गुप्तकालीन धरोहर एरन का संक्षिप्त इतिहास
मध्यप्रदेश के सागर जिले में स्थित एरन पूरे भारत का एक बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है। एक समय में गुप्त, हूण, परमार, कलचुरी और स्थानीय डांगी राजाओं का महत्वपूर्ण सामरिक स्थल रहा एरन आज एक साधारण सी ग्रामीण बसाहट मात्र रह गया है। कुछ घरों और टीलो में सिमटा एरन अपने गर्भ में इतिहास की अनकही कहानियों को समेटे हुए है।
वर्तमान एरन प्राचीनकाल में एरिकिण कहलाता था। समुद्रगुप्त, भानुगुप्त, तोरमाण और सांची के अभिलेख में एरन का उल्लेख एरिकिण के रूप में मिलता है।मुगलकाल में एरन बत्तीस गांवो का प्रशासनिक केंद्र होने के कारण एरन बत्तीसी कहलाया। यहां के मध्यकालीन सती स्मारकों में एरन बत्तीसी का ही उल्लेख है।
एरन नाम पड़ने के पीछे कनिंघम ने ईरक या एरका नाम की घांस बहुतायत में उत्पन्न होने का मत दिया है वहीं काशी प्रसाद जायसवाल ने यह मत दिया है कि एरक नाम के नाग के कारण यह एरक और फिर एरन कहलाया।एरन का इतिहास नवापाषाण, कायथा संस्कृति से मिलना प्रारंभ हो जाता है। एरन में विभिन्न विद्वानों के निर्देशन में की गई खुदाई से इस काल के हथियार, औजार, आभूषण एवम अन्य विभिन्न सामग्रियां प्राप्त हुई है।
तीसरी सदी ईसा पूर्व मौर्यकाल में एरन पर सम्राट अशोक का अधिकार था। अशोक उज्जैन का प्रांतपति रह चुका था। आसपास रूपनाथ, सांची, गुर्जरा से प्राप्त अशोक के अभिलेख मौर्य आधिपत्य को प्रमाणित करते हैं। मौर्यों के बाद इस क्षेत्र पर शुंग सातवाहनो का भी आधिपत्य रहा है। सातवाहनो के बाद एरन पर शक शासको ने भी अपना शासन स्थापित किया। इसकी पुष्टि एरन से प्राप्त शक शासक श्रीधर वर्मा के अभिलेख से होती है। एरन से विजयदामन, रुद्रसेन, विश्वसेन, सिंहसेन जैसे शक शासकों के सिक्के भी प्राप्त हो चूके है। तीसरी सदी में एरन शको का सर्वाधिक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
शकों के बाद एरन पर नाग राजाओं का अधिकार रहा, नागों में यहां रवि नाग एवम गणपति नाग के छोटे सिक्के मिले हैं। गणपति नाग को गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त ने पराजित कर गुप्त सत्ता को मजबूत किया। गुप्तों ने एरन को एक महत्वपूर्ण छावनी के रुप में विकसित किया। एरन की सुरक्षा हेतु मिट्टी परकोटा बनाया गया था जो कि हूणो एवम शकों से सुरक्षा हेतु निर्मित किया गया था। आज भी परकोटे के अवशेष एरन में दिखलाई पड़ते है।
गुप्त राजाओं के इतिहास में एरन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका मिलती है। समुद्रगुप्त, बुधगुप्त, भानुगप्त के अभिलेखों, गुप्त कालीन परकोटे के अवशेष, गुप्तकालीन विभिन्न मंदिर एवम मूर्तियों के निर्माण से एरन का महत्व स्पष्ट हो जाता है।जनरल एलेकजेंडर कनिंघम ने 1874 में एरन से समुद्रगुप्त के अभिलेख की खोज की थी। उस अभिलेख के अनुसार समुद्रगुप्त अपने परिवार में पुत्र पौत्रों सहित एरिकिन नगर आया था और यहां कुछ दिनों तक निवास किया था। समुद्रगुप्त के बाद रामगुप्त मालवा का राजा हुआ जिसे शकों ने पराजित कर दिया और अपनी सत्ता स्थापित की।
रामगुप्त के छोटे भाई चंद्रगुप्त द्वितीय ने पुन शकों को हराकर अपना राज्य प्राप्त किया। चंद्रगुप्त द्वितीय की मुद्राएं एरन से प्राप्त हुई।एरन से बुधगुप्त और भानुगुप्त के अभिलेख भी मिलते हैं जिससे यहां उनके अधिकार की पुष्टि होती है।भानुगुप्त के काल का सती अभिलेख भारत के इतिहास का महत्वपूर्ण अभिलेख है जो कि संप्रति एरन में ही है।गुप्तो के बाद एरन पर हूणो का अधिकार हुआ। एरन की प्रसिद्ध वराह प्रतिमा पर हूण राजा तोरमाण का राजत्व अवधि का लेख अंकित है।
हूणो के बाद यहां हर्षवर्धन, परमार, एवम कल्चुरी शासकों का शासन रहा। मध्यकालीन एरन पर तेरहवीं सदी में स्थानीय डांगी राजाओं का अधिकार रहा। इसके बाद यहां मुस्लिम शासकों का वर्चस्व स्थापित हो गया। शेरशाह एवम अकबर के समय एरन चंदेरी के अधीन महाल के रूप में रह गया। उस समय महाल सेना के लिए दस घुड़सवार और सौ पैदल सैनिक प्रदान करता था।
सत्रहवी सदी के उत्तरार्ध में छत्रसाल ने मुगलों से मालवा को छीनकर अपना आधिपत्य स्थापित किया। उस समय एरन छत्रसाल और स्थानीय डांगी राजाओं के अधीन आ गया। डांगी राजाओं ने प्राचीनकालीन परकोटे पर ही पत्थरों की दीवार और गढ़ बनवाया है जो आज भी एरन में दृष्टव्य है।पास के ही मंडी बामोरा एवम बीना तक रेलवे की सुविधा उपलब्ध हैं। यहां से दस पंद्रह किलोमीटर की दुरी तय कर एरन पहुंचा जा सकता है।
ओमप्रकाश सोनी
असिस्टेंट प्रोफेसर (इतिहास)


















































