Friday, 21 December 2018

शिव मंदिर देव बलोदा का मूर्तिशिल्प

शिव मंदिर देव बलोदा ....!

देव बलोदा का यह महादेव मंदिर मूर्तिशिल्प के मामले में बेहद ही समृद्ध है। मंदिर के बाहरी दिवारों एवं मंडप के स्तंभों पर देवी-देवताओं की कलात्मक प्रतिमायें अंकित है। मंदिर के निचले थरों पर तदयुगीन समाज की झलकियों को शिल्पकार ने अपने छैनी हथोड़े से जीवंत कर दिया है। 

किसी भयानक युद्ध का चित्रण इतने प्रभावी ढंग से उन प्रतिमाओं में देखने को मिलता है जिसके लिये शिल्पी बधाई का पात्र है। शिकार के दृश्यों में शिकारी और शिकार के भावों को बहुत ही बढ़िया ढंग से प्रदर्शित किया गया है। युद्ध के दौरान हाथियों की भाव भंगिमा, उनकी चेष्टाओं को आंखो देखा वर्णन शिल्पकार ने मंदिर की दिवारों पर उकेरा है। 


युद्ध के दृश्य और हाथियों का उत्पात:-

इस मंदिर के निचले थरों पर अंकित हाथी और मानव द्वंद की प्रतिमायें किसी भी पर्यटक या शोधार्थी के लिये कौतुहल का विषय हो सकती है। इन प्रतिमाओं के अवलोकन से एक बात समझ आयी कि शिल्पकार किसी भयानक युद्ध का या तो साक्षी रहा है या उसने पूर्व में हुये किसी युद्ध की बाते जान रखी थी। हाथियों द्वारा मचाये गये उत्पात को भी शिल्पकार ने बखूबी प्रदर्शित किया है। 



सुक्ष्मावलोकन के दौरान एक प्रतिमा ने मेरे अनुमान को मजबूती प्रदान की। रथ पर सवार दो राजा आमने-सामने एक दुसरे पर तीरों की बौछार कर रहे है। दोनो के रथों पर अंकित राजचिन्ह ने मेरा ध्यान खींचा। एक राजा का राजचिन्ह हनुमान है तथा दुसरे का राज चिन्ह सर्प अंकित है। सर्प राजचिन्ह को देखने से अनुमान होता है कि यह राज चिन्ह निश्चित तौर पर किसी नागवंशी राजा से ही संबंधित है। 



दसवी सदी से लेकर चैदहवी सदी तक बस्तर, कवर्धा और बालोद क्षेत्रों पर नागवंशी शासको का शासन था। शिल्पकार ने उस समय स्थानीय राजा पर किसी नागवंशी राजा के आक्रमण का उल्लेख किया है। बस्तर में ग्यारहवी सदी में राजभूषण सोमेश्वर देव नामक छिंदक नागवंशी राजा का एकछत्र शासन स्थापित था। सोमेश्वर देव के कुरूषपाल अभिलेखो से कल्चुरी राजाओं पर विजय प्राप्त कर कौसल के छः लाख ग्रामों का स्वामी होने की जानकारी प्राप्त होती है।




 सोमेश्वर देव के पास विशाल हस्ती सेना थी। बस्तर के हाथ्यिों से जुड़ी जानकारी चोल शासको, कल्याणी के चालुक्य राजाओं के इतिहास संबंधी विवरणों से प्राप्त होती है। निश्चित तौर पर सोमेश्वर देव ने विशाल हस्ती सेना लेकर कौसल क्षेत्र के किसी राजा पर आक्रमण किया होगा ऐसा अनुमान देवबलोदा की इन प्रतिमाओं से प्राप्त होती है। हाथियों ने तो स्थानीय राजा की सेना में काफी उत्पात मचाया था। हाथी और सैनिक संघर्ष की ये प्रतिमायें कुछ यही कहानी बयां करती है। 


किसी सैनिक के पीछे हाथी दौड़ रहा है तो किसी हाथी को कोई सैनिक खदेड़ रहा है। किसी सैनिक के जंघा को पकड़ कर हाथी ने उसे पटक दिया है तो कहीं दो दो हाथी मिलकर पेड़ को उखाड़ रहे है। हाथी भी प्रशिक्षित एवं सुसज्जित है। लकड़ी के बड़े लटठ को लेकर हाथी युद्ध मैदान में ताल ठोंक रहे है। 




कहीं कहीं कतारबद्ध हाथी आगे बढ़ रहे तो कहीं कहीं दो हाथी का एक मुख प्रदर्शित है। इस मंदिर के तीन भित्तियों पर हाथी और बैल के दृश्य को अनोखे ढंग से प्रदर्शित है। हाथी और बैल दोनो आमने सामने खड़े है। दोनो को मुख एक ही है। एक तरफ से देखे तो वह हाथी का मुख नजर आता है तो दुसरी तरफ से वह बैल का मुख नजर आता है। हाथी और वृषभ का संयुक्त मूख बनाकर शिल्पकार ने उस समय शैव और वैष्णव संप्रदाय के मिलन के गज-नदंी प्रतीक को प्रस्तुत किया है। 

शिकार के दृश्य:- 

तदयुगीन समाज में प्रचलित शिकार के दृश्यों को शिल्पकार ने मंदिर की दिवारों पर स्थान दिया है। शिकारी भाले लेकर जंगली सुकर एवं हिरणों का शिकार कर है। शिकार में शिकारी के साथ-साथ उसका पालतू कुत्ता भी मदद करते हुये दिखाई पड़ रहा है। निश्चित तौर पर इस क्षेत्र में घना जंगल रहा होगा और यहां पर जंगली सुकर एवं हिरणों का शिकार किया जाता था। शिकार के ये दृश्य आज वनांचल क्षेत्रों में प्रचलित है जिसमें वफादार कुत्ता भी शामिल रहता है। 





अगले पोस्ट में हम इस मंदिर पर जड़ी भगवान की प्रतिमाओं, मैथुन प्रतिमायें एवं अन्य सामाजिक दृश्यों की चर्चा करेंगे। 

Thursday, 20 December 2018

शिव मंदिर देवबलोदा की कहानी

शिव मंदिर देवबलोदा ....!

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के पास यदि आपको आश्चर्यजनक मूर्तिशिल्प युक्त ऐतिहासिक मंदिर देखने की ईच्छा हो तो आप देवबलोदा जरूर जाईये। पिछले दो तीन सालों से देवबलोदा के शिव मंदिर को देखने की मेरी ईच्छा थी किन्तु रायपुर आने के बाद भी वह ईच्छा किन्हीं कारणों से पुरी नहीं हो पा रही थी। गुरू घासीदास जयंती के पावन अवसर पर मेरे मित्र जितेन्द्र नक्का के सौजन्य से देवबलोदा के शिव मंदिर को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 

जहां पुरा छत्तीसगढ़ फेथाई तुफान के कारण शीतलहर और बरसात के चपेट में था वहीं हम दोनों दिन के तीन बजे मोटरसायकिल से देवबलोदा की ओर जा रहे थे। हड्डियां कप कपा दे ऐसी ठंडी हवा के झोंके सहने की ताकत पता नहीं कैसे हम दोनो में आ गई थी। दरअसल हमारी प्रबल इच्छाशक्ति के कारण हममें गजब की ताकत आ गई थी। जितेन्द्र नक्का का कहना था कि कम से कम दो सप्ताह में एक टूर उनके लिये एनर्जी के इंजेक्शन की तरह काम करता है। यदि कोई टूर ना हो तो उनकी एनर्जी लो हो जाती है। ऐसी कुछ कहानी मेरी भी यही थी। हम दोनो पुराने मित्र है। जितेन्द्र नक्का जी ने तो छत्तीसगढ़ के लगभग सभी ऐतिहासिक मंदिरो, झरनों और गुफाओं के दर्शन कर लिये है। उनके मुकाबले मैने अभी आधी दुरी तय की है। खैर बस्तर भ्रमण के मामले में मैं उनसे कई गुना आगे हूं। 

रायपुर की टैªफिक से भरपूर रास्तों में धक्का-मुकी , पुचकारते-दुतकारते और गिरते-पड़ते हम देवबलोदा की ओर बहुत तेजी से बढ़ रहे थे। इस बार शाम होने का कोई डर नहीं था क्योंकि बादल छाये होने के कारण दिन के तीन बजे भी शाम के छः बजे सा अहसास हो रहा था।  

देवबलोदा रायपुर से लगभग 18 -20 किलोमीटर की दुरी पर ही है। भिलाई चरोदा के पास ही देवबलोदा नाम की छोटी सी बस्ती है। मुख्य राजमार्ग से लगभग तीन किलोमीटर अंदर जाने पर छत्तीगसढ़ की इस ग्राम की झलकियां देखने को मिलती है। यह तीन किलोमीटर का मार्ग भी बड़ा ही पेचीदा है। घुमावदार कच्चे पक्के मार्ग और बीच में पड़ते रेलवे फाटकों की मुसीबत को झेलना तो अनिवार्य है। चंूकि बस्ती पुरी तरह रेल्वे लाईन के किनारे बसी है जिसके कारण हमें बार बार पटरियां की भूलभूलैया को पार करना पड़ रहा था। बस्ती की तंग गलियों से पूछते पूछते हम देवबलोदा के ऐतिहासिक शिव मंदिर के द्वार पर पहंूच गये। 


मंदिर की स्थिति:-

यह मंदिर केन्द्रीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है जिसके कारण इसके चारों तरफ पक्की दिवार से घेरा बंदी की गई है। मंदिर रेल्वे लाईन के बेहद ही पास होने के कारण चलती टेªन से भी इस मंदिर की एक झलक को देखा जा सकता है। मंदिर परिसर के बाहर एक विशाल तालाब है। पुराने समय में यह प्रथा रही कि मंदिर के साथ तालाब अनिवार्य रूप से खुदवाया जाता था। मंदिर परिसर के अंदर भी मंदिर से लगी हुई एक मध्यम बावड़ी बनी हुई है। 

यह मंदिर पूर्वाभिमुख है। लाल बलूआ पत्थर से बना हुआ यह ऐतिहासिक मंदिर अपने मूर्तिशिल्प के कारण किसी भी शोधार्थी के लिये आदर्श स्थल है। मैं तो मंदिर की बाहरी दिवारों पर लगी प्रतिमाओं को देखकर दंग रह गया था। रायपुर के आसपास के लगभग सभी ऐतिहासिक मंदिरों में से देवबलोदा का यह मंदिर प्रतिमाओं के मामले में सबसे आगे है। इस कारण ही मुझे इसे देखने की ईच्छा थी। 

मंदिर गर्भगृह अंतराल और मंडप में विभक्त है। मंदिर में प्रवेश करने के लिये दो द्वार है एक पूर्व की तरफ से और दूसरा उत्तर की तरफ। दोनो तरफ सात सीढ़ियां चढ़कर मंदिर में प्रवेश करना होता है। मंदिर का मंडप कुल 16 स्तंभों पर टिका हुआ है। प्रत्येक स्तंभ आकर्षक शिल्पाकृतियांे से युक्त है। स्तंभों पर महिषासुर मर्दिनी, कृष्ण, गणेश, भैरव और कीर्तिमुख की सुंदर आकृतियां निर्मित है। 

मंदिर का प्रवेशद्वार बेहद अलंकृत है। दोनो तरफ शैवद्वार पाल पहरा देते हुये स्थापित है। द्वारशाखा के दोनो तरफ अमृतकलश युक्त स्तंभ है। द्वारशाखा के ललाट बिंब पर भगवान गणेश की प्रतिमा अंकित है। उपर की तरफ भगवान कृष्ण भैरव आदि की प्रतिमायें अंकित है। क्षरित होने के कारण अधिक जानना संभव नहीं हो पाया। प्रवेशद्वार के पास ही दोनो तरफ के आलिंदो में भगवान गणेश की प्रतिमायें स्थापित है। 

मंदिर का गर्भगृह काफी गहराई में है। लगभग 7-8 खड़ी सीढ़ियां उतरने के बाद ही गर्भगृह में प्रवेश किया जा सकता है। गर्भगृह में शिवलिंग प्रतिष्ठापित है। शिवलिंग जल की निकासी के लिये प्रणालिका का मुख भी बावड़ी के तरफ ही निर्मित की गई है। 

मंदिर का शिखर बारसूर के बत्तीसा मंदिर की तरफ बिल्कुल समतल एवं सपाट है। पुरातत्व विभाग के सूचना पटट के अनुसार शिखर नागर शैली में निर्मित रहा होगा। मंदिर की बाहरी भित्तियों पर सबसे उपर की दो पंक्तियो में वेणुगोपाल, महिषासुर मर्दिनी, भैरव, नरसिंह, वराह, त्रिपुरान्तक शिव, गजान्तक शिव, केशिवध जैसी प्रतिमाओं का सुरूचिपूर्ण अंकन किया गया है। पिछली दिवार की दो आलिंद प्रतिमा विहिन है। 

मंदिर के निचले तीन थर नर थर, अश्वथर और गज थर में विभक्त है। जिसमें हाथी, शिकार, और किसी युद्ध एवं अन्य मानवीय दृश्यों का बेहद ही कलात्मक अंकन किया गया है। मंदिर के सामने नंदी महाराज विराजित है। पास हीएक सती स्तंभ रखा हुआ है। किनारे पीपल पेड़ के नीचे बहुत सी भग्न प्रतिमायें भी रखी हुई है।


इस मंदिर से जुड़ी हुई दो किंवदंतियां लोगों की जुबान से सुनने को मिलती है। कहते है कि मंदिर का शिल्पी मंदिर निर्माण में इतना तल्लीन हो गया था कि उसे अपने कपड़ो का भी होश नहीं रहा। वह पूर्णतः नग्न होकर मंदिर के निर्माण में लगा हुआ था। एक दिन उसकी पत्नि की जगह उसकी बहन उसके लिये खाना लेकर आयी। बहन के सामने नग्न अवस्था में होने के कारण शिल्पी को बेहद शर्म महसूस हुई। 

उसने खुद को छिपाने के लिये मंदिर के कुंड में छलांग लगा ली। भाई के मरने के गम में बहन भी बाहर बने तालाब में कुद गई। वह पानी के कलश के साथ पानी में कुद गई थी जिसके कारण उस तालाब का नाम करसा तालाब पड़ गया। आसपास के लोगों के अनुसार तालाब के मध्य में आज भी कलश आकृति प्रस्तर है। कुंड के बारे में लोगों का कहना है कि इस के मध्य में एक सुरंग बनी हुई है जो सीधे आरंग को जाती है।  शिल्पी जब कुंड में कुदा तो तो उसे वहां सुरंग मिली। कहते है कि वह शिल्पी सुरंग में पत्थर का बन गया है। 

दुसरी किंवदंती के मुताबिक यह मंदिर छः मासी रात दिन के समय में निर्मित हुआ है जिसके कारण इस मंदिर को छमासी मंदिर भी कहा जाता है। 

इस मंदिर को कल्चुरी शासन के दौरान तेरहवी सदी में निर्मित माना गया है। अगले भाग में मंदिर के प्रतिमाओं में अंकित हाथी, शिकार एवं युद्ध दृश्य के संबंध में चर्चा करेंगे।  क्रमशः

Tuesday, 4 December 2018

Ancient fort of Balod


Witnessing the glorious history of Balod - Ancient fort .......!

Balod city is situated in the bank of the Tadula river. In 2012 Balod is separated from Durg district and now it is a new district of Chhattisgarh.


Balod is my favorite place. In Balod, along with historical and scenic spots, there is also an unparalleled confluence of the folk culture of Chhattisgarh. Like the clean water of the Tandula reservoir, the people of Balod  are also very clean and friendly with nature.

Balod is my in laws place so I am gradually becoming acquainted with every historical and scenic spot here.

The history of Balod has also been quite glorious. Here was the rule of the kalchuri  rulers  in ancient times. In the subsequent years, there has been a rule of the local Gond rulers too. There are many temples and remains of the fort built in the era of Gond kings in Balod. 

The remains of ancient fort are still in Budhapara.  Here the fort of 20 feet of high fortification in old age is still safe.  The root of the banyan tree has kept the entrance of fort. In fact, the trees also carry the obligation to save the existence of our historical heritage with our existence.

On the front of the entrance, the statue of Lord Ganesha is printed on the upper side, which is the conjecture that the  dynasty would have certainly been pursuing Ganpatya-dharma.

There must have been a very large wooden door in the entrance, as the possession of the stone has been made on both sides. These occupiers used to be used for the door. Today the banyan root is found hanging in it.

The wall of the fort is made of stone blocks.The snakes have made their residence in the entrance. Where ever was Raj Niwas or fort, in today there is a huge pond called Budha Talaab.

The local people, giving information about the fort, say that there were 153 wells in the old pond near the fort. Six secret entrances were also built in the fort. Which the king used for himself.


A worshiper's statue is kept near the entrance.  On a distance, the statue of the warriors are on the fort wall with sword and shield.

In the testimony of Balod's glorious history, the remains are now facing the neglect . There has been no concrete work in the direction of their protection till date. It is very important to keep them safe at the local level. Also, it should be promoted by adding in tourism map.

Balod is located 60 kilometers from Durg and a distance of 100 km from Raipur. Balod can be easily reached through both the road and the rail route.



Thursday, 15 November 2018

चितावरी देवी मन्दिर धोबनी

चितावरी देवी मन्दिर धोबनी....!

रायपुर बिलासपुर मार्ग में दामाखेडा ग्राम से बाये तरफ अन्दर की ओर दो किलो मिटर की दुरी पर धोबनी ग्राम स्थित है। इस ग्राम के मध्य में तालाब के किनारे चितावरी देवी का विशाल पश्चिमाभिमुख मन्दिर अवस्थित है।

यह मुलत शिव मन्दिर है। मन्दिर एक ऊँचे चबुतरे पर निर्मित है। मन्दिर का नीचे का हिस्सा पत्थर से बना है। मन्दिर का शिखर वाला भाग इंटो से निर्मित है। उपर में आमलक एवं कलश स्थापित नहीं है। . 

मन्दिर का गर्भगृह वर्गाकार है। मन्दिर के शिखर का सामने का हिस्सा क्षतिग्रस्त होने के कारन सीमेंट की ढ़लाई कर जीर्णोद्धार किया गया है। गर्भ गृह में शिवलिंग स्थापित है। शिवलिंग के बीच में दरार है। जिस पर सिन्दुर पुता है। ग्राम वासी इसको चितावरी देवी के नाम से पूजा करते है इसलिये इस मन्दिर को चितावरी देवी के मन्दिर के नाम से जाना जाता है।  


गर्भगृह का नीचे का हिस्सा लाल बलुआ पत्थरो से बना है। ऊपर का पुरा हिस्सा लाल पकी इंटो से बना है। यह मन्दिर तारे की आकृति में निर्मित है। मन्दिर के बाहरी दिवारो पर चैत्य गवाक्ष , व्याल अंकन किया गया है। मन्दिर के बाहरी तरफ दरवाजे की आकृति निर्मित है जिसमे दांये पल्ले में एक नायिका को झांकते हुए बड़ी सुन्दरता पूर्वक दर्शाया गया है। 

उसी प्रकार दुसरे तरफ के दरवाजे में दाये पल्ले में एक नायिका कमल की कली पकड़े हुए खडी है। दाये हाथ के नीचे एक पुरूष प्रतिमा बैठी हूई प्रदर्शित है।  यह मन्दिर सुरक्षित अवस्था में है। 

इंटो से निर्मित तारा आकृति के मन्दिरो में यह प्रमुख है। स्थापत्य कला के आधार पर इतिहासकार इसे सोम वंशी काल में 9 वी सदी में निर्मित मानते है!

सरगांव का धूमनाथ मंदिर

सरगांव का धूमनाथ मंदिर......!

सरगांव के धुमनाथ मंदिर का नाम मैने बहुत पहले ही सुन रखा था। प्रारंभ में इसकी वास्तविक स्थिति से परिचित नहीं था। यह मंदिर रायपुर से बिलासपुर जाने वाले मार्ग में सरगांव नामक ग्राम में स्थित है। दरअसल धुमनाथ नाम ने ही मेरे मन में इस मंदिर को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न कर दी थी।



जहां अधिकांश पुराने मंदिर खुले जगहों पर देखने को मिलते है वहीं यह धुमनाथ मंदिर घनी आबादी के बीचों बीच है। मंदिर के आसपास बिलकुल भी खाली जगह नहीं है। 

बी0एल0 नागार्च सर के अनुसार धुमनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। छ0ग0 संस्कृति विभाग द्वारा लगाये गये सूचना पटट में मंदिर की कुछ जानकारी मिलती है। सूचना पटट के अनुसार यह मंदिर भगवान धुमनाथ या धुमेश्वर शिव को समर्पित है जो कल्चुरी काल में निर्मित है।

 यह मंदिर पूर्वाभिमुख है। मंदिर गर्भगृह और अंतराल में विभक्त है। मंदिर का गर्भगृह अंदर गहराई में है। गर्भगृह में सिंदुर से पूती हुई प्रतिमा स्थापित है जिसे स्थानीय लोग धुमेश्वरी देवी के नाम से पूजा करते है।

मंदिर का शिखर धवस्त हो गया है। मंदिर के बाहरी दिवारों पर बने आलिंदों में देवी देवताओं की बहुत सी प्रतिमायें स्थापित है। चतुर्भूजी गणेश, इंद्र, अग्नि, यम, वरूण, शिव, द्विभूजी सूर्य अपने दोनो हाथ में कमल लिये, दस भुजाओं वाली चामुंडा, हरिहरहिरण्यगर्भ, महिषासुरमर्दिनी आदि देवी देवताओं की प्रतिमायें स्थापित है। इसके अतिरिक्त कुछ मिथुन प्रतिमायें भी जड़ी हुई है।

नृत्यरत अप्सरायें, योगी, ढोलवादक, ऋषि आदि की भी प्रतिमायें मंदिरों की दिवारों पर लगी हुई है। मंदिर के द्वारशाखा के दोनो तरफ गंगा यमुना एवं शैव द्वारपालों की प्रतिमायें स्थापित है।

द्वारशाखा के ललाट बिंब में चतुर्भूजी शिव अंकित है। दायें तरफ ब्रम्हा और बांये तरफ विष्णु का अंकन किया गया है। बीच में नवग्रहों का भी अंकन किया गया है। मंदिर सुरक्षित अवस्था में है। मंदिर का निर्माण काल इतिहासकारों ने तेरहवी सदी माना है।

मेरी इस मंदिर को देखने की बड़ी इच्छा थी सो पिछले वर्ष हमने पुरी कर ली। आप भी इस मंदिर को देखने जा सकते है। रायपुर से बिलासपुर मार्ग में 87 किलोमीटर की दुरी पर सरगांव नाम के छोटे से ग्राम में यह मंदिर स्थित है। कभी मदकूद्वीप या ताला जाये तो आप यह मंदिर भी देख सकते है। 
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आदित्य नायक ने बनवाया था गुरुर का काल भैरव मंदिर

बारहवीं सदी में छत्तीसगढ़ के कल्चुरी और बस्तर के नागवंश के मित्रता और शत्रुता के काल में एक राजवंश का उदय हुआ। वह राजवंश था कांकेर क्षेत्र क...