुदेव और संकर्षण के पूजा के निमित्त एक पत्थरों का घेरा (नारायण वाटिका) बनवाया गया था। इसमें किसी राजा जो सर्वतात गजायन  के मध्य किसी राजा का नाम होना चाहिए था के द्वारा अश्वमेघ यज्ञ किया गया था। यह परकोटा मंदिर निर्माण का पहला नमूना माना गया है।

वर्तमान में यह अभिलेख शासकीय संग्रहालय उदयपुर राजस्थान में स्थित है।


ओम प्रकाश सोनी

असिस्टेंट प्रोफेसर सुकमा 

बिजोलिया का मंदाकिनी मंदिर समूह

बिजोलिया का मंदाकिनी मंदिर समूह

राजस्थान का बिजोलिया धार्मिक और ऐतिहासिक रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण स्थल है। विशेष तौर यह जैन धर्मावलंबियो के लिए आस्था का मुख्य केंद्र भी है क्योंकि यहां के ग्यारहवीं सदी के अभिलेख अनुसार भगवान पार्श्वनाथ ने बिजोलिया में ही एक धावड़े के पेड़ के तले घोर तप कर कैवल्य प्राप्त किया था। बिजोलिया प्रतिहार परमार और चौहान शासकों की भूमि रही है। इतिहास में बिजोलिया चौहान के प्रसिद्ध वंशावली अभिलेखो के लिए विख्यात है। 

परमार और चौहानों के काल में  निर्मित मंदाकिनी मंदिर समूह और कुंड के कारण बिजोलिया का पुरातात्विक महत्त्व बढ़ जाता है। यहां नगर के मध्य एक किला भी मौजूद है जो ढहने की कगार पर है। बिजोलिया किसान आंदोलन और विजय सिंह पथिक द्वारा अंग्रेजों को धूल चटाने की वीरतापूर्ण गाथा से अधिक आलोकित है। भीलवाड़ा जिले में बिजोलिया के मुख्य आकर्षण पुरातात्विक मंदाकिनी मंदिर समूह है जो कला स्थापत्य के आकर्षण केंद्र है।

मंदाकिनी मंदिर समूह में सबसे मुख्य मंदिर महाकाल वैद्यनाथ मंदिर है। नागर शैली में निर्मित यह देवालय दो गर्भगृह और संयुक्त सभा मंडप युक्त विशाल शिव मंदिर है। इसमें पश्चिम मुखी गर्भगृह महाकाल को और दक्षिण मुखी गर्भगृह वैद्यनाथ को समर्पित है। सभामंडप में ही एक अधूरी नंदी प्रतिमा रखी हुई है। किनारे नीचे की तरफ एक कुआं बना हुआ जिसमे उतरने के लिए सीढ़ियां बनी हुई है। मंदिर का शिखर आमलक कलश बिजपूरित से शोभित है। मंदिर की ताकों पर विभिन्न देवी देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित है।

इस मंदिर के दक्षिण में ताराकृति में बना हजारेश्वर मंदिर है। पूर्वाभिमुख  यह मंदिर मंडप अंतराल और गर्भगृह में विभक्त है। गर्भगृह में सहस्त्रलिंग स्थापित है जिसके कारण इसे हजारेश्वर मंदिर कहा जाता है। मंदिर का शिखर उरूश्रृंग, आमलक कलश बिजपूरित से शोभित है। यह मंदिर इन मंदिरों में सबसे आकर्षक है।

इन मंदिरों के समूह के मध्य में एक विशाल कुंड है जिसे मंदाकिनी कुंड कहा जाता हैं। इस कुंड में उत्तर पूर्व और पश्चिम से प्रवेश करने के लिए सीढ़ियां बनी हुई है। दक्षिण में एक अलंकृत चबूतरा बना हुआ है। इस कुंड में विभिन्न प्रकार धार्मिक उत्सव आयोजित किए जाते रहे हैं। इस कुंड में तीर्थयात्रियों के विभिन्न लेख खुदे हुए हैं।

इन सभी मंदिरों में पीछे की तरफ उंडेश्वर महादेव मंदिर है। यह मंदिर भूमिज शैली में निर्मित है। देवालय गर्भगृह, अंतराल और मंडप में बंटा हुआ है। यह मंदिर पश्चिममुखी और ताराकृति में बना हुआ है। मंदिर के मंडप के मध्य वर्गाकार आधार है। जो चारो तरफ मकर तोरण द्वार से सज्जित है। इसके सभा मंडप का शिखर काफी प्रभावी है जिसमे तीनो तरफ चौकोर स्तंभों पर आधारित छतरियां बनी हुई है। इन सारे मंदिर और कुंड में विभिन्न देवी देवताओं, अप्सराओ, नृत्यांगना, वादक दल आदि की दुर्लभ प्रतिमाएं जड़ी हुई।

मंदाकिनी मंदिर समूह में उंडेश्वर महादेव मंदिर को छोड़कर शेष ग्यारहवीं सदी में निर्मित अनुमानित है जबकि यह बारहवीं सदी में निर्मित माना गया है। अधिकांश विद्वान बिजोलिया के इन मंदिरों के चौहान शासकों के काल में निर्मित मानते हैं। जबकि ये मंदिर बिजोलिया में चौहान शासकों के अधिकार में आने से पूर्व निर्मित हो चुके थे। इसका प्रमाण चौहान शासकों का प्रथम बिजोलिया अभिलेख विक्रम संवत 1226 में बिजोलिया के महाकाल, हजारेश्वर और मंदाकिनी कुंड का उल्लेख मिलता है। 

अत: चौहानों के अधिकार में आने से पूर्व ही बिजोलिया में ये मंदिर बन चुके थे। हालांकि इन मंदिरों में ऐसे कोई स्पष्ट अभिलेख नही मिले हैं ये सारे मंदिर किसने बनवाए?चौहान शासकों से पूर्व इस क्षेत्र में परमार शासकों का शासन रहा। चितौड़ में परमार भोज और नरवर्मा के अभिलेख इसकी पुष्टि करते हैं। चितौड़, मेनाल और बिजोलिया के मंदिर मालवा के भूमिज शैली और शिखर पर शुकनास और उरूश्रृंग आदि का अलंकरण इन मन्दिरों को परमारो के काल में निर्मित होने का आभास कराते हैं।


ओम प्रकाश सोनी

असिस्टेंट प्रोफेसर सुकमा 

स्थापत्य और प्राकृतिक सौंदर्य का मिलन स्थल - किराड़ू

स्थापत्य और प्राकृतिक सौंदर्य का मिलन स्थल - किराड़ू

दसवी सदी में मालवा में परमारों की सत्ता अपने चरम पर थी। परमार सम्राट वाकपति मूंज ने अपने बाहूबल से परमारों की सत्ता कई राज्यों में स्थापित की। नये विजित राज्यों में परमार राजकुमारों को अधिपति बनाकर शासन स्थापित किया। वाकपति मूंज ने अपने अनुज सिंधुराज के पुत्र दुसल को मरूमंडल के भीनमाल का प्रशासन सौंपा जिसके आधिपत्य का विस्तार पश्चिम में बाड़मेर तक था। वर्तमान राजस्थान के बाड़मेर जिले के किराड़ू में आज भी परमार राजाओं के बनाये भव्य देवालय एवं अभिलेख प्राप्त होते है। 

किराड़ू के मंदिर पूरे भारत में पूर्व मध्यकाल की स्थापत्य एवं मूर्तिकला के कारण महत्वपूर्ण स्थान रखते है। मोतियों की माला की तरह सुशोभित पर्वतमालाओं से घिरा किराड़ू एक खूबसूरत ऐतिहासिक स्थल है। पहाड़ों की तराई में स्थापित देवालयों के कारण यह क्षेत्र ऐतिहासिक एवं प्राकृतिक खूबसूरती का अनूठा संगम स्थल है। 

इन मंदिरों की कलाकृतियां अपने अतीत की कहानियां कहती नजर आती है। प्राचीन मान्यताओ के अनुसार यहां पर परमारों के द्वारा कुल 24 मंदिरों का निर्माण कराया गया था किन्तु आज सिर्फ पांच मंदिर ही शेष है। गुर्जर मारू शैली में निर्मित ये देवालय चालुक्य स्थापत्य कला के सर्वोत्तम उदाहरण है। मारू गुर्जर शैली मरूदेश और गुजरात में प्रचलित शैलियों का सम्मिश्रण है। इन मंदिरों का निर्माण ग्यारहवी बारहवी सदी में निर्मित माना गया है। 

किराड़ू के इन पांच मंदिरो में चार शैव तथा एक वैष्णव धर्म से संबंधित है। इन मंदिरो में दो मुख्य मंदिर मंडप अंतराल और गर्भगृह योजना में निर्मित है। जिनमें से सुरक्षित मंदिर सोमेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है। वहीं दुसरा मंदिर विष्णु मंदिर है जिसका सिर्फ गोलाकार मंडप ही सुरक्षित है। अन्य तीन छोटे शिव मंदिरों में सिर्फ गर्भगृह ही मात्र शेष है। 

किराड़ू मंदिर समूह में सोमेश्वर मंदिर वर्तमान मे लगभग सुरक्षित अवस्था में है। इस मंदिर की वास्तुकला दर्शनीय है। यह मंदिर उंची जगती पर स्थापित है। मंदिर की वास्तुयोजना में गोलाकार सभामंडप, अंतराल एवं गर्भगृह का समावेश है। सभामंडप अंदर अलंकृत स्तंभों की गोलाकार श्रृंखला है। इन स्तंभों पर बनाई गई कलाकृतियों के देखकर आभास होता है कि पूर्व मध्यकाल में भारतीय शिल्पकला की अपने चरम पर थी।

पत्थरों पर इतनी बारीक खुदाई कर विभिन्न मूर्तियां एवं ज्यामिती आकृतियां बनाई गई कि दांतो तले उंगलियां दबा ली जाये। यह ऐसा कि प्रतीत होता है कि स्वर्णकार जैसे सोने के सुंदर आभूषणों पर नक्काशी करता है वैसे ही शिल्पियों ने भी पत्थरों पर स्वर्णकार की तरह नक्काशी कर अपनी कला की कुशलता का परिचय दिया हो। 

गर्भगृह का प्रवेश द्वार सर्वाधिक अलंकृत है। देवी देवताओं की छोटी छोटी प्रतिमाओं से सुशोभित द्वार मंदिर का मुख्य आकर्षण है। यह कारीगरों की कुशलता के परिणाम है आज भले ही उनके नाम भूला दिये गये है किन्तु पत्थरों पर किये उनके हस्ताक्षर और उनकी यह कला सदा के लिये उन्हे अमर कर गई।किराड़ू मंदिर समूहों के सारे मंदिरों के शिखर श्रृंग एवं उरूश्रृंगों से सुसज्जित किये गये है जो कि गुर्जर शैली को प्रदर्शित करती है। 

किराडू मंदिर समूह देवप्रतिमाओं के किसी विशाल संग्रहालय समान है। इन मंदिरों के गर्भगृह आज भले ही प्रतिमाविहिन है किन्तु बाहरी दीवारों सैकड़ों प्रतिमाओं से सुसज्जित है। यहां की प्रतिमायें आकार में छोटी, सौम्य, जीवंत एवं आध्यात्मिक भावों को लिये हुए प्रदर्शित है। मूर्तियां विभिन्न आभूषणों एवं वस्त्रों से अलंकृत की गई है जिससे इनके प्रति आकर्षण एवं अनुराग उत्पन्न होता है। प्रतिमायें इतनी सजीव बनाई गई है कि लगता है कि बस अब बोल उठेगी। शिल्प और सौंदर्य का समागम ही किराड़ू की आज विशेषता बन गई है। 

किराड़ू के मंदिरों में शिव विष्णु ब्रम्हा, हरिहर, गणेश, कुबेर, सूर्य, महिषासुरमर्दिनी, अष्ट दिकपाल, अप्सरायें, धार्मिक एवं तत्कालीन सामाजिक जीवन का अंकन किया गया है। धार्मिक कथाओं में रामायण महाभारत एवं कृष्णलीलाओं का अंकन किया गया है। कृष्ण लीला में वृषभासुर वध, केशी वध, पूतना वध, गोवर्धनधारण आदि दृश्यों का अंकन है। रामायण दिग्दर्शन में सप्त साल भेदन, सुग्रीव संभाषण, सुग्रीव बाली युद्ध, सेतु निर्माण, राम रावण युद्ध, लक्ष्मण का मूर्च्छित होना, लक्ष्मण का उपचार आदि दृश्य सज्जित है। महाभारत में शर शैया पर भीष्म का सुंदर अंकन है। 

समाजिक जनजीवन में अपसराओं का नृत्य, वादक दल, शैव साधू, कुम्हार द्वारा मटके बनाना, सुरापान करते युवक, गायों का चारा खिलाना, जानवरों का शिकार, युद्ध-आक्रमण, एवं मैथुन दृश्यों को भी स्थान दिया गया है। मैथून प्रतिमाओं के कारण किराड़ू बाडमेर का खजुराहो कहलाता है। 

इन मंदिरों में परमारों एवं चौहान सामंतो के अभिलेख भी जड़े हुए है। ये अभिलेख परमारों के इतिहास और गुजरात के चालुक्यों के साथ उनके संबंधों के बारे मे जानकारी देते है। सबसे पहला अभिलेख सन 1153 ई में चौहान सामंत अल्हणदेव का है। इस अभिलेख में चालुक्य शासक कुमारपाल का उल्लेख है। किराड़ू तत्कालीन समय में चालुक्य कुमारपाल के अधीनस्थ था। इसी अभिलेख में किराड़ू के प्राचीन नाम किरातकुप का लेख है। 

दूसरा अभिलेख 1161 ई में परमार सामंत सोमेश्वर देव का है। किराड़ू परमारों का शासन क्षेत्र था किन्तु चालुक्य कुमारपाल के अधीनस्थ होने के कारण परमार मांडलिक के तौर पर ही शासन संभालने लग गये थे। सोमेश्वर परमार ने अपने स्वामीभक्ति का परिचय देते हुए कुमारपाल से पुनः अपने राज्य को प्राप्त कर लिया था। मांडलिक सोमेश्वर के अभिलेख में परमारों की वंशावली उल्लेखित है जिसमें इनके आदिपुरूष सिन्धुराज से लेकर दूसल, देवराज धंधूक एवं उसके पितामह सोछराज एवं पिता उदयराज का उल्लेख है। 

इस अभिलेख के अनुसार सोमेश्वर देव ने किराड़ू के सोमेश्वर मंदिर का प्राण प्रतिष्ठा चालुक्य कुमारपाल से करवा कर किरातकूप और शिवकुप में चिरकाल तक क्षात्रधर्म का पालन किया था। इस मंदिर का तीसरा अभिलेख सन 1178 ई में सामंत मदन ब्रहादेव का है जिसमें उसके मंत्री तेजपाल की पत्नी अनुपमा देवी द्वारा तुरूष्को द्वारा भग्न इस मंदिर में पुनः शिव की प्रतिमा स्थापित करने का उल्लेख है।(संदर्भ परमार राजवंश का इतिहास - डी0सी0 गांगुली )

किराड़ू के मंदिर से आज भी कई रहस्य जुड़े है। परमारों की इस समृद्ध नगरी के उजाड़ होने के पीछे एक साधू का श्राप भी उत्तरदायी माना गया है। वैसे इन मंदिरों को मोहम्मद गौरी और उसकी सेना ने नष्ट किया था जिसके संकेत 1178 के किराडू अभिलेख में ही मिलता है। किराड़ू के ये शानदार मंदिर राजस्थान के बाडमेर जिले में अवस्थित है। बाड़मेर शहर से 40 किलोमीटर की दुरी पर हाथमा गांव के पास ही किराड़ू में पहाड़ियों के मनभावन दृश्यों से सज्जित परिवेश ये मंदिर अवस्थित है। मरू गुर्जर शैली के इन मंदिरों में शिल्प स्थापत्य के उन्नत आयाम शोधार्थियां एवं पर्यटकों के लिये किसी कौतुहल से कम नहीं है।

ओमप्रकाश सोनी

असिस्टेंट प्रोफेसर सुकमा 



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