Sunday, 24 February 2019

अनमोल धरोहर है बाघ गुफाओं के प्राचीन चित्र

अनमोल धरोहर है बाघ गुफाओं के प्राचीन  चित्र......!

प्राकृतिक सौंदर्य एवं मनमोहक दृश्यों से परिपूर्ण परिवेश में स्थित बाघ की गुफायें अपनी अनोखी भित्ती चित्रकला के लिये पुरे विश्व में प्रसिद्ध है। धार से 90 किलोमीटर बाघ नामक ग्राम में स्थित ये गुफाये बौ़द्ध धर्म को समर्पित है। पंद्रह सौ साल पहले चटटानों को काटकर बनाई गई ये गुफायें तत्कालीन स्थापत्यकला की संुदर उदाहरण है। ये गुफायें स्थापत्यकला की दृष्टि में भले ही साधारण हो सकती है परन्तु अपने प्राचीन चित्रों के कारण पुरे भारत में विशिष्ट स्थान रखती है। इन गुफाओं में बने चित्रों की तुलना अजंता एलोरा की गुफाओं में बने चित्रों से की जाती है। बाघ के अद्वितीय सौंदर्य और भगवान बुद्ध के दिव्य संदेशों का अदभुत समन्वय यहां के चित्रों में दिखलाई पड़ता है।

प्रागऐतिहासिक काल से प्रारंभ हो चुकी चित्रकारी बाघ के चित्रों में उन मानवीय अनुभूतियों को परिलक्षित करती है जिसमें प्राकृतिक दृश्यावली और धार्मिक विचारों का अनोखा मेल है। बुद्ध के जीवनकाल से जुड़ी घटनाओं की झलक बाघ के इन चित्रों में देखने को मिलती है। बौद्ध कथानकों, बौधिसत्व, राजदरबार, की पवित्रता एवं शुद्धता इन चित्रों में महसूस की जा सकती हैं। यहां के असीमित प्राकृतिक सौंदर्य का विराट चित्रण भी इन गुफाओं में देखने को मिलता है। नदी पहाड़ भू दृश्यावली  के चित्रों में प्राकृतिक सौंदर्य के रस का वेगपूर्ण प्रवाह को चित्रित करने की कुशलता भी बेहद प्रशंसनीय है।

इन चित्रों के पीछे का आधुनिक इतिहास भी काफी रोचक है। कर्नल सी0 ई0 ल्यूवर्ड ने 1907-08 में इन चित्रों को पुनः प्रकाश में लाया। 1920 में मुकूल डे ने इन चित्रों के स्केच तैयार किये वहीं 1921 के समय में नंदलाल बोस, ए0के0 हालदार जैसे प्रतिष्ठित चित्रकारों ने बाघ की इन चित्रों की अनुकृतियां तैयार की थी। बाद में जगताप, आप्टे,भोंसले जैसे कलाकारों के दलों ने भी यहां के चित्रों की प्रतिलिपियां तैयार की।  धुयें एवं गुफा में नमी के कारण ये चित्र खराब हो रहे थे। 1982 इन चित्रों को वहां से सावधानी पूर्वक हटाकर संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया। इन चित्रों की मौलिकता बचाये रखने के लिये रासायनिक लेप का भी प्रयोग किया गया। बाघ के संग्रहालय में रखे ये पुराने चित्र आज भी कलाप्रेमियों एवं दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।

पंद्रह सौ साल बीतने के बाद भी ये चित्र एकदम नवीन और जीवंत लगते है। इन्हे चित्रित करने की कला और अमिट रंगों के पीछे की तकनीक जानने की लालसा यहां आने वाले हर कलाप्रेमी को होती है। पुरातत्व विभाग हमारी इस जिज्ञासा को काफी हद तक अपने इन जानकारियों से दुर कर देता है। बाघ गुफाओं की चित्रकारी, टेम्परा तकनीक से की गई है। इसके लिये दीवारों एवं छतों पर लाल भूरे रंग की बजरी, मिटटी एवं मिटटी के गारे का मोटा पलस्तर लगाकार आधार बनाया गया है। यदयपि मिटटी का पलस्तर मोटाई में एक समान नहीं है। फिर भी यह चटटान की खुरदरी सतह को चिकना बनाता है। पलस्तर के उपर चूने की एक परत चढ़ी है जिसके उपर चित्रकारी की गई है।

मार्शल महोदय चित्रकारी की तकनीक का विश्लेषण करते हुये लिखते है कि अजंता की तरह ही बाघ में चित्रकारी टेम्परा में की गई है न कि उस तकनीक जैसा अक्सर कहा जाता है कि ये फेस्को है। दोनो ही स्थानों पर रंग एवं प्रयोग में लाई गई पद्धति एक जैसी दृष्टिगोचर होती है। यदयपि बाघ में पहली मोटी परत बनाने में कम सावधानी बरती गई है। अजंता में यह परत स्थानीय लोह अयस्क युक्त मिटटी में कंकर, चूना, पटसन, एवं सन के रेशे मिलाकर बनाई गई है। बाघ में कार्य कुछ लापरवाहीपूर्वक किया गया है एवं इसी के परिणामस्वरूप इसका प्रथम स्तर अजंता की अपेक्षाकृत कम सुदृढ़ है।

इन चित्रों में उपयोग किये गये अधिकांश रंग द्रव्य मिटी या खनिज मूल के है। मात्र काले रंग को छोड़कर जिसे काजल के नाम से जाना जाता है। इनकी स्थानीय उपलब्धता थी। इसके अतिरिक्त बाघ में लाल लाख के उपयोग का भी विवरण मिलता हैं। गेरूआ लाल लाल रंग के लिये, गेरूआ पीला पीले रंग के लिये, पेड़ों के हरा रंग हरे रंग के लिये, लाजवर्द या लेपिस लेजुली नीले रंग के लिये एवं चूना सफेद रंग के लिये उपयोग किया गया। रंगों को घोलने एवं लगाने के लिये गोंद का उपयोग किया गया है। 

संग्रहालय में सुरक्षित इन चित्रो में धार्मिकता के बजाय भौतिकवाद अधिक परिलक्षित होता है। पेड़ पौधों पशु पक्षियों एवं बौद्ध कथानकों के दृश्यों की अदभुत चित्रकारी को देखने के बाद हर कोई मंत्रमुग्ध हो जाता है। बौद्ध कथानकों के दृश्य तो एकदम से जीवंत लगते हैं। राजदरबार के दृश्यों को देखने से लगता है कि अभी सभासदों की कोई गरमागरम बहस चल रही हो। बोधिसत्व पदमपाणि के चित्र तो हमसे संवाद करते हुये नजर आते है।



पशु पक्षियों के चित्र

पशु पक्षियों के चित्रों में पुष्प युक्त पौधों के साथ हंस का चित्रण का काफी प्रभावी लग रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि हंस उसे पौधे पर खिले सफेद पुष्प की सुंदरता से मोहित हो गया है। एक अन्य चित्र में दो गायों , पक्षियों एवं पौधों को दर्शाया गया है। गाय के गले में बंधी घंटी से आभास होता है कि ततकालीन समय में गाय का धार्मिक महत्व रहा होगा। गौ पालन पूण्य का कार्य समझा जाता था।

फूलों की बनावट भी काफी आकर्षक है। इन गुफाओं के आसपास खिलने वाले रंग बिरंगे संुदर फूलो ही चित्रण इन चित्रों में देखने को मिलता है। केवड़ा और कमल फूल की जुगलबंदी भी काफी रोचक और आश्चर्यजनक है। ज्यामितीय आकृतियों के साथ इठलाते हुये हंस का चित्रण भी काफी प्रभावोत्पादक है।

विदुर पंडित जातक -
बौद्ध कथानकों में विदुर पंडित जातक के चित्र का अंकन भी किया गया हैं। जिसके पीछे एक रोचक कथा हैं। वाराणसी के चार ब्राहमण थे जिन्होने सन्यास लिया था। उन्होने अपनी अभिलाषा एवं अच्छे कर्मो के फलस्वरूप अगले जन्म में देवताओं के राजा शक, नागों के राजा नागराज, सुपर्ण के राजा एवं कुरूओं के राजा के रूप में जन्म लिया था। संयोगवश वे चारों एक सुंदर बगीचे में मिले और एक विवाद में उलझ बैठे कि चारो में श्रेष्ठ कौन है। जब वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे तब उन्होने कुरूओं के राजा के मंत्री विदुरपंडित  की मदद ली। मंत्री ने अपने विवेकपूर्ण व्याख्या से उन सभी के सदकर्मो की सराहना की। फलक के दायीं ओर से बैठा हुआ दुसरा व्यक्ति जो श्रृंगार रहित है वो मंत्री विदुर पंडित है। विदुर पंडित के बांयी ओर कुरूओं के राजा धनंजय है। विदुर पंडित के सामने देवताओं के राजा शक एवं शक के पीछे नागराज है। नागराज के सामने बच्चे की आकृति राजा सुपर्ण की है।

बुद्ध का चमत्कार -
एक बार कालदुयी भिक्षु के आग्रह पर बुद्ध कपिलवस्तु भ्रमण हेतु सहमत हो गये। तदनुसार वह अपने बीस हजार अनुयायियों के साथ कपिलवस्तु आये। शाक्यो ने उनका सम्मानपूर्वक स्वागत किया। किन्तु वरिष्ठ शाक्य इस संशय में थे कि बुद्ध उनके पुत्र या भतीजे के समान हैं। इसलिये उनके सम्मान की आवश्यकता नहीं है। जब बुद्ध को इस बात का पता चला तब उन्होने वरिष्ठ शाक्यों को अपने बोधित्व ज्ञान से परिचय कराने के लिये उनके समक्ष एक चमत्कार करने का निर्णय लिया। तब वह आकाश की ओर उठे और अपने चरणों की धुल उनके सिर पर बिखेर दी। राजा शुद्धोधन और अन्य शाक्य उनके इस चमत्कार को देख बेहद प्रसन्न हुये और उनका सम्मानपूर्वक अभिवादन किया। फलक के मध्य में मुख्य चित्र वरद मुद्रा में बुद्ध का है जिनके चारों ओर पांच भिक्षु है।

महावस्तु अवदान की मालिनी वस्तु -
बनारस के राजकुमारी मालिनी तिष्य, कश्यप एवं भारद्वाज बौद्ध भिक्षुओ के प्रति समर्पित थी। बुद्ध एवं बौद्ध धर्म के प्रति अपनी भक्ति एवं विश्वास के कारण वह ब्राहमणों की आंखो में खटकने लगी है। तत्पश्चात उसे रास्ते से हटाने के लिये ब्राहमणों ने एक योजना तैयार की। राजा को अंतिम चेतावनी दी कि वह मालिनी अथवा ब्राहमणों में से किसी एक को चुने। तब राजा ने अनिच्छा से मालिनी को त्यागने का निर्णय लिया। हृदय विदारक समाचार सुनकर एक स्त्री जो कि मुंह ढके हुये है चित्रित फलक की दाहिनी ओर अंतपुर से निकलकर राजकुमारी मालिनी को अनपेक्षित समाचार सुनाने आयी है।

चित्रकारी के क्षय होने के कारण पर पुरातत्व विभाग प्रकाश डालते हुये कहता है कि गुफा क्षेत्र में अवसादी चटटानों के अनुक्रम में बलुआ पत्थरों एवं स्लेटी पत्थरों की प्रमुखता है। इसके अंचल में दरिया का बहता पानी एवं चटटानों के मध्य बड़ी दरारों के माध्यम से बरसात का पानी गुफाओं में रिसता है। बारी बारी से नम एवं शुष्क परिस्थितियों ने स्लेटी पत्थर को बुरी तरह से प्रभावित किया है इसके परिणामस्वरूप स्लेटी पत्थर और मिटटी की सम्बद्धता समाप्त हो रही है। ये दोनो विषम परिस्थितियां चित्रों के नष्ट होने के लिये जिम्मेदार है। इसके अतिरिक्त चटटानों के अत्यंत कमजोर गुणवत्ता वाली भौतिक संरचना, चित्रों पर धुयें एवं गर्म गैसों का प्रभाव, वर्षा के पानी का रिसाव , चमगादड़ों एवं किटाणुओं से नुकसान जैसे प्रमुख कारणों से भी चित्र खराब हुये है।





OM SONI DANTEWADA

Monday, 18 February 2019

कुछ जानी सी कुछ पहचानी सी - बाघ की गुफाये

कुछ जानी सी कुछ पहचानी सी - बाघ की गुफाये.....!

मध्यप्रदेश के धार नगर से 90 किलोमीटर की दुरी पर, विंध्यपर्वत माला की ढलान में बाघ की प्राचीन गुफाये अवस्थित है। बौद्ध को समर्पित ये गुफायें लंबे समय तक लोगों की नजरों से ओझल रही। अब भी बेहद ही कम लोग इसके बारे में जानते है। प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण होने के बावजूद तंग घाटियों एवं धुमावदार रास्तों के कारण यहां जाना बेहद ही कष्टदायक है।  

इन्हीं कठिनाईयों के चलते सामान्य पर्यटक तो यहां बेहद ही कम जाते है वहीं विदेशी एवं बौद्ध धर्मावलंबियों में इन गुफाओं को देखने की जिज्ञासा अधिक दिखलाई पड़ती है। इतिहास एवं पुरातत्व प्रेमियों के लिये ये गुफाये किसी सौगात से कम नही है। गुफाओं की वास्तुकला एवं यहां के प्राचीन भित्ती चित्र आज भी आकर्षण का केन्द्र बने हुये है। यहां के भित्ती चित्रों के कारण ये गुफायें भी अजंता की गुफाओं की तरह शोधकर्ताओं एवं कलाप्रेमियों के मध्य लोक प्रिय है। 

कहते है कि ये गुफायें बहुत ही लंबे समय तक गुमनामी मे रही जिसके कारण इन गुफाओं में बाघ निवास करने लग गये थे। इन गुफाओं से 3 किलोमीटर पहले बाघ नामक छोटा सा ग्राम है। इस ग्राम की कुल देवी मां बाघेश्वरी है जिसका भव्य मंदिर बाघ ग्राम में बना हुआ है। 

ये गुफाये जिस नदी के किनारे पर बनी हुई वह नदी भी बाघिनी नदी के नाम से ही जानी जाती है। यह नदी मां नर्मदा की सहायक नदी है। इस बाघिनी नदी और बाघ ग्राम के कारण ये गुफायें भी बाघ की गुफायें के नाम से ही चर्चित है। नदी के तल से लगभग 100 फीट उंचाई पर बांयी तट पर, चटटानों को काटकर बनाई गई ये गुफायें गुप्तयुगीन वास्तुकला की उत्तम उदाहरण है। 


बाघ की गुफाओं का इतिहास भी इन गुफाओं की तरह गुमनाम होने के साथ-साथ बेहद ही रोचक है। भारतीय पुरातत्व विभाग इन गुफाओं के इतिहास पर रोशनी डालते हुये कहता है कि महाराजा सुबंधु के ताम्रपत्र अभिलेख में बौद्ध विहारों के रख रखाव एवं टूटे हुये भागों की मरम्मत हेतु दाशिलकापिली के पाठक में स्थित एक ग्राम के अनुदान के पंजीयन का उल्लेख मिलता है। 

इसमें विहार का नाम कल्याण अर्थात कला वीथिका मिलता है। यह अभिलेख महाराजा सुबंधु द्वारा महिष्मति नगर से जारी किया गया था जिसकी पहचान आज नर्मदा नदी के किनारे महेश्वर से की गई है एवं विहार की पहचान बाघ की गुफाओं से की गई है। महाराजा सुबंधु का बड़वानी से प्राप्त एक अन्य ताम्रपत्र में कल्चुरी चेदि वर्ष 167 के आधार प्रोफेसर व्ही व्ही मिराशी ने बाघ ताम्रपत्र अनुदान की तिथी 416 - 417 ई निर्धारित की है। 

इन सभी तथ्यों से कुछ नये तथ्य सामने आते है प्रथम की इन गुफाओं का निर्माण पांचवी सदी अनुमानित किया गया है परन्तु ताम्रपत्र में इनके मरम्मत हेतु ग्राम अनुदान का उल्लेख है जिससे स्पष्ट है कि ये गुफायें पांचवी सदी से भी पूर्व में निर्मित हुई होगी।  आज हमें इन गुफाओं को बाघ की गुफाओं का संबोधन देते है किन्तु प्राचीन काल में ये गुफायें कल्याण विहार के नाम से ही जानी जाती थी। 

भौगोलिक कठिनाईयों एवं मुख्य क्षेत्र से हटकर होने के कारण कई शताब्दियों तक ये गुफायें गुमनामी में रही। 1818 ई में सर्वप्रथम इन गुफाओ का परिचय तथा विवरण लेफ्टिनेंट डैन्गरफील्ड ने बम्बई से प्रकाशित किया । 1951 में इन गुफाओं को राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया था। इनका संरक्षण एवं सुरक्षा का दायित्व भारतीय पुरातत्व विभाग को दिया गया है। 

नदी के तट पर रेतीली और भुरभुरी चटटानो से युक्त पहाड़ो का काटकर इन गुफाओं को बनाया गया है। ये गुफायें संख्या में कुल 09 है। पहली गुफा बेहद ही विशाल है। इस गुफा का नाम गृह है। दुसरी गुफा पंाडव गुफा, तीसरी गुफा हाथीखाना, चैथी गुफा रंगमहल और पांचवी गुफा पाठशाला के नाम से जानी जाती है। बाकि की चार गुफायें नष्टप्राय है। 

इन गुफाओं का सभाकक्ष बेहद ही विशाल है जिसमें एक साथ सैकड़ो लोग बैठ सकते है। छत को संभाले रखने के लिये विशाल स्तंभ बनाये गये थे। इन स्तंभों का पुरातत्व विभाग ने पुनः जीर्णोद्धार किया हे। भिक्षुओं के साधना एवं निवास के लिये बहुत सी छोटी छोटी कोठरियां बनी हुई है। पहली गृह गुफा में भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा स्थापित है। 

गुफा के बाहर भी भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा चटटान को काटकर बनाई गई है किन्तु अब यह क्षरित हो चुकी है। गुफाओं के सुक्ष्म अवलोकन से अनुमान होता है कि गुफा के बाहरी दिवारों पर देवी देवताओं और बौद्ध धर्म से संबंधित प्रतिमायें उकेरी गई थी किन्तु हजारों सालों से पड़ रही मौसम की मार ने उन प्रतिमाओं को क्षरित कर दिया। 

गुफाओं की दीवारों पर बौद्ध धर्म से संबंधित अनेक चित्र बने हुये थे किन्तु उनको नष्ट होने से बचाने के लिये चित्रों को मूलत संग्रहालय में सुरक्षित कर लिया गया है। सोलह सौ सालों में बाघिनी नदी में करोड़ो लीटर पानी बह चुका है किन्तु ये चित्र आज भी नवीन से लगते है। इन चित्रों को देखकर अनुभव होता है कि तत्कालीन समय में इस क्षेत्र की चित्रकला कितनी उन्नत थी कि आज भी ये चित्र रत्ती भर भी खराब नहीं हुये। 

ये गुफायें भी बेहद ही मनोरम स्थल पर अवस्थित है। नदी में विचरते जलीय पक्षियों के मधुर संगीत एवं नेत्र प्रिय हरियाली के कारण यहां मन रम सा जाता है। बाघ ग्राम में रूककर यहां की ग्रामीण संस्कृति को समझते बुझते इन गुफाओं की चित्रकारी और वास्तुकला का अवलोकन करना बेहद ही रूचिकर है। मैं आजीवन श्री नंदकिशोर प्रजापति श्री जितेन्द्र राष्ट्रवादी श्री कपिल पांचाल और श्री विजय डोडिया का आजीवन ऋणी रहुंगा। इनके सौजन्य से मुझे बाघ की गुफाओं को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 

इन चारों मित्रों के साथ बिताया हर एक पल एक स्वर्णिम पल था। मुझे तनिक भी आभास नहीं हुआ कि हम फेेसबुक से निकलकर पहली बार मिले है। इनके आत्मीयपन से ऐसा ही लगा जैसे हम बचपन से पक्के मित्र रहे है। वाकई वह दिन मेरे जीवन का बेहद ही अनमोल दिन था। इसकी स्मृतियां सारी जिंदगी साथ रहेगी। ह्रदय से बहुत बहुत प्रेम और धन्यवाद। 
ओम सोनी दंतेवाड़ा









Monday, 11 February 2019

धार की लाट में छिपी है कहां राजा भोज कहां गंगू तेली की कहानी

धार की लाट में छिपी है कहां राजा भोज कहां गंगू तेली की कहानी.....!

कहां राजा भोज कहां गंगू तेली इस सदियों पुरानी कहावत का प्रयोग किसी की वास्तविक सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति बताने के संदर्भ में ही प्रयोग होते देखा है। प्रायः हम  सभी ने यह कहावत कहीं ना कही अवश्य सुनी है। इस कहावत का एक पक्ष तो यह स्पष्ट कर देता है कि यह निश्चित तौर पर राजा भोज से ही जुड़ी है और दुसरे पक्ष में तात्कालिक तौर पर किसी गंगू तेली से जुड़े होने का ही आभास होता है। दुसरे पक्ष मंे अस्पष्टता के साथ कई सारी किंवदंतियां भी जुड़ी हुई है जो समय के साथ बदली भी है। इस कहावत के पीछे का इतिहास जानने से पहले राजा भोज के संक्षिप्त इतिहास को भी जानना आवश्यक हो जाता है।

मालवा के परमार शासकों  में मुंज के बाद भोज महाप्रतापी राजा हुये। इनका राजत्वकाल 1010 ई से 1055 ई तक माना गया है। उदयपुर की प्रशस्ति से इसके राजनैतिक उपलब्धियों की विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है जिसके अनुसार भोज ने चेदिश्वर, इंद्ररथ, तोग्गल, राजा भीम, कर्नाट, लाट व गुर्जर राजाओं तथा तुर्को को पराजित किया। इसने अपने बाहुबल से मालवा को मध्य भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य बना दिया था। हमारे इतिहास में राजा भोज की ख्याति युद्ध विजयों की तुलना में विद्वता तथा विद्या कला के संरक्षक रूप में अधिक है। भोज ने परमार राज्य की राजधानी उज्जैन से हटाकर धारा में स्थानांतरित कर उसे विविध प्रकार से अलंकृत किया। राजा भोज के प्रयासों के कारण ही धारा मध्य भारत का शिक्षा एवं कला का सुप्रसिद्ध केन्द्र बन गया।

भोज ने धारा में सरस्वती कंठाभरण या भोजशाला नामक संस्कृत विद्यालय की स्थापना की। उसने महान मुर्तिकार मंथन की सहायता से इसमें भुरे रंग की स्फटिक पत्थर से वाग्देवी सरस्वती की प्रतिमा का निर्माण करवाया और 1034 ई में इसकी मंदिर में स्थापना करवाई। भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार का प्रतीक चिन्ह वाग्देवी प्रतिमा इसी की प्रतिकृति है। मुस्लिम शासको ने आक्रमण के दौरान इस भोजशाला को ध्वस्त कर दिया गया तथा इसके अवशेषों पर कमाल मौला मस्जिद का निर्माण हुआ।

राजा भोज ने तेलंगाना विजय की स्मृति में लौह स्तंभ (लाट) की स्थापना की। भारत में मेहरौली के बाद यह दुसरी लाट है जो अपने युग की अद्वितीय कृति है।  इसकी ख्याति दुर देशों तक फैली हुई है। यह लाट वर्तमान में धार के ईदगाह के पास ही तीन खंडो  में सुरक्षित है। इसी लाट के कारण पास वाली मस्जिद को लाट मस्जिद भी कहा जाता है।  जहां पर यह स्थापित थी वहां इसके अवशेष अभी भी विद्यमान है। 

कहां राजा भोज कहां गंगू तेली की इस कहावत की उत्पत्ति का मूल कारण यही लाट है जिसके कारण यह कहावत आज पुरे भारत में प्रचलित हेै। इस लाट से जुड़ी जानकारी जहांगीर द्वारा लिखित तुजूके जहांगीरी में भी मिलती है - जहांगीर लिखता है कि धारानगरी एक बड़ा शहर है। यहीं पर हिन्दुस्तान का बड़ा राजा भोज हुआ। देहली के बादशाह सुल्तान फिरोज के लड़के सुल्तान मोहम्मद के जमाने में उम्मीदशाह गोरी जिसका दुसरा नाम दिलावर खां गोरी था और वह मालवे का हकीम था। किले के बाहर वाले इलाके मे मस्जिद बनाकर लोहे की लाट खड़ी की थी। इसके बाद जब सुल्तान गुजराती ने मालवे पर कब्जा कर लिया तब इसने इस लाट को गुजरात ले जाना चाहा। परन्तु बेऐतिहाती से यह उस समय टूट गई। 

कुछ विद्वानों के मुताबिक यह लाट राजा भोज का विजय स्तंभ था। राजा भोज ने दक्षिण के चालुक्यों और त्रिपुरी के कल्चूरियों पर विजय के उपलक्ष्य में यह लाट स्थापित कराई थी। इस लाट के विषय में रोचक किंवदंती जुड़ी हुई है - एक समय में धारा नगरी में गांगली (गांगी) नाम की तेलन रहा करती थी। उसका डील डौल राक्षसी के समान था। यह लाट उसकी तुला के बीच का डंडा था। लाट के पास रखे बड़े बड़े पत्थर उसके वजन करने के बांट थे। उसका घर धार के पास नालछा में था। धार और मांडू के मध्य नालछा के पास एक पहाड़ी उसी के लहंगा को झाड़ने से गिरी हुई रेत से बनी थी। इसी कारण उस पहाड़ी को तेलन टेकरी के नाम से जाना जाता है। इसी तेलन और राजा भोज के लक्ष्य में रखकर लोगों के मध्य यह कहावत चली कि कहां राजा भोज और कहां गांगली तेलन। इस कहावत का तात्पर्य यह था कि तेलन इतने विशाल डील डौल वाली थी फिर भी वह राजा भोज की बराबरी नहीं कर सकती थी। आशय यह है कि सिर्फ शरीर से बलशाली होना ही पर्याप्त नहीं होता वरन बुद्धि से भी तेज होना आवश्यक है। 

कल्चूरी गांगेयदेव और तिलंगाने (दक्षिण) के चालुक्य जयसिंह द्वितीय पर राजा भोज की विजय के तार भी इसी लाट से जुड़ते है। इस आधार पर विद्वानों ने इसका नाम गांगेय तिलंगाना लाट अनुमानित किया है। जयसिंह द्वितीय द्वारा धारा पर आक्रमण के दौरान उसके डेरे नालछा के समीप पहाड़ी पर अनुमानित किये गये है जिसके कारण वह पहाड़ी तेलंगानी टेकरी हो गई। इसके बाद वहां के लोग लाट और टेकरी के असली संबंधो को भूल गये और कहां राजा भोज कहां गंगू तेली के कहावत में इन नरेशों के जगहों गांगली तेलन या गंगू तेली का नाम जोड़ दिया। संभव है कि गांगेय का निरादर सुचक नामक गंगू और तेलंगानी का तेलन या तेली हो गया हो। 

इस संबंध में एक श्लोक इस कहावत से जुड़ता है। डा प्राणनाथ शुंक ने अपने एक लेख में लिखा है कि भोज की पाठशाला में एक श्लोक खुदा हुआ है जिसका भावार्थ इस प्रकार है -
जिस प्रकार भगवान श्री कृष्ण ने गांगेय नामक शक्तिशाली राक्षस को और पांडव गांगेय (भीष्म) को मारकर संतुष्ट हुये। उसी प्रकार हे भोज! तु भी त्रिपुरी के गांगेय देव और तेलंगाने की राजधानी कल्याणपुर के चालुक्य नरेश को पराजित कर प्रसन्न हुआ। (वीणा अभिषेकांक डा प्राणनाथ )

उक्त अनुमानों के आधार पर कहां राजा भोज कहां गंगू तेली की कहावत गांगेय देव कल्वूरी और दक्षिण के चालुक्य राजा की पराजय से जुड़ी होनी प्रतीत होती है। धार में रखी वह लाट इस कहावत की जीवंत साक्षी है। इसी लाट के कारण यह कहावत कहां राजा भोज कहां गंगू तेली पुरे भारत में प्रचलित है। 

संदर्भ:- 1. प्राचीन भारत नवीन सर्वेक्षण - पप्पू सिंह प्रजापत 2018 पृ. 481
2. हजरत मौलाना कमालुददीन चिश्ती रह0 और उनका युग - रामसेवक गर्ग 2005 पृ. 130
3. राजा भोज -श्री युत विश्वेश्वरनाथ रेउ 1932 पृ. 89 

आलेख - ओम सोनी दंतेवाड़ा

श्री कलिका प्रसन्ना भवदा वरदात

धार की गढ़कालिका माता जी......!

धार नगर में मूंज सागर के पास स्थित एक छोटी सी पहाड़ी पर कालिका माता जी का प्राचीन मंदिर स्थित है। यहां के स्थानीय लोग देवी को गढ़कालिका माता के नाम से पूजते है। यह देवी धार के रियासत कालीन पवार राजाओं की कुल देवी है। यह प्राचीन होने के साथ-साथ आस्था का केंद्र है। कई लोग देशभर से अपनी मन्नतें पूरी होने के बाद माता जी के दर्शनों के लिए यहां आते है।
श्री कलिका प्रसन्ना भवदा वरदात

धार की देवीजीके प्रति लोगों की गहरी आस्था है। अन्य प्रांतो से भी यहां लोग मन्नत मांगने आते है। यहां प्रचलित मान्यतानुसार श्रद्धालु यहां उल्टा स्वस्तिक बनाकर यहां जाते है और मन्नत पूरी होने पर सीधा स्वस्तिक बनाते है। साथ ही अपनी मान्यतानुसार चढ़ावा भी अर्पित करते हैं। कई लोग अपनी कुलदेवी के रूप में इनका पूजन करते हैं। 

मंदिर तक जाने के लिये पक्की सीढ़ियां बनी हुई है। गर्भगृह में देवी की भव्य प्रतिमा स्थापित है। यह मंदिर बहुत प्राचीन है। परवर्ती काल में इसका जीर्णोद्धार किया गया है।  मंदिर को लोग देवी का शक्तिपीठ भी मानते है। 
श्री कलिकादेवी

मंदिर गर्भगृह, अंतराल और मंडप में विभक्त है। बाहरी दिवारें बेहद ही सादी है।  गर्भगृह से जलनिकासी के लिये मकरमुख प्रणालिका बनी हुई है। मंदिर के बाहर दीपमालिका स्थापित है। 
 प्राचीन मंदिर

नवरात्र के समय यहां पर भक्तों की काफी भीड़ रहती है। मंदिर परिसर में बाहर की तरफ कई दुकाने सजी हुई है। आसपास का माहौल भी बेहद ही शांत एवं भक्तिमय है। सामने मुंज सागर  में आज भी परमार युगीन इतिहास की झलक दिखलाई पड़ती है। 

उंची पहाड़ी पर होने के कारण धार नगर की मनमोहक खुबसूरती स्वागत करती हुई दिखलाई पड़ती है। यहां से धार के माहौल में  परमार ,और मराठा शासकों के शासन काल की महक महसूस की जा सकती है। 
अन्य पहाड़ी पह स्थापित मंदिर

मन्नत पुरी होने पर लोग यहां पर बकरे की बलि भी चढ़ाते है। गाजे बाजे के साथ यहां पर कुछ लोग बकरों को मंदिर में ले जा रहे थे। यह नजारा मेरे सामने ही घटित हुआ है। गढ़कालिका माता जी का मंदिर धार के प्रमुख मंदिरो मे से एक है। यहां दर्शन करने से सारे बिगड़े काम बन जाते है।
धार नगर का मनमोहक दृश्य

ऐतिहासिक मुंज सागर

गाजे बाजे के साथ बकरों को बलि के लिये लाते हुये श्रद्धालु

108 दीपों की प्राचीन दीपमालिका

Sunday, 10 February 2019

भोजशाला की मां वाग्देवी

भोजशाला की मां वाग्देवी ....!

राजा भोज अपने समय के महाप्रतापी व बेहद लोकप्रिय राजा थे. भारत के इतिहास मे विद्वान राजाओ मे राजा भोज का नाम बेहद ही सम्मान से लिया जाता है. इतिहासकारो ने राजा भोज का कार्यकाल 1010 ईस्वी से 1055 ईस्वी अनुमानित किया है. छियालिस साल के शासन अवधि मे राजा भोज ने मालवा को मध्य भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य बना दिया. राजधानी धारा को मध्य भारत का सुप्रसिद्ध शिक्षा एवं कला का केन्द्र बनाने मे राजा भोज का अमूल्य योगदान था.
भोज ने धारा मे सरस्वती कंठाभरण या भोजशाला नामक संस्कृत विद्यालय की स्थापना की. उसने महान मूर्तिकार मंथन की सहायता से भूरे रंग के स्फटिक पत्थर से वाग्देवी (सरस्वती) की प्रतिमा का निर्माण करवाया तथा 1034 ईस्वी मे इस प्रतिमा की मन्दिर मे स्थापना करवाई. भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार का प्रतीक चिन्ह वाग्देवी प्रतिमा इसी की प्रतिकृति है. भोज का सरस्वती कंठाभरण काव्य वाग्देवी के स्तुति से ही प्रारंभ होता है.( संदर्भ - प्राचीन भारत नवीन सर्वेक्षण - पप्पू सिंह प्रजापत जी)
वाग्देवी की यह प्रतिमा वर्तमान मे लंदन के संग्रहालय में रखी हुई है.वाग्देवी की यह प्रतिमा बेहद भव्य है. प्रतिमा शिल्प के गुणों के आधार पर देवी की यह प्रतिमा बेहद ही विशेष एवं दुर्लभ है.

इस प्रतिमा मे तत्कालीन भारत के विभिन्न शैलियों का अद्भुत संयोजन देखने को मिलता हैं.विश्वेश्वरनाथ जी अपनी कृति राजा भोज मे इस प्रतिमा से जुड़ी बेहद मह्त्वपूर्ण जानकारी साझा करते है. उनके मुताबिक 1924 मे कलकत्ता से प्रकाशित रुपम मे उक्त प्रतिमा का चित्र और उसके सम्बन्ध मे एक लेख प्रकाशित हुआ है.
उसमे लिखा है कि इस मूर्ति के कुछ आभूषण जैसे मुकूट आदि चोल मूर्तियो के आभूषणो से मिलते हैं. इसी प्रकार भूजाओ के आभूषण पुरानी पाल मूर्तियो और उड़ीसा के मूर्तियो से मिलते हैं. यह मूर्ति एलोरा के शिल्पकला के आधार पर ही बनी प्रतीत होती है. इसके पैरो के नीचे खुदा हुआ लेख इस प्रकार पढा गया है - श्रीमध्दोर्जनरेन्द्रचन्द्रनगरी विध्या (द्या) धरीमो (मा) न घि: (घी:) नमस (नामस्या) स्म.... खलुसुखं प्रप्यन (प्राप्यानया) याप्सरा:
वाग्देवीप्रतिमां विधाय जननीं यस्यार्ज्जितानाम त्रयी...... फ़लाधिकां घरसरिन्मूति शुभां निम्मर्मे.
इति शुभम. सुत्रधार सहिर सुत मनथलेन घटितम. वि... टिक सिवदेवेन लिखितं. इति सम्वत 1061( इस्वी 1035)

आलेख - ओम सोनी दन्तेवाडा
छायाचित्र नेट से ली गयी है.

Saturday, 9 February 2019

धार दुर्ग का अनजाना इतिहास

धार दुर्ग का अनजाना इतिहास......!

सदियों से धार नगर की सुरक्षा का भार उठाये हुये धार का यह दुर्ग (किला) परमारयुगीन गौरवशाली इतिहास का साक्षी रहा है। सल्तनत कालीन उठापटक से लेकर ब्रिटिशकाल की कुटिल चालों के बीच बहुत सी क्षतियों को सहते हुये आज भी शान से खड़ा है। इस दुर्ग ने राजा भोज के समृद्धशाली शासन को बेहद ही करीब से महसूस किया है। मध्यकाल में खिलजी और गौर सुल्तानों के आपसी झगड़ो का भी गवाह यही किला है। धार दुर्ग ने मुगलों का स्वागत किया तो इसी किले के अंदर पेशवा बाजीराव द्वितीय का जन्म भी हुआ है। अंग्रेजों ने तो इस किले को नेस्तोनाबूद करने की सौगंध ही खा ली थी किन्तु सौभाग्यवश यह किला अपना अस्तित्व बचाने में कामयाब रहा।

इस किले के प्राचीन इतिहास को देखने के लिये हमें हजार साल पीछे जाना आवश्यक हो जाता है। 1010 ई से 1055 ई तक राजा भोज के काल में धार का वैभव चरम सीमा पर रह। राजा भोज के काल में धार देवालयों, फव्वारों, और उदयानों से सुसज्जित था। राजा भोज के काल में यह दुर्ग धारागिरी लीलो्दयान के नाम से प्रसिद्ध था। परवर्ती परमार शासकों के समय इस लीलोदयान का दुर्गीकरण किया गया था। तेरहवी सदी में परमारों के प्रधानमंत्री गोगा चैहान से इसे महत्वपूर्ण सैन्य केन्द्र के रूप में विकसित किया था।  

1305 ई में मालवा विजय के बाद अलाउददीन खिलजी ने आईन उल मुल्क को मालवा का सुबेदार नियुक्त किया। आईन उल मुल्क ने आक्रमण के दौरान इस किले के प्रवेशद्वार को तोड़ कर दुर्ग पर कब्जा कर लिया। आईन उल मुल्क ने इस किले को मैदानी दुर्ग के रूप में विकसित कराया। इस किले का पुर्ननिर्माण आईन उल मुल्क ने प्रारंभ कराया और मुहम्मद तुगलक के काल में यह लगभग तीस वर्षो में पूर्ण हुआ। दिल्ली सुल्तानों के समय किले में सैनिकों के बैरक और आवासीय भवनों का निर्माण कराया गया। 

मध्यकाल में पंद्रहवी सदी के प्रारंभ तक दिलावर खां गोरी के समय तक शासन की सारी गतिविधियां धार के इस किले से संचालित होती थी। होशंगशाह के शासक बनते ही 1407 में गुजरात के सुल्तान मुजप्फर शाह ने आक्रमण कर दिया। होशंगशाह ने भागकर इसी किले में शरण ली। मुजफरशाह ने होशंगशाह को बंदी बनाकर किले का शासन भार अपने भाई नुसरतशाह को सौंप दिया। मालवी सैनिकों के आक्रमण के कारण नुसरतशाह को किले को छोड़कर भागना पड़ा। 

बाद में मुजफफर शाह ने अहमदशाह को आक्रमण के लिये भेजा। अहमदशाह ने फिर से धार नगर पर कब्जा कर लिया। 1531 में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने धार किले पर अधिकार कर लिया था। इस प्रकार सल्तनत काल से मध्यकाल तक इस किले की दीवारों ने बहुत से आक्रमणों को झेलते हुये मुगलकाल में भी अपना महत्व बनाये रखा। मुगलों में अकबर, जहांगीर और शाहजहां ने कई बार धार आये और इसी दुर्ग में अपने पैरों को विश्राम दिया। 

मुगलों के काल तक अपनी महत्ता बनाये रखने में कामयाब यह दुर्ग 18 वी सदी में पवारों के हाथो में आ गया। 1735 में पेशवा ने धार दुर्ग को आनंदराव पवार को दे दिया। उसका उत्तराधिकारी यशवंतराव पवार 1761 ई में पानीपत के युद्ध में मारा गया। मराठों के काल में इस दुर्ग की मरम्मत करवायी गई। मराठो ने इस किले में ही खरबूजा महल का निर्माण कराया गया।  


पूना के पेशवा राघोबा ने अपने पत्नी आनंदीबाई को सुरक्षा कारणो से धार दुर्ग में भेजा। आनंदीबाई अपने समय की अद्वितीय सुंदरी और महत्वाकांक्षी महिला थी। इसी दुर्ग में खरबूजा महल में आनंदीबाई ने पेशवा बाजीराव द्वितीय को जन्म दिया। अंग्रेजों की योजना थी कि इस दुर्ग को पुरी तरह से तोड़ दिया जाये किन्तु सौभाग्य से नगर के मध्य प्राचीन स्थापत्य कला की यह विरासत बची रह गई।


किले के बुर्ज बड़े ही मजबूत और संतुलित है। किले में प्रवेश करने के लिये तीन द्वार बने हुये है। यह किला वैसे तो मैदानी दुर्ग है फिर भी धरातल से इसे कुछ उंचाई पर ही बनाया गया है। हजार साल के कालखंड में इस किले ने बहुत से उतार चढाव देखे। कई आक्रमणों के बावजूद भी यह किला नजरों से नजर मिलाते हुये पुरे शान से खड़ा है। 
संदर्भ:- धार एंड मांडू - लार्ड मेजर
मौलाना कमालुददीन चिश्ती और उनका युग - रामसेवक गर्ग
आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया

ओम सोनी दंतेवाड़ा

आदित्य नायक ने बनवाया था गुरुर का काल भैरव मंदिर

बारहवीं सदी में छत्तीसगढ़ के कल्चुरी और बस्तर के नागवंश के मित्रता और शत्रुता के काल में एक राजवंश का उदय हुआ। वह राजवंश था कांकेर क्षेत्र क...