Sunday, 20 October 2019

उज्जैन का उपेक्षित पर्यटन स्थल - रूमी का मकबरा

उज्जैन का उपेक्षित पर्यटन स्थल - रूमी का मकबरा

महाकाल की नगरी उज्जैन पुरे विश्व में धार्मिक नगरी के रूप में विश्वप्रसिद्ध है। उज्जैन के बीचों बीच में स्थित भगवान महाकाल का ऐतिहासिक मंदिर। हजारों साल पुराना यह मंदिर भारत के 12 ज्योर्तिलिंग में से एक है। इसके अतिरिक्त उज्जैन में अनेक धार्मिक स्थल है जिनका भी अपना महत्व है।
भैरूबाबा, मंगलनाथ मंदिर, देवी मां का शक्तिपीठ, विक्रमादित्य टीला आदि प्रमुख है। देश विदेश से हजारों श्रद्धालु उज्जैन में आकर इन धार्मिक स्थानों के दर्शन कर पूण्य लाभ अर्जित करते है।उज्जैन में धार्मिक स्थलों के अलावा कुछ प्रमुख पर्यटन स्थल भी है जहां पर पर्यटकों का आना जाना लगा रहता है। इन पर्यटन स्थलों में जंतर मंतर, क्षिप्रा का तट, म्युजियम आदि है।इन सभी धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों के बीच उज्जैन के एक कोने में स्थित रूमी का मकबरा आज भी अपनी पहचान के लिये मोहताज है।
जंगल झाड़ियों से घिरे एवं एक उंचे से टीले पर स्थित यह ऐतिहासिक ईमारत भर्तहरि गुफा के कुछ दुरी पर ही बनी हुई है।हैरानी की बात तो यह है कि दिन भर श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लाने जाने वाले, आटो वाले भी इस प्राचीन मकबरे से अधिक परिचित नहीं है।

मुख्य सड़क से कुछ दुरी पर , एक उंचे टीले पर यह मकबरा बना हुआ है। यहां तक जाने के लिये ना ही कोई मार्ग है और ना ही कोई दिशासूचक है। आसपास बने कुछ घरों से होते हुए, टीले की चढ़ाई कर मकबरे तक पहुंचा जा सकता है।पठारी टीले पर हरे भरे खेतों के बीच यह ऐतिहासिक मकबरा एकदम सा उपेक्षित है। नगर निगम वालों ने चारों तरफ चारदीवारी बनाकर इसे कुछ संरक्षित करने की कोशिश की है।

मौलाना रूमी का यह मकबरा एक उंचे प्लेटफार्म पर स्थापित है। मकबरा षटकोणीय है। मकबरे के निर्माण शैली में बंगाल स्थापत्य शैली का प्रभाव स्पष्ट रूप से झलकता है।मौलाना रूमी एक तुर्की सौदागर था। यह ऐतिहासिक ईमारत लगभग पांच सौ साल पुरानी है। किन्तु आज भी उपेक्षित एवं पर्यटकों की नजरों से ओझल है।

Wednesday, 11 September 2019

रोजा का मकबरा मांडू

रोजा का मकबरा मांडू.......!

मांडू का सौंदर्य यहां के प्राकृतिक दृश्यों में तो समाहित है ही, साथ ही साथ यहां की मध्यकालीन ऐतिहासिक ईमारतों की वास्तुकला भी मांडू के सौंदर्य में चार चांद लगा देती है। हरे भरे खेतों के बीच, उंची पहाड़ियों पर, तालाबों के मध्य बनी हुई ये ईमारते मांडू के प्राकृतिक दृश्यावली के असीम सौंदर्य का अहम हिस्सा है। मांडू में गेंहू के खेतों के मध्य बना रोजा का मकबरा भी एक बेहद शानदार ईमारत है। हरे भरे खेतों के बीच स्थित  यह ऐतिहासिक मकबरा, अपने वास्तुकला के कारण, मांडू में आये पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करने में कोई कसर नहीं छोड़ता है। 




इस मकबरे का इतिहास भी काफी रोचक है। मांडू को सूफी संतो ने अपना केन्द्र बनाकर अपने विचारों का प्रचार प्रसार किया था। यह मकबरा भी तत्कालीन एक मात्र महिला सूफी साधिका खदीजा बीबी की कब्र पर बना हुआ है। इस सूफी साधिका का विवाह कुतूबुददीन से हुआ था। उसके देहांत के बाद इन्हे भी इसी मकबरे में दफनाया गया। यहां स्थित कब्रो पर अरबी लिपि में कलमा खुदा हुआ है। गौसी सत्तारी द्वारा लिखित ग्रंथ गुलजारे अबरार में खदीजा बीबी के बारे में विशद वर्णन है। जिसमें उन्हें मांडू की एक मात्र सूफी साधिका के रूप में उल्लेखित किया गया है। 




यह मध्यम आकार का मकबरा वास्तुकला की दृष्टि से भी बेहद नायाब है। इसका विशाल गुंबद काले पत्थरों से निर्मित है। मकबरे का प्रवेश द्वार पश्चिम दिशा की तरफ है। बाकी तीनों ओर जालिकावत बंद द्वार निर्मित है। प्रवेशद्वार एवं शेष तीन बंद द्वार लाल पत्थरों से निर्मित है। मकबरे के छज्जे पदम संरचना युक्त ठोड़ियों पर आधारित है। मकबरे के पास टूटी हुई मस्जिद और बावड़ी निर्मित है। 


Wednesday, 17 July 2019

अलगोजा से निकली सिन्ध की मधुर धुन

अलगोजा से निकली सिन्ध की मधुर धुन......!

पता नहीं क्यों जब से सिन्ध , थार के इतिहास संस्कृति और वर्तमान परिदृश्य को समझने की कोशिश कर रहा हूं वैसे वैसे वहां की मिटटी से प्रेम होता जा रहा है। इस प्रेम के पीछे आज भी वही अपनापन छिपा हुआ है जो विभाजन से पूर्व तक था। विभाजन के बाद भले ही आज ये क्षेत्र पाकिस्तान में रह गये हो किन्तु आज भी भौगोलिक और सांस्कृतिक दृष्टि से थार और सिन्ध मुझे अपने देश का हिस्सा ही महसूस होता है। पाकिस्तान के थार में आज भी राजस्थानी और सिन्धी संस्कृति की महक कायम है।
भाषा, रहन सहन , खान पान के साथ वहां का संगीत भी हमें आपस में जोड़े रखता है। सिन्ध राजस्थान में रिश्तों की मजबूती के पीछे लोकसंगीत का विशेष योगदान है। लोकवादकों के वाद्ययंत्रों से निकली हुई धुने आज भी हमें पुराने दिनों की याद दिलाती है। आज भले ही सरहदों ने हमें अलग कर दिया है किन्तु दोनों जगह आज एक सा स्वर ही सुनाई पड़ता है। पाकिस्तान के सिन्ध और भारत के राजस्थान में खासकर अलगोजा से निकली स्वर लहरियां सदियों पुराने रिश्तों में गर्माहट पैदा कर देती है।

अलगोजा शब्द में भी उतनी ही मिठास छुपी हुई जितना कि उसी निकली हुई मधुर संगीत में है। भारत में राजस्थान, गुजरात, कच्छ जैसे क्षेत्रों में आज भी अलगोजा का संगीत सुनाई पड़ता है। इसके साथ ही पाकिस्तान के सिन्ध से भी अलगोजा से निकला संगीत यहां तक सुनाई पड़ता है। वहां के अलगोजा के स्वरों में सिन्धी संस्कृति की महक भी शामिल है।
अलगोजा बाँसुरी की तरह ही होता है। किन्तु अलगोजे में दो बांसुरियां एक साथ होती है। इसमें बांसूरी की तरह ही छः छेद होते है। एक अलगोजा दुसरे की अपेक्षा दुगुना होता है। एक अलगोजे में निश्चित समय पर स्वर बजाये जाते है तो दुसरे में एक ही स्वर को कायम रखा जाता है। अलगोजा बजाना भी कोई आसान काम नहीं है। इसे लगातार बजाना पड़ता है जहां सांसे टूटी वहां अलगोजा से निकलता स्वर बिगड़ जाता है।
अलगोजा बांस या पीतल से भी बनाया जाता है। इसे मोतियों के झालरों से भी सजाया जाता है। अलगोजा जैसलमेर जोधपुर बाड़मेर बीकानेर आदि क्षेत्रों में मुख्य रूप से बजाया जाता है। भारत और सिन्ध में आज भी कई अलगोजा वादक है जिनके अलगोजे से निकली धुने पुरी दुनिया को अपना दीवाना बना चुकी है।
सिन्ध में अरबाब खोसो द्वारा बजाई गई इस अलगोजा की मधुर धुन को सुनिये, देखिये और सिन्ध की संस्कृति को महसूस कीजिये ...अलगोजा की यह धुन आपमें भी सिन्ध के प्रति प्रेम को जगा देगी।

Saturday, 6 July 2019

डमरू का प्राचीन मंदिर

डमरू छत्तीसगढ़ का महत्वपूर्ण उत्खनन स्थल है। डमरू बलौदा बाजार से 15 किलोमीटर दुर पर रसेड़ी रसेड़ा के पास स्थित है। डमरू के पास से शिवनाथ नदी बहती है। 

डमरू में पुरातात्विक उत्खनन के फलस्वरूप पुरानी बसाहट के अवशेष प्राप्त हुए है। इस ग्राम में कुछ पुराने मंदिर भी थे जिसमें से एक मंदिर पूर्णत ध्वस्त हो चुका है। ग्रामीणों ने उस पर एक नया मंदिर बना दिया है। 

इसे महामाया मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में  पुरानी प्रतिमायें स्थापित की गई है। उसके पास ही एक अन्य प्राचीन मंदिर स्थित है। यह मंदिर लगभग 15 फीट उंचा है। मंदिर में मात्र गर्भगृह है। गर्भगृह में कोई भी प्रतिमा स्थापित नहीं है। 


मंदिर की दीवारें भी बेहद सादी है। मंदिर के बाहर नंदी की भग्न प्रतिमाओं से अनुमानित होता है कि यह मंदिर शिव मंदिर रहा होगा। 

पुरातत्व विभाग ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया है। मंदिर का निर्माण काल 14 वी-15 वी सदी अनुमानित किया गया है। मंदिर परिसर में बहुत सी प्रतिमाओं के भग्नावशेष रखे हुए है। महामाया मंदिर की दीवारों पर भी पुरानी प्रतिमायें जड़ी हुई है। 

डमरू ग्राम में बहुत से टीलों का उत्खनन किया गया जिसके फलस्वरूप पुरानी बसाहट के अवशेष भी देखने को मिलते है। 

रायपुर से डमरू 100 किलोमीटर पर स्थित है वहीं बलौदाबाजार से डमरू 15 किलोमीटर पर स्थित है। कभी इस रास्ते में जाना हो तो डमरू जरूर जाईये। 






Saturday, 22 June 2019

बालोद का कपिलेश्वर मंदिर समूह

बालोद का कपिलेश्वर मंदिर समूह......!


2012 में दुर्ग जिले से अलग होकर बालोद एक नया जिला बना है। बालोद जलाशयों एवं वनसंपदा से संपन्न क्षेत्र है। यहां का मुख्य कर्म कृषि है। बालोद दुर्ग से 60 किलोमीटर, धमतरी से 40 किलोमीटर एवं राजनांदगांव से 50 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है। राजधानी रायपुर से बालोद 100 किलोमीटर की दुरी पर है। 

बालोद पुरातात्विक स्मारकों के लिये भी प्रसिद्ध है। बालोद शहर के अंतिम छोर पर कपिलेश्वर मंदिर समूह है। इस मंदिर समूह में भगवान शिव, देवी दुर्गा, भगवान गणेश, भगवान कृष्ण, देवी संतोषी और राम जानकी को समर्पित छः मंदिर है। 

भगवान शंकर को समर्पित कपिलेश्वर मंदिर इनमें सबसे बड़ा मंदिर है। पूर्वाभिमुख इस मंदिर में सिर्फ गर्भगृह मात्र है। मंदिर का शिखर भी काफी उंचा है। दोनों तरफ भगवान गणेश की 6 फीट की प्रतिमायें स्थापित है। मंदिर के द्वारशाखा के दायें  और बायें तरफ गंगा यमुना और द्वारपाल की प्रतिमायें स्थापित है। 

 इन मंदिरों समुहों में दुसरा मंदिर भगवान गणेश को समर्पित है। इस मंदिर के गर्भगृह में भगवान गणेश की छ फीट की प्रतिमा स्थापित है। इस मंदिर का शिखर उपर की ओर संकरा होता गया है। मंदिर का शिखर पीड़ा देवल प्रकार में निर्मित है।  

छत्तीसगढ़ में भगवान गणेश की अनेकों प्रतिमायें मिलती है किन्तु अधिकांश प्रतिमायें खुले में या किसी मंदिर के मंडप में स्थापित प्राप्त होती है किन्तु ऐसे मंदिर बेहद की कम प्राप्त होते है जो कि सिर्फ भगवान गणेश को समर्पित है। 

भगवान राम का मंदिर गर्भगृह और मंडप में विभक्त है। इसमें भगवान राम की आधुनिक प्रतिमा स्थापित है।  भगवान कृष्ण और मां दुर्गा के पुराने मंदिरों में इनके आधुनिक प्रतिमायें स्थापित है। संतोषी माता का मंदिर इन सभी मंदिरों में सबसे छोटा है। इस मंदिर का शिखर पीड़ा देवल आकृति में बना हुआ है। मंदिरों के पास बावड़ी या तालाब बनाने की परंपरा यहां पर भी देखने को मिलती है। 

शिव मंदिर के सामने एक बावड़ी बनी हुई है।   जिसमें योद्धाओं की प्रतिमायें स्तंभों पर स्थापित  है। इन मंदिरों का निर्माण काल 15 वी -16 वी सदी माना गया है। 

मंदिरों के शिखर भाग पर नागों की आकृतियां अंकित है जिससे अनुमानित होता है कि यहां पर भी स्थानीय नागवंशी राजाओं का शासन रहा है। इनके शासन काल में ही इन मंदिरों का निर्माण माना गया है। 









बावड़ी

Tuesday, 4 June 2019

देवकर के घुघुस राजा

देवकर के घुघुस राजा......!

छत्तीसगढ़ में ऐसे बहुत से ऐतिहासिक स्थल है जिनकी जानकारी आज भी बहुत ही कम लोगों को है। ऐसा ही एक अल्पज्ञात मंदिर घुघुस राजा को समर्पित है जो कि स्थानीय आदिवासियों में नायक के तौर पर पूजे जाते है।  बेमेतरा जिले के देवकर ग्राम में घुघुस राजा का प्राचीन मंदिर स्थित है। देवकर एक छोटी कस्बाई बस्ती है। 


इस ग्राम में ही नदी के तट पर, मुख्य सड़क से अंदर की ओर यह मंदिर स्थित है। परिसर में दो छोटे मंदिर बने हुए है। मंदिर गर्भगृह एवं मंडप में विभक्त है। ये दोनों ही मंदिर अधिक पुराने नहीं है।  मंदिर के गर्भगृह में भगवान नरसिंह की प्रतिमा स्थापित है। इस खंडित प्रतिमा का मुख घिस गया है।


प्रतिमा पर सिंदूर का लेप चढ़ा हुआ है।  यहां के स्थानीय लोग भगवान नरसिंह  को आदिवासी नायक घुघुस राजा के नाम से पूजा अर्चना करते है। मंदिर के पास हनुमान जी का एक और मंदिर बना हुआ है। मंदिर परिसर में बहुत से सती स्तंभ बिखरे पड़े है। कुछ टूटी हुई प्रतिमायें भी रखी हुई है। 


छ0ग0 पुरातत्व विभाग के अनुसार ये मंदिर 17-18 वी सदी में निर्मित माने गये है। संभवत यहां के स्थानीय जमींदारों ने इन मंदिरों का निर्माण करवाया होगा। ये दोनों मंदिर छ0ग0 पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है।  कभी देवकर जाना हो तो घुघुस राजा के इस मंदिर को अवश्य दर्शन कीजियेगा। 





Friday, 17 May 2019

उदयगिरी में उत्कीर्ण भगवान नृसिंह की सबसे पुरानी प्रतिमा

उदयगिरी में उत्कीर्ण भगवान नृसिंह की सबसे पुरानी प्रतिमा.....!

कुछ दिनों पहले मुझे सांची के पास ही स्थित उदयगिरी की गुफाओं का भ्रमण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। गुप्तकाल में बनी हुई उदयगिरी की बीस गुफायें देवी देवताओं के प्राचीन प्रतिमाओं के लिये विश्व प्रसिद्ध है। यहां स्थित वराह भगवान की प्रतिमा विश्व में अद्वितीय प्रतिमा है।
गुप्तयुगीन मूर्तिशिल्प को समझने व देखने के लिये उदयगिरी की गुफायें किसी भी शोधकर्ता के लिये बेहद महत्वपूर्ण स्थल है। गुप्त सम्राटों ने पत्थरों को काटकर छोटी छोटी गुफाओं का निर्माण करवाया और उन गुफाओं तथा बाहर की चटटानों पर वैष्णव तथा शैव धर्म से संबंधित अनेक प्रतिमायें उत्कीर्ण करवाई।

पहाड़ी के उपर की ओर जाने वाले गलियारें में बांयी तरफ भगवान नृसिंह की प्रतिमा उत्कीर्ण है। भगवान नृसिंह की यह प्रतिमा भारत की सबसे प्राचीन प्रतिमा मानी जाती है। यह प्रतिमा एक आले में स्थापित है। दोनों तरफ दो द्वारपाल स्थापित है। उपर चटटान में खुदाई को देखकर लगता है कि इसके उपर छत का निर्माण करने की भी योजना थी।

उदयगिरी गुफायें भारत के स्वर्णिम अतीत को आज भी संरक्षित किये हुए है। जीवन में एक बार हर किसी को उदयगिरी की इन गुफाओं को जरूर देखना चाहिये।

Monday, 22 April 2019

वराह अवतार

वराह अवतार उदयगिरी की गुफायें विदिशा

सांची के पास ही विश्वप्रसिद्ध उदयगिरी की गुफायें है। गुप्तकाल में चटटानों को काटकर इन गुफाओं का निर्माण कराया गया था। उदयगिरी में कुल 20 गुफायें है जिनमें से कुछ गुफायें चैथी पांचवी सदी की मानी गई है। इन गुफाओं में उत्कीर्ण प्रतिमायें गुप्तकाल की मूर्तिकला की सर्वोत्तम उदाहरण है।  
गुफा नं 05 जिसे वराह गुफा भी कहते है इस गुफा में भगवान विष्णु के वराह अवतार की अद्वितीय विशाल प्रतिमा स्थापित है। इस प्रतिमा का मुख वराह का एवं शेष भाग मनुष्य का है। 

 पुराणों के अनुसार भगवान वराह ने राक्षसराज हिरण्याक्ष से पृथ्वी को मुक्त कराया था। इसी कथा को इस वराह गुफा में उत्कीर्ण किया गया है। भगवान वराह के कंधे पर नारी रूप में पृथ्वी देवी विराजित है। भगवान वराह का एक पैर नाग राजा पर रखा हुआ है। नाग राजा हाथ जोड़े हुये भगवान वराह की ओर देख रहे है।उपर समस्त देवी देवताओं यक्ष गंधर्व किन्नरों को स्तुति गान करते हुये प्रदर्शित किया गया है।


गुप्तकाल में निर्मित भगवान वराह की यह प्रतिमा पुरे भारत में अद्वितीय प्रतिमा है जिसमें नारी रूपी पृथ्वी का उद्धार करते हुये प्रदर्शित किया गया है। 

Monday, 11 March 2019

अनजाने इतिहास का साक्षी है .. हेलियोडोरस का स्तंभ

अनजाने इतिहास का साक्षी है .. हेलियोडोरस का स्तंभ.....!

सांची के पास ही बेसनगर में स्थित हेलियोडोरस के स्तंभ का महत्व भी उतना ही है जितना सांची के स्तूपों का, किन्तु पर्यटकों में इस स्तंभ को देखने में इतनी दिलचस्पी नहीं दिखाई देती है। यह स्तंभ भारत के उस वैभवशाली युग का मूक साक्षी रहा है, जिस युग में भारत के साथ साथ विदेशों में भी भागवत धर्म की ध्वज पताका लहराती थी। इस स्तंभ के आसपास आज भी उस गौरवशाली इतिहास को महसूस किया जा सकता है।



सांची से लगभग 07 किलोमीटर दुरी पर बेसनगर नामक छोटा सा ग्राम है। गांव के पास बहने वाली बेस नदी के कारण ही यह ग्राम भी बेसनगर के नाम से ही जाना जाता है। बेसगनर नाम से किसी बड़े नगर के होने का आभास होता है किन्तु यह एक छोटी सी ग्रामीण बस्ती है। इस बेसनगर में 150 ईसा पूर्व में स्थापित किया गया एक पाषाण स्तंभ आज भी मौजूद है। जिसे यहां के स्थानीय लोग खाम बाबा या खंबा बाबा के नाम से पूजा करते है। इस स्तंभ के पीछे वह इतिहास छिपा पड़ा है जिससे शुंग और यवनों के पारस्परिक संबंधो की अदभूत जानकारी मिलती है, दुर्भाग्य से आज भी उन जानकारियों से आमजन अनभिज्ञ ही है। 


यह स्तंभ वास्तव में एक गरूड़ स्तंभ था जिसे एक युनानी राजदूत ने भगवान वासुदेव के सम्मान में स्थापित किया था। जिस पर ब्राहमी लिपि और प्राकृत भाषा में लेख अंकित है।  भारतीय पुरातत्व विभाग के मुताबिक शुंगवंश के नौंवे शासक भागभद्र के शासन काल में हेलियोडोरस नामक यवन भारत आया था। हेलियोडोरस तक्षशिला के शासन एंटियोकस के राजदूत के रूप में आया था। हेलियोडोरस ने भगवान विष्णु के मंदिरों के सामने इस स्तंभ को गरूड़ स्तंभ के रूप में स्थापित किया था। इस स्तंभ के समीप चैथी सदी ईसा पूर्व विष्णु मंदिरों की पुष्टि यहां हुये उत्खनन में हो चुकी है। 


इस स्तंभ के साथ यहां की कई रोचक मान्यताओं को देशज भाषा में बहुत ही शानदार तरीके से भारतीय पुरातत्व विभाग ने व्यक्त किया है।  जिस पर नजर डालने से मालूम होता है कि  इस खंबे को खाम बाबा कहते है और ज्यादातर धीमर लोग इसे पूजते है। इस पर दो बीजक खुदे हुये है उनसे इनका असली हाल मालूम होता है। यह बीजक ब्राही हरफों में  है और उनकी बोली प्राकृत है। 

एक बीजक से मालूम होता है कि यह खंभा गरूड़ ध्वज है। जिसको भगवान विष्णु के मंदिर के सामने हेलियोदर ने खड़ा किया था। हेलिओदर तक्षशिला का रहने वाला ग्रीक था।। वह पंजाब के आंतलिकित नाम के ग्रीक राजा की तरफ से मध्य देश के भागभद्र राजा के पास वकील था और उसने भागवत धर्म को स्वीकार कर लिया था। यह खंभा दो हजार साल से भी ज्यादा पुराना है अर्थात हजरत ईसा से भी 150 साल पहिले बना है। 


इस स्तंभ के सबसे पहले अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1877 ई में अपने लेखों के माध्यम से प्रकाश में लाया था। यह स्तंभ स्थानीय तौर पर खाम बाबा के नाम से ही जाना जाता है। इस स्तंभ पर लिखे लेख के अनुसार हेलियोडोरस भागवत धर्म से अत्यधिक प्रभावित था। इस स्तंभ पर उत्कीर्ण लेखों की जानकारी भारतीय पुरातत्व विभाग ने बहुत ही विस्तार से दी है। स्तंभ पर अंकित लेख दो भागों में है। इन लेखों पर संस्कृत और प्राकृत भाषा का प्रभाव दिखलाई पड़ता है। लेख ब्राहमी लिपि में खुदा हुआ है। यह लेख कुछ इस प्रकार है:-
पहला भाग

देवादेवासा वा(सुदे)वसा  गरूड़ध्वजो अयम
करितो ई (आ) हेलिटोडोरेना भागा
वटेना दियासा पुतरेना तखासिलाकेना
योनादातेना अगातेना  महाराजासा
अमतालिकितेसा उप(मा) ता  सामाकसम रानो
कासीपूतासा  (भा)गभद्रासा तरातारासा
वासेना (चातू)दासेना राजेना वधमानासा

दुसरा भाग
तिरीनी अमूतपदानी (सू) अनुतिथानी
नयामति स्वागा दामो चागो अपरामदो

इन लेखों से भारत के अनजाने इतिहास की नयी जानकारियां प्राप्त होती है। यह लेख भारत के प्राचीन भागवत धर्म से संबंधित पहला महत्वपूर्ण लेख है। यह लेख दर्शाता है कि ईसा से दुसरी सदी पूर्व में पुरे दक्षिण एशिया में भागवत धर्म ग्रीक लोगों में काफी लोकप्रिय था। 

हेलियोडोरस ने भी भागवत धर्म स्वीकार कर लिया था ऐसा अनुमान इन लेखों से होता है। हेलियोडोरस जिस यवन राजा के राजदूत था उसका राज्य काफी विस्तृत था जो कि प्राचीन बैक्ट्रिया साम्राज्य का भाग था जिसकी स्थापना सिकंदर ने की थी। यह लेख भारत और ग्रीकों के आपसी संबंधो का भी गवाह है। 


हेलियोडोरस का यह स्तंभ और उसमें अंकित लेख भारत के उस प्राचीन इतिहास का साक्षी है जिस काल में भारत विश्वगुरू था। यहां प्रचलित मान्यताओं को पुरा विश्व मानता था। उसे सम्मान और आदर देता था। 

आलेख - ओम सोनी दंतेवाड़ा

Sunday, 24 February 2019

अनमोल धरोहर है बाघ गुफाओं के प्राचीन चित्र

अनमोल धरोहर है बाघ गुफाओं के प्राचीन  चित्र......!

प्राकृतिक सौंदर्य एवं मनमोहक दृश्यों से परिपूर्ण परिवेश में स्थित बाघ की गुफायें अपनी अनोखी भित्ती चित्रकला के लिये पुरे विश्व में प्रसिद्ध है। धार से 90 किलोमीटर बाघ नामक ग्राम में स्थित ये गुफाये बौ़द्ध धर्म को समर्पित है। पंद्रह सौ साल पहले चटटानों को काटकर बनाई गई ये गुफायें तत्कालीन स्थापत्यकला की संुदर उदाहरण है। ये गुफायें स्थापत्यकला की दृष्टि में भले ही साधारण हो सकती है परन्तु अपने प्राचीन चित्रों के कारण पुरे भारत में विशिष्ट स्थान रखती है। इन गुफाओं में बने चित्रों की तुलना अजंता एलोरा की गुफाओं में बने चित्रों से की जाती है। बाघ के अद्वितीय सौंदर्य और भगवान बुद्ध के दिव्य संदेशों का अदभुत समन्वय यहां के चित्रों में दिखलाई पड़ता है।

प्रागऐतिहासिक काल से प्रारंभ हो चुकी चित्रकारी बाघ के चित्रों में उन मानवीय अनुभूतियों को परिलक्षित करती है जिसमें प्राकृतिक दृश्यावली और धार्मिक विचारों का अनोखा मेल है। बुद्ध के जीवनकाल से जुड़ी घटनाओं की झलक बाघ के इन चित्रों में देखने को मिलती है। बौद्ध कथानकों, बौधिसत्व, राजदरबार, की पवित्रता एवं शुद्धता इन चित्रों में महसूस की जा सकती हैं। यहां के असीमित प्राकृतिक सौंदर्य का विराट चित्रण भी इन गुफाओं में देखने को मिलता है। नदी पहाड़ भू दृश्यावली  के चित्रों में प्राकृतिक सौंदर्य के रस का वेगपूर्ण प्रवाह को चित्रित करने की कुशलता भी बेहद प्रशंसनीय है।

इन चित्रों के पीछे का आधुनिक इतिहास भी काफी रोचक है। कर्नल सी0 ई0 ल्यूवर्ड ने 1907-08 में इन चित्रों को पुनः प्रकाश में लाया। 1920 में मुकूल डे ने इन चित्रों के स्केच तैयार किये वहीं 1921 के समय में नंदलाल बोस, ए0के0 हालदार जैसे प्रतिष्ठित चित्रकारों ने बाघ की इन चित्रों की अनुकृतियां तैयार की थी। बाद में जगताप, आप्टे,भोंसले जैसे कलाकारों के दलों ने भी यहां के चित्रों की प्रतिलिपियां तैयार की।  धुयें एवं गुफा में नमी के कारण ये चित्र खराब हो रहे थे। 1982 इन चित्रों को वहां से सावधानी पूर्वक हटाकर संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया। इन चित्रों की मौलिकता बचाये रखने के लिये रासायनिक लेप का भी प्रयोग किया गया। बाघ के संग्रहालय में रखे ये पुराने चित्र आज भी कलाप्रेमियों एवं दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।

पंद्रह सौ साल बीतने के बाद भी ये चित्र एकदम नवीन और जीवंत लगते है। इन्हे चित्रित करने की कला और अमिट रंगों के पीछे की तकनीक जानने की लालसा यहां आने वाले हर कलाप्रेमी को होती है। पुरातत्व विभाग हमारी इस जिज्ञासा को काफी हद तक अपने इन जानकारियों से दुर कर देता है। बाघ गुफाओं की चित्रकारी, टेम्परा तकनीक से की गई है। इसके लिये दीवारों एवं छतों पर लाल भूरे रंग की बजरी, मिटटी एवं मिटटी के गारे का मोटा पलस्तर लगाकार आधार बनाया गया है। यदयपि मिटटी का पलस्तर मोटाई में एक समान नहीं है। फिर भी यह चटटान की खुरदरी सतह को चिकना बनाता है। पलस्तर के उपर चूने की एक परत चढ़ी है जिसके उपर चित्रकारी की गई है।

मार्शल महोदय चित्रकारी की तकनीक का विश्लेषण करते हुये लिखते है कि अजंता की तरह ही बाघ में चित्रकारी टेम्परा में की गई है न कि उस तकनीक जैसा अक्सर कहा जाता है कि ये फेस्को है। दोनो ही स्थानों पर रंग एवं प्रयोग में लाई गई पद्धति एक जैसी दृष्टिगोचर होती है। यदयपि बाघ में पहली मोटी परत बनाने में कम सावधानी बरती गई है। अजंता में यह परत स्थानीय लोह अयस्क युक्त मिटटी में कंकर, चूना, पटसन, एवं सन के रेशे मिलाकर बनाई गई है। बाघ में कार्य कुछ लापरवाहीपूर्वक किया गया है एवं इसी के परिणामस्वरूप इसका प्रथम स्तर अजंता की अपेक्षाकृत कम सुदृढ़ है।

इन चित्रों में उपयोग किये गये अधिकांश रंग द्रव्य मिटी या खनिज मूल के है। मात्र काले रंग को छोड़कर जिसे काजल के नाम से जाना जाता है। इनकी स्थानीय उपलब्धता थी। इसके अतिरिक्त बाघ में लाल लाख के उपयोग का भी विवरण मिलता हैं। गेरूआ लाल लाल रंग के लिये, गेरूआ पीला पीले रंग के लिये, पेड़ों के हरा रंग हरे रंग के लिये, लाजवर्द या लेपिस लेजुली नीले रंग के लिये एवं चूना सफेद रंग के लिये उपयोग किया गया। रंगों को घोलने एवं लगाने के लिये गोंद का उपयोग किया गया है। 

संग्रहालय में सुरक्षित इन चित्रो में धार्मिकता के बजाय भौतिकवाद अधिक परिलक्षित होता है। पेड़ पौधों पशु पक्षियों एवं बौद्ध कथानकों के दृश्यों की अदभुत चित्रकारी को देखने के बाद हर कोई मंत्रमुग्ध हो जाता है। बौद्ध कथानकों के दृश्य तो एकदम से जीवंत लगते हैं। राजदरबार के दृश्यों को देखने से लगता है कि अभी सभासदों की कोई गरमागरम बहस चल रही हो। बोधिसत्व पदमपाणि के चित्र तो हमसे संवाद करते हुये नजर आते है।



पशु पक्षियों के चित्र

पशु पक्षियों के चित्रों में पुष्प युक्त पौधों के साथ हंस का चित्रण का काफी प्रभावी लग रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि हंस उसे पौधे पर खिले सफेद पुष्प की सुंदरता से मोहित हो गया है। एक अन्य चित्र में दो गायों , पक्षियों एवं पौधों को दर्शाया गया है। गाय के गले में बंधी घंटी से आभास होता है कि ततकालीन समय में गाय का धार्मिक महत्व रहा होगा। गौ पालन पूण्य का कार्य समझा जाता था।

फूलों की बनावट भी काफी आकर्षक है। इन गुफाओं के आसपास खिलने वाले रंग बिरंगे संुदर फूलो ही चित्रण इन चित्रों में देखने को मिलता है। केवड़ा और कमल फूल की जुगलबंदी भी काफी रोचक और आश्चर्यजनक है। ज्यामितीय आकृतियों के साथ इठलाते हुये हंस का चित्रण भी काफी प्रभावोत्पादक है।

विदुर पंडित जातक -
बौद्ध कथानकों में विदुर पंडित जातक के चित्र का अंकन भी किया गया हैं। जिसके पीछे एक रोचक कथा हैं। वाराणसी के चार ब्राहमण थे जिन्होने सन्यास लिया था। उन्होने अपनी अभिलाषा एवं अच्छे कर्मो के फलस्वरूप अगले जन्म में देवताओं के राजा शक, नागों के राजा नागराज, सुपर्ण के राजा एवं कुरूओं के राजा के रूप में जन्म लिया था। संयोगवश वे चारों एक सुंदर बगीचे में मिले और एक विवाद में उलझ बैठे कि चारो में श्रेष्ठ कौन है। जब वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे तब उन्होने कुरूओं के राजा के मंत्री विदुरपंडित  की मदद ली। मंत्री ने अपने विवेकपूर्ण व्याख्या से उन सभी के सदकर्मो की सराहना की। फलक के दायीं ओर से बैठा हुआ दुसरा व्यक्ति जो श्रृंगार रहित है वो मंत्री विदुर पंडित है। विदुर पंडित के बांयी ओर कुरूओं के राजा धनंजय है। विदुर पंडित के सामने देवताओं के राजा शक एवं शक के पीछे नागराज है। नागराज के सामने बच्चे की आकृति राजा सुपर्ण की है।

बुद्ध का चमत्कार -
एक बार कालदुयी भिक्षु के आग्रह पर बुद्ध कपिलवस्तु भ्रमण हेतु सहमत हो गये। तदनुसार वह अपने बीस हजार अनुयायियों के साथ कपिलवस्तु आये। शाक्यो ने उनका सम्मानपूर्वक स्वागत किया। किन्तु वरिष्ठ शाक्य इस संशय में थे कि बुद्ध उनके पुत्र या भतीजे के समान हैं। इसलिये उनके सम्मान की आवश्यकता नहीं है। जब बुद्ध को इस बात का पता चला तब उन्होने वरिष्ठ शाक्यों को अपने बोधित्व ज्ञान से परिचय कराने के लिये उनके समक्ष एक चमत्कार करने का निर्णय लिया। तब वह आकाश की ओर उठे और अपने चरणों की धुल उनके सिर पर बिखेर दी। राजा शुद्धोधन और अन्य शाक्य उनके इस चमत्कार को देख बेहद प्रसन्न हुये और उनका सम्मानपूर्वक अभिवादन किया। फलक के मध्य में मुख्य चित्र वरद मुद्रा में बुद्ध का है जिनके चारों ओर पांच भिक्षु है।

महावस्तु अवदान की मालिनी वस्तु -
बनारस के राजकुमारी मालिनी तिष्य, कश्यप एवं भारद्वाज बौद्ध भिक्षुओ के प्रति समर्पित थी। बुद्ध एवं बौद्ध धर्म के प्रति अपनी भक्ति एवं विश्वास के कारण वह ब्राहमणों की आंखो में खटकने लगी है। तत्पश्चात उसे रास्ते से हटाने के लिये ब्राहमणों ने एक योजना तैयार की। राजा को अंतिम चेतावनी दी कि वह मालिनी अथवा ब्राहमणों में से किसी एक को चुने। तब राजा ने अनिच्छा से मालिनी को त्यागने का निर्णय लिया। हृदय विदारक समाचार सुनकर एक स्त्री जो कि मुंह ढके हुये है चित्रित फलक की दाहिनी ओर अंतपुर से निकलकर राजकुमारी मालिनी को अनपेक्षित समाचार सुनाने आयी है।

चित्रकारी के क्षय होने के कारण पर पुरातत्व विभाग प्रकाश डालते हुये कहता है कि गुफा क्षेत्र में अवसादी चटटानों के अनुक्रम में बलुआ पत्थरों एवं स्लेटी पत्थरों की प्रमुखता है। इसके अंचल में दरिया का बहता पानी एवं चटटानों के मध्य बड़ी दरारों के माध्यम से बरसात का पानी गुफाओं में रिसता है। बारी बारी से नम एवं शुष्क परिस्थितियों ने स्लेटी पत्थर को बुरी तरह से प्रभावित किया है इसके परिणामस्वरूप स्लेटी पत्थर और मिटटी की सम्बद्धता समाप्त हो रही है। ये दोनो विषम परिस्थितियां चित्रों के नष्ट होने के लिये जिम्मेदार है। इसके अतिरिक्त चटटानों के अत्यंत कमजोर गुणवत्ता वाली भौतिक संरचना, चित्रों पर धुयें एवं गर्म गैसों का प्रभाव, वर्षा के पानी का रिसाव , चमगादड़ों एवं किटाणुओं से नुकसान जैसे प्रमुख कारणों से भी चित्र खराब हुये है।





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