Sunday, 7 January 2024

गुप्तकालीन धरोहर एरन का संक्षिप्त इतिहास

गुप्तकालीन धरोहर एरन का संक्षिप्त इतिहास 

मध्यप्रदेश के सागर जिले में स्थित एरन पूरे भारत का एक बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है। एक समय में गुप्त, हूण, परमार, कलचुरी और स्थानीय डांगी राजाओं का महत्वपूर्ण सामरिक स्थल रहा एरन आज एक साधारण सी ग्रामीण बसाहट मात्र रह गया है। कुछ घरों और टीलो में सिमटा एरन अपने गर्भ में इतिहास की अनकही कहानियों को समेटे हुए है।

वर्तमान एरन प्राचीनकाल में एरिकिण कहलाता था। समुद्रगुप्त, भानुगुप्त, तोरमाण और सांची के अभिलेख में एरन का उल्लेख एरिकिण के रूप में मिलता है।मुगलकाल में एरन बत्तीस गांवो का प्रशासनिक केंद्र होने के कारण एरन बत्तीसी कहलाया। यहां के मध्यकालीन सती स्मारकों में एरन बत्तीसी का ही उल्लेख है।

एरन नाम पड़ने के पीछे कनिंघम ने ईरक या एरका नाम की घांस बहुतायत में उत्पन्न होने का मत दिया है वहीं काशी प्रसाद जायसवाल ने यह मत दिया है कि एरक नाम के नाग के कारण यह एरक और फिर एरन कहलाया।एरन का इतिहास नवापाषाण, कायथा संस्कृति से मिलना प्रारंभ हो जाता है। एरन में विभिन्न विद्वानों के निर्देशन में की गई खुदाई से इस काल के हथियार, औजार, आभूषण एवम अन्य विभिन्न सामग्रियां प्राप्त हुई है।

तीसरी सदी ईसा पूर्व मौर्यकाल में एरन पर सम्राट अशोक का अधिकार था। अशोक उज्जैन का प्रांतपति रह चुका था। आसपास रूपनाथ, सांची, गुर्जरा से प्राप्त अशोक के अभिलेख मौर्य आधिपत्य को प्रमाणित करते हैं। मौर्यों के बाद इस क्षेत्र पर शुंग सातवाहनो का भी आधिपत्य रहा है। सातवाहनो के बाद एरन पर शक शासको ने भी अपना शासन स्थापित किया। इसकी पुष्टि एरन से प्राप्त शक शासक श्रीधर वर्मा के अभिलेख से होती है। एरन से विजयदामन, रुद्रसेन, विश्वसेन, सिंहसेन जैसे शक शासकों के सिक्के भी प्राप्त हो चूके है। तीसरी सदी में एरन शको का सर्वाधिक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

शकों के बाद एरन पर नाग राजाओं का अधिकार रहा, नागों में यहां रवि नाग एवम गणपति नाग के छोटे सिक्के मिले हैं। गणपति नाग को गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त ने पराजित कर गुप्त सत्ता को मजबूत किया। गुप्तों ने एरन को एक महत्वपूर्ण छावनी के रुप में विकसित किया। एरन की सुरक्षा हेतु मिट्टी परकोटा बनाया गया था जो कि हूणो एवम शकों से सुरक्षा हेतु निर्मित किया गया था। आज भी परकोटे के अवशेष एरन में दिखलाई पड़ते है।

गुप्त राजाओं के इतिहास में एरन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका मिलती है। समुद्रगुप्त, बुधगुप्त, भानुगप्त के अभिलेखों, गुप्त कालीन परकोटे के अवशेष, गुप्तकालीन विभिन्न मंदिर एवम मूर्तियों के निर्माण से एरन का महत्व स्पष्ट हो जाता है।जनरल एलेकजेंडर कनिंघम ने 1874 में एरन से समुद्रगुप्त के अभिलेख की खोज की थी। उस अभिलेख के अनुसार समुद्रगुप्त अपने परिवार में पुत्र पौत्रों सहित एरिकिन नगर आया था और यहां कुछ दिनों तक निवास किया था। समुद्रगुप्त के बाद रामगुप्त मालवा का राजा हुआ जिसे शकों ने पराजित कर दिया और अपनी सत्ता स्थापित की। 

रामगुप्त के छोटे भाई चंद्रगुप्त द्वितीय ने पुन शकों को हराकर अपना राज्य प्राप्त किया। चंद्रगुप्त द्वितीय की मुद्राएं एरन से प्राप्त हुई।एरन से बुधगुप्त और भानुगुप्त के अभिलेख भी मिलते हैं जिससे यहां उनके अधिकार की पुष्टि होती है।भानुगुप्त के काल का सती अभिलेख भारत के इतिहास का महत्वपूर्ण अभिलेख है जो कि संप्रति एरन में ही है।गुप्तो के बाद एरन पर हूणो का अधिकार हुआ। एरन की प्रसिद्ध वराह प्रतिमा पर हूण राजा तोरमाण का राजत्व अवधि का लेख अंकित है।

हूणो के बाद यहां हर्षवर्धन, परमार, एवम कल्चुरी शासकों का शासन रहा। मध्यकालीन एरन पर तेरहवीं सदी में स्थानीय डांगी राजाओं का अधिकार रहा। इसके बाद यहां मुस्लिम शासकों का वर्चस्व स्थापित हो गया। शेरशाह एवम अकबर के समय एरन चंदेरी के अधीन महाल के रूप में रह गया। उस समय महाल सेना के लिए दस घुड़सवार और सौ पैदल सैनिक प्रदान करता था।

सत्रहवी सदी के उत्तरार्ध में छत्रसाल ने मुगलों से मालवा को छीनकर अपना आधिपत्य स्थापित किया। उस समय एरन छत्रसाल और स्थानीय डांगी राजाओं के अधीन आ गया। डांगी राजाओं ने प्राचीनकालीन परकोटे पर ही पत्थरों की दीवार और गढ़ बनवाया है जो आज भी एरन में दृष्टव्य है।पास के ही मंडी बामोरा एवम बीना तक रेलवे की सुविधा उपलब्ध हैं। यहां से दस पंद्रह किलोमीटर की दुरी तय कर एरन पहुंचा जा सकता है।


ओमप्रकाश सोनी

असिस्टेंट प्रोफेसर (इतिहास)

 

भानुगुप्त का ऐरन अभिलेख –सती प्रथा का प्रथम अभिलेख साक्ष्य

भानुगुप्त का ऐरन अभिलेख –सती प्रथा का प्रथम अभिलेख साक्ष्य 

भानुगुप्त का एरन अभिलेख पूरे विश्व में भारतीय इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण अभिलेख है क्योंकि , यह अभिलेख भारत में सती प्रथा का यह पहला अभिलेखीय साक्ष्य माना जाता है, और यह ऐतिहासिक लेखों में भानुगुप्त का ऐरन अभिलेख के नाम से ही लिखा जाता है।यह एरन में ही बस्ती से दूर खेतों में एक टीले पर पेड़ो के नीचे है।अभिलेख एक पांच फीट के स्तम्भ पर खुदा हुआ है। यह लेख 1874 —75 में जनरल कनिंघम द्वारा खोजा गया था। 

इस लेख की भाषा संस्कृत और लिपि ब्राम्ही है। यह गद्य और पद्य दोनों में रचा गया है। लेख में श्रावण कृष्ण सप्तमी गुप्त संवत 191 की तिथि अंकित है। तदनुसार इसे 510 ईस्वी का माना गया है।इस अभिलेख में वर्णित है कि 510 ईस्वी में गुप्त राजा भानुगुप्त के सेनापति गोपराज एरन में शत्रु पक्ष से युद्ध करने के लिए आए और अद्वितीय वीरता प्रदर्शित करते हुए वीर गति को प्राप्त हुए, तब उनकी प्रिय पत्नी भी उनके साथ अग्नि में चली गई अर्थात सती हो गई। इसमें भानुगुप्त की तुलना अर्जुन से की गई वहीं गोपराज को शरभराज का दोहित्र कहा गया है।

इस अभिलेख में पूर्व से ही शक महाक्षत्रप श्रीधरवर्मा का लेख भी खुदा हुआ था। इस लेख की खोज 1950—51 में भारतीय पुरातत्व विभाग के अधीक्षक श्री कृष्णदेव ने की थी। अभिलेख पर प्राकृत का प्रभाव है।इस अभिलेख में लिखा है शकों के महाक्षत्रप राजा शकनंदी के धर्मविजयी पुत्र श्रीधरवर्मा के राज्यकाल के सत्ताईसवे वर्ष में वैजयिक संवत्सर में उसके पुण्य वृद्धि के लिए एरीकिन अधिष्ठान में नारायण स्वामी के तीर्थ और नदी तक जानें के लिए सीढ़ियों के निर्माण उपरांत उसके सेनापति सत्य नाग जो कि महाराष्ट्र का निवासी था उसने यष्टि (स्मृति स्तंभ) स्थापित किया।

शक क्षत्रप श्रीधर वर्मा का एक अन्य अभिलेख सांची के कान्हाखेड़ा से भी मिला है। शक महाक्षत्रप श्रीधर वर्मा का राजत्वकाल 339 ईस्वी से 368 ईस्वी तक माना गया है। समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में एरिकिन के इसी शक क्षत्रप को पराजित किए जाने का संकेत है।

इस अभिलेख को वर्तमान में जीर्णोद्धार कर एक शिवलिंग की तरह प्रतिष्ठापित कर दिया गया है। यह मूल रूप से यष्टि (स्मृति स्तंभ) है जिस पर चौथी सदी में सबसे पहले श्रीधर वर्मा के नाग सेनापति सत्यनाग ने स्थापित कराया और उसी पर छठवीं सदी में भानुगुप्त के सेनापति गोपराज के वीर गति और उसकी पत्नी द्वारा अग्नि प्रवेश का प्रसिद्ध लेख अंकित किया गया।

ओमप्रकाश सोनी

असिस्टेंट प्रोफेसर (इतिहास)


एरन की महाकाय वराह प्रतिमा

एरन की महाकाय वराह प्रतिमा

एरन में विष्णु मंदिर समूह में दाएं तरफ पशु वराह की प्रचंड प्रतिमा स्थापित है। तेरह फिट ऊंची और बारह फिट लंबाई लिए यह मूर्ति भारत में वराह की सबसे विशालकाय मूर्तियों में से एक है। विशाल और प्रचंड जैसे शब्द शायद इसी मूर्ति को देखकर गढ़े गए हैं ऐसा आभास इसे प्रत्यक्ष देखने से होता है। 

गुप्तकालीन मूर्तिकला में वराह की यह मूर्ति विशेष महत्व रखती है।वराह की प्रतिमा में मुख में जिव्हा के ऊपर देवी सरस्वती विराजित है। वहीं नारी रूपी पृथ्वी देवी वराह की दाईं दाढ़ पकड़े हुए हैं। इसके पीछे प्रलय की कथा है जिसमे भगवान विष्णु द्वारा वराह अवतार धारण कर समुद्र से पृथ्वी को बाहर निकालकर कर उसका उद्धार किया गया था। 

इस कथा के अंतर्गत भारतीय मूर्तिकला में यह दो तरह की मूर्तियां बनती है पहली नृवराह की मूर्ति जिसमे उनके दांतो पर गोल पृथ्वी धारित होती है और दुसरी पशु वराह की यह वराह प्रतिमा जिसमे नारी रूपी भू देवी वराह की दाढ़ पकड़े हुए अंकित है। इस वराह प्रतिमा में बाएं तरफ से एक विशाल नाग ऊपर की तरफ उत्कीर्ण किया गया है। इसके पूरे तन पर कमंडलधारी ऋषि और देवताओं को प्रभावशाली रूप से उकेरा गया है।

वराह की यह महाकाय प्रतिमा भारतीय इतिहास में हूणो के काल की प्रतिनिधि मूर्ति है। गुप्तो के कमजोर पड़ते ही हूणो ने मालवा क्षेत्र पर अधिकार कर लिया और उनका नेता तोरमाण मध्यभारत का राजा बन गया था। हूण तोरमाण के राजत्वकाल का सूचनात्मक लेख इसी वराह प्रतिमा पर अंकित है। यह लेख सर्वप्रथम 1838 में कैप्टन टी एस बर्ट द्वारा खोज गया था।लेख तोरमाण के अधीनस्थ शासक धन्यविष्णु ने उत्कीर्ण कराया था।

इस लेख में तोरमाण के प्रथम राज्यवर्ष का मात्र उल्लेख है इसके अतिरिक्त हूणो की कोई जानकारी नहीं दी गई है। पूरा लेख अधीनस्थ महाराज धन्यविष्णु और उसके पूर्वजों के यशोगान का ही उल्लेख करता है। इसमें धन्यविष्णु के पूर्वज मातृ विष्णु, इंद्र विष्णु, वरुण विष्णु, हरिविष्णु की विशेषताओं को इंगित किया है। अभिलेख में धन्यविष्णु द्वारा एरीकिण में वराह का मंदिर बनाए जाने का उल्लेख किया गया है। तिथि के रूप में सिर्फ फाल्गुन मास के दसवां दिन ही अंकित है, वर्ष का उल्लेख नहीं है। अनुमानित है कि यह वराह मंदिर 485 ईस्वी से 500 ईस्वी के मध्य निर्मित हुआ है।

एरन मध्यप्रदेश के सागर जिले में स्थित है। एरन के पास के ही मंडी बामोरा एवम बीना तक रेलवे की सुविधा उपलब्ध हैं। यहां से दस पंद्रह किलोमीटर की दुरी तय कर एरन पहुंचा जा सकता है।

ओमप्रकाश सोनी

असिस्टेंट प्रोफेसर (इतिहास)

राज्य हेतु वराह की स्थापना... इस विश्वास से बड़ी से बड़ी वराह प्रतिमाएं बनाई गईं। यह सहिष्णु वैष्णव मत की मान्यता और पोषण का स्मारक है... विभूति और विराट स्वरूप का जैसा वर्णन गीता में है, वैसे ही रूप को विशालकाय शिलाओं, अडिग चट्टानों को तराशकर बनाया गया। वराहस्तोत्र रचे गए, वराहपुराण, वराह तंत्र और वाराही सूक्त... सामने आए। जब शैव प्रभावी हुए तो हंसवाहन ब्रह्मा की आलोचना हुई और वराह रूप विष्णु को पाताल गमन के रूप में दिखाया गया... ऐसी अनेक मूर्तियां बनाई गई हैं...। इसे वराह अरण्य के रूप में विकसित किया गया। एरिकेण नाम वही ध्वनि और अर्थ लिए है। तुम्हारे चित्र मुझे अपनी अध्ययन की मान्यताओं को कहने का अवसर दे देते हैं... चिरायु रहें।

टिप्प्णी साभार आदरणीय श्री कृष्ण जुगनू सर 🙏 

Shri Krishan Jugnu Sir

Saturday, 6 January 2024

एरन की महाविष्णु प्रतिमा

एरन की महाविष्णु प्रतिमा

एरन मुख्यतौर पर गुप्तकालीन ऐतिहासिक स्थल के रूप में जाना जाता है। यहां स्थित महाविष्णु की प्रतिमा पूरे विश्व में एरन की पहचान बन चुकी है। विष्णु की यह प्रतिमा आकार में विशाल एवं भव्यता लिए हुए हैं।

पीछे की तरफ झुकी हुई यह मूर्ति लगभग 16 फिट की ऊंचाई लिए हुए हैं। विष्णु मूर्ति मूल रूप से जहां स्थापित है वहां एक बड़ा मंदिर हुआ करता था किंतु वर्तमान में मंदिर की द्वार शाखा और अर्धमंडप मात्र ही शेष रह गया है।

चतुर्भुजी विष्णु की यह प्रतिमा खंडित हो चुकी है जिसके कारण इसके आयुध स्पष्ट नहीं है फिर भी अन्य विष्णु प्रतिमाओं की तरह यह भी शंख चक्र गदा से सुशोभित रही होगी।प्रतिमा में नीचे दोनो तरफ गदा का अंकन है किंतु वे धारित नही है।

शीश पर मुकुट पहने हुए हैं जिसमे सिंह का मुख बना हुआ है। मुखमंडल में पीछे गोलाकार प्रभामंडल निर्मित किया गया है। गले में हार पहने और हाथो में बाजूबंद से शोभित है।

अधोवस्त्र के रूप में धोती का अंकन है।पूरी प्रतिमा एक चौकोर योनिपट्ट पर स्थापित है।मंदिर की द्वार शाखा के ललाट बिंब पर गरुडवाही विष्णु अंकित है। इसके अतिरिक्त गंगा यमुना , कीर्तिमुख, नाग आदि का खूबसूरत अंकन है।

इस मंदिर से 1874 में कनिंघम को समुद्रगुप्त का लेख मिला था। जिसके अनुसार समुद्रगुप्त अपने पत्नी, बेटो और पौत्रों सहित एरिकिन में आमोद प्रमोद के लिए प्रवास किया था। कनिंघम के अनुसार यह लेख इसी महाविष्णु मंदिर से संबंधित था। इसलिए यह अनुमान किया गया कि यह मंदिर गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त के द्वारा या उसके आसपास ( चौथी पांचवी सदी)में निर्मित किया गया था।

एरन मध्यप्रदेश के सागर जिले में है।मंडी बामोरा या बीना से यहां पहुंचा जा सकता है

ओम प्रकाश सोनी

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पूर्व काल में महाकाय प्रतिमाएं बनाई गईं... यह माना गया था कि ईश्वर और उसके अवतार के विभव बड़े, विराट और महान होते ... यक्ष की मान्यताओं में इसके विकास का सूत्र निहित है। समरांगन सूत्रधार में खुले आंगन में स्थापना के योग्य मूर्तियों का  विस्तृत विमर्श आया है। ऐसा भी होता था कि मंडप दर्शकों के लिए और मुक्ताकाशी स्थिति में मूर्ति होती... शिवलिंग, कार्तिकेय, गण, गणपति भी विशाल बनाए गए। ऐरन से लेकर उदयगिरि तक वराह की विशाल मूर्तियों का रहस्य हमें वास्तुशास्त्र में मूर्तियों के अनेक रूपों के अध्ययन के लिए प्रेरित करता है।

🌻🌸 टिप्पणी साभार Shri Krishan Jugnu सर 🙏

एरन का गुप्तकालीन गरुड़ स्तंभ

एरन का गुप्तकालीन गरुड़ स्तंभ

आज आषाढ़ शुक्ल द्वादशी और त्रयोदशी दोनों ही है किंतु द्वादशी की यह तिथि ऐतिहासिक रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण है, वह इसलिए,  क्योंकि आज से 1538 वर्ष पूर्व आषाढ़ शुक्ल द्वादशी सन 484 ईस्वी के दिन एरीकिण (ऐरन जिला सागर मध्यप्रदेश) में यह गरुड़ खम्ब स्थापित किया गया था।

उस समय गुप्त अधिपति बुधगुप्त हुआ करते थे। इनके अधीनस्थ मालवा में राजा सुरश्मिचंद्र में राज कर रहे थे और एरीकिण (ऐरन) विषय में विषयपति के रूप में मातृविष्णु और धन्य विष्णु नियुक्त थे। यह वही धन्यविष्णु था जब गुप्त,  हूण शासक तोरमाण द्वारा पराजित कर दिए और तोरमाण ने मध्य भारत पर कब्जा किया तो उसकी अधीनता स्वीकार कर ली और वराह की विशाल प्रतिमा बनवाई। उस समय इसके भाई मातृविष्णु की मृत्यु हो चुकी थी । 

इन्ही दोनो भाई मातृविष्णु और धन्यविष्णु ने आषाढ़ शुक्ल द्वादशी सन 484 ईस्वी वार गुरुवार को यह गरुड़ स्तंभ स्थापित कराया और इस स्तंभ में भी वराह प्रतिमा अभिलेख की तरह ही अपने पूर्वजों का गुणगान उत्कीर्ण कराया। यह लेख 1838 में कैप्टन टी एस बर्ट द्वारा खोजा गया था और जनरल कनिंघम ने इसे अंतिम रूप से संशोधन उपरांत प्रकाशित कराया था।

यह गरुड़ स्तंभ फीट 48 ऊंचा है। ऊपर चौकी पर चारों तरफ चार सिंह निर्मित है। उसके ऊपर दोनो ही तरफ नाग पकड़े हुए गरुड़ की प्रतिमा स्थापित है। दोनो ही गरुड़ प्रतिमाएं चक्र से विभाजित है जो कि खंडित है।यह गरुड़ खम्ब गुप्त सम्राटो का राजकीय चिन्ह है। साथ ही नाग पकड़े गरुड़ नागों पर गुप्त सम्राटो की विजय का प्रतीक है। गुप्तों से पूर्व एरन पर नाग राजाओं का शासन था। यहां से गणपति नाग और रवि नाग की कई मुद्राएं भी प्राप्त हो चुकी है।

इस गरुड़ स्तंभ में और भी अन्य छोटे लेख खुदे हुए हैं। एक लेख में कुलयजगुप्तवांग कनोत्कीरणम अंकित है जो कि विद्वान कुलयजगुप्त द्वारा बुधगुप्त के लेख उत्कीर्ण करने की सूचना है। एक अन्य अभिलेख में तोरमाण के किसी सामंत का नाम मात्र उल्लेखित है।

ओमप्रकाश सोनी

असिस्टेंट प्रोफेसर (इतिहास)

Friday, 5 January 2024

भूली बिसरी विरासतों का नगर अर्थूना

भूली बिसरी विरासतों का नगर अर्थूना

राजस्थान में बांसवाड़ा और डूंगरपुर का इलाका वागड़ कहलाता है। यह वागड़ क्षेत्र वन्य संपदा और आदिवासी बहुल क्षेत्र है। माही नदी द्वारा उपजाऊ यह क्षेत्र प्राचीन काल में काफी समृद्ध रहा। वह समृद्धि यहां के पाषाण स्थापत्य में दिखलाई पड़ती है। वागड़ में विभिन्न राजवंशों ने अपनी सत्ता की धाक जमायी किंतु स्थापत्य और मूर्तिकला के उच्च कोटि के प्रतिमान स्पष्टत परमार शासकों की देन हैं। मालवा के परमार जब अपनी शक्ति सत्ता के दम पर मध्य भारत के सिर मौर बन चुके थे तब उन्होंने अपने कुटुम्बियो को नए विजित प्रदेशों में स्थापित कर आर्थिक और राजनीतिक जड़े मजबूत करने का कार्य भी किया। 

वागड़ में भी परमारों की एक शाखा स्थापित हुई। मालवा के परमार अधिपति कृष्ण राज उपेंद्र ने (809 ई. से 837 ई.) अपने द्वितीय पुत्र डंबर सिंह को वागड़ इलाके की कमान सौंपी। वागड़ में नवमी सदी में डंबर सिंह द्वारा स्थापित यह परमार शाखा बारहवीं सदी के शुरुआती दशकों तक शासन करती रही। डंबर सिंह के बाद धनिक, चच्च, चंडप कंक और सत्यराज वागड़ के राजा हुए। 

वागड़ के परमार नरेश सत्यराज (995 ई से 1020 ई) मालवपति राजा भोज के समकालीन शासक हुए। सत्यराज के बाद लिंबराज और मंडलीक (1045 ई. से 1070 ई.) वागड़ के राजा बने। फिर चामुंडराज (1070ई से 1100ई) और फिर विजयराज (1100 ई से 1108ई) हुए। विजयराज के बाद गुजरात के चालुक्यो और मेवाड़ के गुहिलो ने परवर्ती परमारों को परास्त कर इस क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। (परमार शासकों का इतिहास डी सी गांगुली)

वागड़ में वर्तमान अर्थूना ग्राम प्रत्यक्ष तौर पर परमार राजाओं की राजधानी हुआ करती थी। दुरस्थ, उजाड़ और श्री विहीन यह अर्थूना उस काल में बेहद समृद्ध नगरी हुआ करता था जिसे अभिलेखो में उत्थूनक कहा गया है। उस काल के वैभव को दर्शाते हुए आज कई पूर्ण और भग्न देवालय अर्थुना में मौजूद हैं जिनके पाषाण शिलाओ पर परमार शासकों की गौरवगाथाएं लिखी हुई है। 

लगभग एक किलोमीटर की परिधि में फैले छोटे मोटे कुल तीस मंदिरों का समूह यह बताने के लिए काफी है कि परमारों ने अपनी राज लक्ष्मी धर्म और कला को पूर्ण रूप से समर्पित कर दी थी। इन मंदिरों मे धुनी रमाते साधु, हरे भरे पेड़ों की छाया, कृष्ण मय मूर्तियों की सजीवता, शांत चित्त लोगों का देव दर्शन और पुरे इलाके में पसरी एक विरक्ति पूर्ण शांति, यहां ऐसा अनुभव होता है जैसे यहां कोई अबूझ रहस्य है जिसे सिर्फ़ अनुभव ही किया जा सकता है।

ये सारे देवालय शैव और जैन धर्म को समर्पित हैं। यहां लकुलीश मत का भी प्रभाव रहा है। ये मंदिर हनुमान गढ़ी, कंधार डेरा इन दोनो समूहों में विभक्त है। सभी मंदिरों में मंडलेश्वर शिव मंदिर सबसे प्राचीन माना गया है जिसका निर्माण 1080 ईस्वी में परमार राजा चामुंडराज ने अपने पिता मंडलीक की स्मृति में कराया था। हनुमान गढ़ी में प्राचीन गढ़ का द्वार मात्र शेष है जिसमे सोमेश्वर शिव मन्दिर हनुमान मन्दिर, बावड़ी और अन्य कई लघु मन्दिर अवस्थित है। 

सोमेश्वर मन्दिर सबसे सुरक्षित अवस्था में है। यह भव्य देवालय गर्भगृह, अंतराल और स्तंभों पर आधारित गोलाकार मंडप युक्त है। गर्भगृह का शिखर उरु शृंगो और मण्डप संवरना शैली में निर्मित आकर्षक है। मंडप में नंदी की प्रतिमा के नयन कमल पुष्प सदृश्य मोहक है। इसके पास एक हनुमान मन्दिर है जो परमार शासक विजयराज द्वारा 1108 ईस्वी में बनवाया गया था। सामने एक कनफड़े साधु का मन्दिर है, पास ही अन्य ध्वस्त शिव मन्दिर है जिसका शिवलिंग भव्य, सुगठित एवम आकर्षक है। 

गढ़ी से बाहर एवम टीले के पीछे तालाब के आसपास कई मंदिर दूर दूर तक फैले हुए हैं। इन मंदिरो में जैन मंदिर, शिव मंदिर, मुख्य है। कुछ मंदिर मुस्लिम शासकों द्वारा आक्रमण कर पुरी तरह से ध्वस्त कर दिए गए हैं। ये मंदिर अपने आकार प्रकार में बेहद ही विशाल रहें, इनकी जगती मात्र ही दो दो मंजिल ऊंची रही। इन जगती के चारों तरफ लगी चौंसठ योगिनियों की प्रतिमाओ से अनुमानित होता है कि तंत्र साधना में इनका कितना महत्व रहा। पंचायतन शैली के इन देवालयों के आज सिर्फ अवशेष बिखरे पड़े हैं जो कभी मंत्रो से गुंजायमान रहें। इनके आकर्षक तोरण द्वार और काले पत्थरों से बनी विभिन्न देव प्रतिमाएं परमार कला के उच्च सोपानों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इनमे कई मंदिर टीलो में समाए हुए थे जिनकी खुदाई कर फिर से प्रकाश में लाया गया। यहां मंदिरों में लगी असंख्य प्रतिमाएं परमार युगीन मूर्तिकला के अध्ययन के लिए सबसे उपयुक्त है। अर्थुना एवम इस पुरे वागड़ इलाके में माही के किनारे गांवो में परमार शासकों के बनाए कई देवालय है जो आज भी अनजाने से है। कभी बेहद समृद्ध नगरी रही अर्थूना आज श्री हीन है, जन शून्य है, आवागमन के उचित साधन नही है, जन सामान्य के नजरो से कहीं दूर है, फिर भी यहां परमार इतिहास की रोचकता है, शैव साधुओं की जलती धुनी है, घने जंगलों की बसाहट है, माही की शांत जलधाराएं है, और भी बहुत से अबूझ रहस्य है जो अर्थूना को अर्थूना बनाते हैं।

ओम प्रकाश सोनी

असिस्टेंट प्रोफेसर ( इतिहास)

बावन देवरी जैन मंदिर कुंभलगढ़

बावन देवरी जैन मंदिर कुंभलगढ़

राजस्थान के कुंभलगढ़ किले में अधिकांश मंदिर जैन धर्म से संबंधित है। मुख्य दुर्ग से कुछ दूर पहाड़ की तलहटी में एक विशाल जैन मंदिर अवस्थित है। यह मंदिर सुरक्षित अवस्था में है। उत्तर दिशा की ओर मुख किया हुआ यह जैन मंदिर भव्य एवम विशाल है। 

एक ऊंचे आयताकार जगती पर अवस्थित यह जैन देवालय किले का सर्वाधिक आकर्षण वाला मंदिर है। इसका कारण कुल 52 देव कुलिकाओ में निर्मित यह देवालय है। मुख्य प्रांगण में दो विशाल मंदिर है जो गर्भगृह अंतराल और मंडप में विभक्त है। किनारे चारो तरफ कुल पचास छोटी देव कुलिकाए है जिनके सामने स्तंभो पर आधारित मंडप है। 

यह देवालय बाहर से देखने से प्रतीत होता है कि कोई छोटा किला है जिसमे ये मंदिर सुरक्षित है।वर्तमान में ये सारे मंदिर प्रतिमा विहीन है। पर्यटक भी दूरी अधिक होने एवम उचित जानकारी के अभाव में यहां तक नहीं पहुंच पाते हैं।

ओम प्रकाश सोनी 

सुदृढ़ प्राचीर का गिरी दुर्ग कुंभलगढ़

सुदृढ़ प्राचीर का गिरी दुर्ग कुंभलगढ़

राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित कुंभलगढ़ दुर्ग प्राचीन गिरि दुर्ग परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण है। राजस्थान में ही चितौड़गढ़, मेहरानगढ़ और सोनार किला जैसलमेर की तरह ही यह भी महत्त्वपूर्ण दुर्ग है। मेवाड़ में कुंभलगढ़ दुर्ग चित्तौड़गढ़ के बाद दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण दुर्ग है। कुंभलगढ़ दुर्ग ने महाराणा कुंभा के शौर्य, बुद्धिमत्ता, और वीरता की कहानियों चिरकाल तक स्मृतियों में जीवित रखा हैं। 

राणा कुम्भा के काल के निरंतर युद्ध , संघर्ष के दिनों में इस दुर्ग का विशेष सामरिक महत्व रहा है। अरावली पर्वतमाला की दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में स्थित यह दुर्ग विपत्तिकाल में मेवाड़ राजपरिवार का मुख्य आश्रय स्थल रहा है। यह दुर्ग मेवाड़ कुल भूषण प्रात स्मरणीय महाराणा प्रताप के बालपन की सुनहरे पलों का साक्षी रहा है।

कुंभलगढ़ का दुर्ग कई छोटी मोटी पहाड़ियों पर बना हुआ है। यहां के घाटियों और पहाड़ियों की भौगोलिक स्थिति इस तरह से बनी हुई है कि यह किला दूर से दिखाई नहीं देता है। महाराणा कुम्भा ने मंडप नामक शिल्पी के देखरेख में इस दुर्ग का व्यवस्थित रूप से निर्माण कराया था जिसके कारण इसे कुंभलमेर भी कहा जाता है।

कुंभलगढ़ दुर्ग की सबसे मुख्य विशेषता इसकी चौड़ी और लंबी प्राचीर है जिसके कारण यह दुनिया भर में आकर्षण का केंद्र है। यह दीवार कई मील लंबी है। इसकी चौड़ाई इतनी अधिक है कि इस पर चार घुड़सवार एक साथ चल सकते हैं। प्राचीर इस तरह की गहरी और तंग घाटियों से होकर बनी हुई है कि इस पर चढ़कर या इसे तोड़कर अंदर प्रवेश कर पाना असम्भव है।

दुर्ग के अंदर एक ऊंची पहाड़ी पर अन्य दुर्ग बना हुआ है जिसे कटारगढ़ कहते हैं। कटारगढ़ भी ऊंची दीवारों और बुर्ज से सुरक्षित है इसमें भी रियासतकाल के कई महल भवन आदि बने हुए हैं। यहां तक पहुंचने के लिए पैदल ही ऊपर जाना होता है। कटारगढ़ के महलों से कुंभलगढ़ के पूरे किले का नयनाभिराम दृश्य आंखो के सामने प्रस्तुत हो जाती है। दूर दूर तक घाटियों और पहाड़ियों पर फैली दुर्ग की प्राचीर का दृश्य ऐसा काल्पनिक अनुभव उत्पन्न करता है जैसे शिवजी के गले में को लिपटा हुआ भुजंग तत्पर सा बैठा हो।

महल के पीछे की तरफ़ कुंभलगढ़ के पहाड़ियो का घना जंगल और उस जंगल का प्राकृतिक सौंदर्य दुर्ग पर पहुंचने की थकान को पल भर में दूर कर देता है। इन आधुनिक महलों का निर्माण महाराणा फतेहसिंह के काल में हुआ था। महाराणा के निजी कमरों में कई मनोहर भित्ति चित्र भी बने हुए हैं।

कुंभलगढ़ दुर्ग में नीचे प्रवेश करते ही दाईं ओर यज्ञ वेदी, कुछ जैन मंदिर , नीलकंठ महादेव का मंदिर बना हुआ है। उसे आगे ढलान में किनारे बावन देवरी नामक विशाल जैन मंदिर निर्मित है। आगे भी पहाड़ियो पर कई मंदिर और भवन बने हुए हैं। यहां माना जाता है कि इस दुर्ग में 300 से भी अधिक मंदिर है जिनमे कुछ जीर्ण शीर्ण और कुछ सही अवस्था में है।

कुंभलगढ़ दुर्ग महाराणा कुम्भा के काल में लिखी कुंभलगढ़ प्रशस्ति के लिए विख्यात है। शिलालेखो पर उस दौर के जनजीवन, भौगोलिक स्थिति, मेवाड़ महाराणाओ की वंशावली, राणा कुम्भा की विजयों का विस्तार से वर्णन मिलता है। कई श्लोकों में निहित उस दौर के इतिहास को जानने के लिए यह प्रशस्ति बेहद ही महत्त्वपूर्ण है। इस दुर्ग में ही महाराणा कुम्भा की हत्या उनके पुत्र द्वारा कर दी गई थी। मेवाड़ राजपरिवार के सतत संघर्ष, वीरता, शौर्य, युद्ध आदि की घटनाओं का साक्षी रहा यह दुर्ग सदियों से लेकर आज भी किसी अजेय योद्धा की तरह अमर है।

ओम प्रकाश सोनी

भारतीय मूर्तिशिल्प और स्थापत्य का आदर्श जगत अंबिका मंदिर

भारतीय मूर्तिशिल्प और स्थापत्य का आदर्श जगत अंबिका मंदिर

राजस्थान के उदयपुर जिले के जगत गांव में देवी अंबिका का प्राचीन मंदिर अवस्थित है। संगमरमर की दूधिया पत्थरों से बना हुआ यह देवालय नागर शैली में निर्मित है। यह गर्भगृह, अंतराल मंडप और सभा मंडप की वास्तु योजना में निर्मित है। शिखर उरू श्रृंगो से सुशोभित है। शिखर आमलक कलश युक्त ध्वजाएं स्थापित है।गर्भगृह में देवी अंबा की भव्य प्रतिमा प्रतिष्ठापित रही जो कुछ साल पूर्व ही चोरी हो चली। 

वर्तमान में देवी की नवीन प्रतिमा स्थापित की गई है।मण्डप में भगवान् गणेश की नृत्य मुद्रा की दुर्लभ प्रतिमा संरक्षित रखी हुई है। गर्भगृह का प्रवेशद्वार के ललाट बिंब पर गणेश प्रतिमा उकेरी हुई है। द्वार को विभिन्न देवी देवताओं, गंगा यमुना,  द्वारपाल, मिथुन युगल,  आदि की प्रतिमाओं से अलंकृत किया गया है।

मंदिर के मंडोवर देवी देवताओं, मिथुन युगल, अप्सराओं, व्याल, की दुर्लभ प्रतिमाओं का अनुपम संग्रह है। देवी प्रतिमाओं में महिषासुर मर्दिनी स्वरूप की कई प्रतिमाएं स्थापित है। एक प्रतिमा शुम्भ हंत्री अंबिका की है जो अपने आप में भारतीय मूर्तिशिल्प की सबसे अनोखी प्रतिमा है, ऐसी प्रतिमा आजतक देखने को नहीं मिली। अष्ट दिकपाल में छह दिकपाल की मूर्तियां भी स्थापित की गई है। 

इसके अतिरिक्त दूधिया सफेद पत्थरों से बनी हुई नायिकाओं की मूर्तियां आकर्षण का केंद्र है। संगीत मंडलिया, जन सामान्य के दृश्य और प्रेमी युगल की असंख्य प्रतिमाएं विभिन्न भाव भंगिमाओ को प्रदर्शित करती हुई शोभित है।मंदिर से जल निकासी की प्रणालिका में देवी कलश धारण किए हुए निर्मित है। यह प्रणालिक पास के अन्य छोटे देवालय से जुड़ी हुई हैं।

यह पूरा मंदिर एक परकोटे से सुरक्षित है जिसके कारण यह मुख्य सड़क से काफी नीचे है। परकोटे का मुख्य प्रवेशद्वार बेहद ही कलात्मक है। इस पर चढ़ने के लिए सीढ़ियां भी बनी हुई है। अम्बिका मंदिर के अतिरिक्त एक दो अन्य लघु मंदिर भी है। जिसमें एक मंदिर गुप्तकालीन हैं जो कि ध्वस्त होने की कगार पर पहुंच गया है।

इस मंदिर में मेवाड के गुहिल वंशी राजा अल्लट का 960 ईस्वी का लेख मंदिर के जीर्णोद्धार हेतू प्राप्त हुआ है। मेवाड के ही एक जागीरदार सामंत सिंह का भी लेख मंदिर में खुदा हुआ है जिसमे विक्रम संवत 1228 में स्वर्ण कलश दान किया था। 

यह मंदिर भारतीय स्थापत्य कला में दसवीं सदी से पूर्व निर्मित सभी मंदिरों में मूर्तिशिल्प, स्थाप्त्य, देवी प्रतिमाओं में उच्चतम प्रतिमान को स्थापित करता है। इनकी युगल प्रतिमाओं में प्रेम सौन्दर्य की मधुर बयार को अश्लीलता से दूर रखते हुए प्रदर्शित किया गया है। यदि आप इतिहास कला स्थापत्य में रुचि रखते हैं तो आपको यह देवालय जरूर देखना चाहिए क्योंकि जगत जैसा कोई नहीं।

ओम प्रकाश सोनी

आदित्य नायक ने बनवाया था गुरुर का काल भैरव मंदिर

बारहवीं सदी में छत्तीसगढ़ के कल्चुरी और बस्तर के नागवंश के मित्रता और शत्रुता के काल में एक राजवंश का उदय हुआ। वह राजवंश था कांकेर क्षेत्र क...