Tuesday, 15 July 2025

आदित्य नायक ने बनवाया था गुरुर का काल भैरव मंदिर

बारहवीं सदी में छत्तीसगढ़ के कल्चुरी और बस्तर के नागवंश के मित्रता और शत्रुता के काल में एक राजवंश का उदय हुआ। वह राजवंश था कांकेर क्षेत्र का सोमवंश। बारहवीं सदी से लेकर चौदहवीं सदी तक कांकेर क्षेत्र में सोमवंशी शासकों का शासन हुआ करता था। इस राजवंश में सिंहराज, बाघराज, कर्णराज, पंपराज, भानुदेव जैसे प्रसिद्ध और प्रतापी राजा हुए। सिहावा अंचल का कर्णेश्वर महादेव मंदिर इन्हीं सोमवंशी शासकों द्वारा निर्मित है। इन राजाओं ने अपने इस पूरे कांकेर अंचल में कई मंदिर और मूर्तियां का निर्माण कराया। ऐसा ही एक मंदिर गुरूर में भी बना हुआ। 

बालोद जिले के गुरुर गांव में एक प्राचीन मंदिर है जिसे देऊर मंदिर कहा जाता है। यह काल भैरव को समर्पित है। मंदिर गर्भगृह अन्तराल और मंडप में विभक्त है। गर्भगृह वर्तमान में रिक्त है। मंडप चार साधारण स्तंभों पर आधारित है। यह मंदिर दक्षिण के चालुक्य शैली में निर्मित है। इस आधार पर इस मंदिर को आजकल सातवीं आठवीं सदी में बना हुआ कहा जाने लगा है। मूलतः यह मंदिर बारहवीं सदी सोमवंशी राजा बाघराज के नायक आदित्य देव द्वारा निर्मित है। इस मंदिर में कालभैरव की प्रतिमा रही होगी जो अब मंदिर में नहीं है। 

इस मंदिर का अभिलेख पास के खेत में पड़ा हुआ है। जिससे मंदिर के इतिहास पर प्रकाश पड़ता है। अभिलेख नागरी लिपि और संस्कृत भाषा में है। अभिलेख का मूल पाठ रायबहादुर हीरालाल ने प्रस्तुत किया है।  अभिलेख की निचली पंक्तियां घिस गई जिसके कारण पूरा पाठ उपलब्ध नहीं है। (संदर्भ इण्डियन एंटीक्वेरी 1926 पृष्ठ 44)

स्वस्ति काकरय

परम महेश्वर 

सोम कुल तिलक 

राणक श्री वाघराज 

राज्य नायक श्री आदित्येव  

श्री उमानाथ श्री कालभैरव 

भूमि प्रदत्ता राज्य भविष्यति तस्य अहम कृत

इन पंक्तियों से स्पष्ट है कि काकरय (कांकेर) के सोम कुल तिलक राणक श्री वाघराज के राज्य में नायक श्री आदित्य ने श्री उमानाथ (शिव) और श्री कालभैरव को भूमि अर्पित की।

इस अभिलेख और सोमवंशी राजा बाघराज के शासन अवधि से स्पष्ट है कि कालभैरव का यह मंदिर इस आदित्य नायक ने बारहवीं सदी में बनवाया था। 

धमतरी से बालोद जाने वाले मार्ग में गुरुर कस्बे में यह कालभैरव को समर्पित प्राचीन मंदिर अवस्थित है। 



तालाबों के साथ संरक्षित है धमधा का इतिहास

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में शिवनाथ नदी के तट पर स्थित है एक महत्त्वपूर्ण नगर धमधा। छ कोरी छह आगर तरिया वाली कहावत अर्थात 126 तालाबों की नगरी धमधा तालाबों की नगरी के साथ ही ऐतिहासिक महत्व की नगरी भी है। यहां इतिहास और तालाबों का आपस में गहरा संबंध है। यहां के सभी स्थानीय शासकों ने तालाबों के निर्माण में विशेष रुचि ली है जिससे धमधा का यह ऐतिहासिक नगर ऐसा लगता है जैसे तालाबों पर तैरती कोई पुरानी बसाहट हो। बारहों मासी पानी से परिपूर्ण तालाबों के बीच इस नगर का अपना एक समृद्ध इतिहास भी है। कल्चुरी शासन काल के यहां कई अवशेष बिखरे पड़े हैं। 

धमधा में त्रिमुर्ति महामाया का प्राचीन मंदिर है जो लक्ष्मी काली और सरस्वती को समर्पित है। देवियो की प्रतिमा सिंदूर से पुती हुई है जिससे उनकी पहचान किया जाना संभव नहीं है। महामाया मंदिर के द्वार पट्ट पर  संस्कृत का लेख मौजुद है जो संभवत कल्चुरी शासकों द्वारा अंकित होना चाहिए। आश्चर्य होता है कि यह लेख अभी तक ना ही अनुवादित है और ना ही कहीं प्रकाशित है। निश्चित ही इस अभिलेख के पाठन से धमधा के इतिहास में नई कड़ियां जुड़ेगी।महामाया मंदिर के आकर्षण का केंद्र है उसका पुराना विशाल प्रवेश द्वार जिस पर विभिन्न देवी देवताओं और दशावतार की प्रतिमाएं लगी हुई है जो कल्चुरी काल की प्रतीत होता है। 

कल्चुरी शासकों के बाद इस क्षेत्र में गोंड शासकों का आधिपत्य स्थापित हुआ। इन गोंड शासकों का एक लंबा शासन धमधा में चला। दुर्ग जिले का गजेटियर के अनुसार सरदा के गोंड जमींदार भाईयो ने धमधा की पुनर्स्थापना की थी। उन्हें सरदा का परगना भी रतनपुर के राजा ने एक पागल हाथी को वश में करने के बदले उपहार में दिया था। यहां गोंड जमींदार को पंच भैया गोंड राजा कहा जाता था जिसका कारण यह है कि ये पांच भाई किसी भी युद्ध में आपस मे गोलाकार बनाकर या एक साथ आगे पीछे घूम घूम कर लड़ते थे।

इन गोंड जमींदारो की एक वंशावली का उल्लेख धमधा के स्थानीय युवा इतिहासकार श्री गोविंद पटेल जी करते हुए लिखते हैं कि धमधा के दाऊ स्व. रामजी अग्रवाल की हस्तलिखित डायरी के अनुसार एक हजार साल पहले धमधा खंडर और जंगल था। वहां कुछ मंदिर, कुंड और प्राचीन मूर्तियों के अवशेष बिखरे पड़े थे। यह किस राजा का राज्य था, किसी को नहीं मालूम है।

सरदा के राजा सांड-विजयी 11-12वीं सदी में यहां पहुंचे। उन्होंने धमधा की पुनर्स्थापना की। उनके राजवंश की सूची इस प्रकार है।

1.      सांडदेव- सन् 1165

2.      राजा बेन- सन् 1225

3.      अवधूत सिंह- सन् 1303

4.      गोरखसाय- सन्1338

5.      बरियार सिंह- सन् 1365

6.      जयभिमान- सन् 1385

7.      मधुकर साय- सन् 1428

8.      रेवासाय- सन् 1488 (सबसे चर्चित राजा)

9.      जयसिंह साय-

10.  दशवंत सिंह- सन् 1589 (महामाया मंदिर के संस्थापक)

11.  अपरबल सिंह- सन् 1630 (संतान विहीन)

12.  मेर सिंह- सन् 1674 (अपरबल सिंह का भतीजा)

13.  भवानी सिंह- सन् 1743 (तोप से बांधकर उड़ा दिया गया)

बाद में भोसले शासकों ने धमधा में विभिन्न कमाउसदार नियुक्त कर शासन प्रशासन चलाया।1855 में अंग्रेज शासक सी इलियट ने धमधा में कैंप किया। (स्त्रोत- डॉ. रमेंद्रनाथ मिश्र- अभिलेख साक्ष्य)

1856 में धमधा में नायब तहसीलदार का कार्यालय बना। उस समय रायपुर में छह हजार घर, रतनपुर में तीन हजार घर और धमधा में एक हजार घर होते थे।1856 में धमधा थाना रायपुर तहसील के अंतर्गत आता था। 1857 में धमधा तहसील मुख्यालय को बदलकर दुर्ग तहसील बना दिया गया।(संदर्भ श्री गोविंद पटेल जी धमधा)

धमधा में मध्यकालीन दो पुराने देवालय अवस्थित है। ये देवालय क्रमश: श्री हरि विष्णु और शिव जी को समर्पित है। ये मन्दिर बूढ़ेश्वर शिव मंदिर और चतुर्भुजी मंदिर के नाम से विख्यात है। दोनों देवालय धमधा में बूढ़ा तालाब और चौखड़िया तालाब के मध्य स्थित है। शिव मंदिर आकार में विशाल रहा किंतु इसका शिखर भाग पूर्णत विनष्ट हो चुका है। देवालय के गर्भगृह में शिव लिंग प्रतिष्ठापित है। यह स्थानीय लोगों द्वारा पूजित देवालय है। मन्दिर के सामने नंदी की प्रतिमा है। दूसरा देवालय चतुर्भुजी विष्णु को समर्पित है। यह देवालय आकार में लघु किंतु पूर्ण रूप में अवस्थित हैं। गर्भगृह में विष्णु जी की प्रतिमा स्थापित है। ये दोनों ही मन्दिर चौदहवीं पंद्रहवीं शताब्दी में निर्मित अनुमानित है। इसके साथ ही धमधा में गोंड शासकों का पुराना ध्वस्त महल भी मौजूद है। धमधा में कई सती स्मारक, टूटी फूटी प्रतिमाएं बिखरी पड़ी हुई है। पास ही तितुरघाट में में एक नवीन मन्दिर में विष्णु की अद्भुत प्रतिमा स्थापित है। 

धमधा का इतिहास हजार वर्ष से अधिक प्राचीन मालूम होता है। पर्व में कलचुरियो और बाद में स्थानीय गोंड शासकों ने धमधा पर निरंतर शासन किया। इन शासकों की दूर दृष्टि और सुरक्षागत कारणों से ही धमधा में तालाबों का वृहत पैमाने पर जाल बिछा हुआ है। ये तालाब जन उपयोग हेतु आज भी प्रासंगिक है। 

आज भले ही धमधा में 25—30 तालाब ही शेष है किंतु धमधा में श्री गोविंद पटेल जी और उनकी पुरी टीम धमधा के इतिहास और तालाबों के सरंक्षण के प्रति सजग है। समय समय पर उनके द्वारा इन विरासतो के प्रति सरंक्षण और जन जागरुकता के कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं। श्री गोविंद पटेल जी के द्वारा धमधा के 126 तालाबों का दस्तावेजीकरण कर एक लघु पुस्तिका के रुप में प्रकाशित किया गया है।आज धमधा एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल के रुप में पहचाना जा रहा है तो उसका कारण धमधा के।  श्री गोविंद पटेल जी और उनकी पुरी टीम के जागरूक युवा ही है, जिनके प्रयास सदैव प्रशंसनीय है।


ओम प्रकाश सोनी

असिस्टेंट प्रोफेसर इतिहास

सुकमा छत्तीसगढ़


#dhamdha

Monday, 14 July 2025

सोमवंशी राजाओं की विरासत — कर्णेश्वर मंदिर सिहावा

विश्व विरासत दिवस के अवसर पर आज के बस्तर का ही अंग कांकेर और उसके प्राचीन धरोहरों की चर्चा करना नितांत आवश्यक है। आज कांकेर अपनी अलग संस्कृति और इतिहास के बावजूद भी बस्तर में विलीन हो गया है। बस्तर की छाप कांकेर पर इतनी गहरी पड़ चुकी है कि कांकेर का गौरवपूर्ण इतिहास और यहां की प्राचीन विरासत अपनी अलग पहचान खो चुके हैं। 

कांकेर एक अलग राज्य रहा है। इसका अपना समृद्ध इतिहास रहा है। आजादी के बाद बस्तर और कांकेर दोनो रियासतों को मिलाकर बस्तर जिला बना दिया गया था। आज बस्तर  में कुल 7 जिले है एवं संभाग का नाम बस्तर है। 

कांकेर मे ग्यारहवी सदी से चौदहवी सदी के पूर्वाद्ध तक सोमवंशी राजाओं का शासन था। सोमवंशी शासकों ने कांकेर के अलावा सिहावा क्षेत्र में भी अपनी राजधानी बनाई थी। सिहावा क्षेत्र वर्तमान धमतरी जिले के अंतर्गत आता है। सिहावा 1830 ई तक बस्तर रियासत का महत्वपूर्ण परगना था।  

बस्तर ग्यारहवीं सदी में चक्रकोट के नाम से छिंदक नाग राजाओं द्वारा शासित कल्याणकारी राज्य था। पड़ोसी कांकेर जिला काकरय के नाम से तत्समय सोमवंशी शासकों का शासन क्षेत्र था। काकरय के सोमवंशी राजाओं में सिंहराज, व्याघ्रराज, बोपदेव, कर्णराज, पंपराज प्रमुख शासक हुए।  कर्णराज की  शासन अवधि काकरय राज्य का स्वर्ण काल था। आज भी कांकेर के जन सामान्य में कर्ण राजा की कई अनुश्रुतियां व्याप्त है। कर्णराज के समय कांकेर में कई देवालयों का निर्माण हुआ। ये मंदिर आज भी करप सिहावा में देखे जा सकते हैं।

सिहावा में कांकेर के सोमवंशी राजा कर्णराज द्वारा बनवाये हुये कुल 5 प्राचीन मंदिर है। इन मंदिर समूह को कर्णेश्वर महादेव मंदिर समूह के नाम से जाना जाता है। इन मंदिरों में एक मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। दुसरा मंदिर रामजानकी मंदिर है जिसमें भगवान राम सीता लक्ष्मण की संगमरमर की नवीन प्रतिमा एवं विष्णु की दो तथा सूर्य की एक प्राचीन प्रतिमा रखी हुई है। अन्य दो मंदिरों मे क्रमश भगवान गणेश, दुर्गा की प्रतिमायें कालांतर में रखी गई है। एक मंदिर बेहद छोटा है जिसमें सूर्य की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर परिसर में सूर्य, गणेश, सरस्वती, सती, और योद्धाओ की कई प्रतिमाएं भी रखी हुई।

शिवमंदिर के मंडप की भित्ति में शिलालेख जड़ा हुआ हे। शिलालेख की भाषा संस्कृत और लिपि नागरी है। इस शिलालेख के अनुसार सोमवंशी राजा कर्ण ने स्वयं के पूण्य लाभ के लिये देवहदा में भगवान शिव और केशव के मंदिर बनवाये। राजा कर्ण ने अपने माता पिता के पूण्य लाभ के लिये त्रिशुलधारी शिव के दो मंदिर एवं अपने भाई रणकेसरी के लिये एक मंदिर बनवाया था। देवहदा आज का देऊरपारा है जहां ये मंदिर अवस्थित है।

इन मंदिर समुह से एक किलोमीटर की दुरी पर तालाब के किनारे एक प्राचीन कुंड है। इसके पास ही एक नदी बहती है। नदी के तट पर एक मंदिर के अवशेष बिखरे पड़े है। इस मंदिर का निर्माण कर्णराज की रानी भोपल देवी ने करवाया था। जिसमें विष्णु की प्रतिमा स्थापित थी। 

ये सभी मंदिर ओडिसा शैली में है। शिलालेख में तिथि शकसंवत 1114 ई तदनुसार सन 1192 अंकित है। यही मंदिरों के निर्माण तिथि भी है। बस्तर और कांकेर के मंदिरो की एक ही निर्माण अवधि के बावजूद भी शिल्प और स्थापत्य दोनों में बेहद ही भिन्नता नजर आती है। 


धमतरी के पास स्थित नगरी से पहले बायीं तरफ पांच किलोमीटर दुर देवपुर गांव है इस देवपुर गांव के देउरपारा में ये मंदिर स्थित है। पास ही महानदी का उदगम एवं श्रृंगी ऋषि का आश्रम भी स्थित है , इन मंदिरो के साथ ही आश्रम के दर्शन भी किए जा सकते हैं।


Sunday, 13 July 2025

बालोद का कपिलेश्वर मंदिर समूह

छत्तीसगढ़ में बालोद जिला दुर्ग जिले से 2012 में  अलग होकर एक नया जिला बना है। बालोद का पुरा क्षेत्र मध्यकालीन पुरातात्विक स्मारकों के लिये भी प्रसिद्ध है। बालोद शहर के अंतिम छोर पर कपिलेश्वर मंदिर समूह है। इस मंदिर समूह में भगवान शिव, देवी दुर्गा, भगवान गणेश, भगवान कृष्ण, देवी संतोषी और राम जानकी को समर्पित छः मंदिर है। इसके अतिरिक्त बालोद में एक प्राचीन किले के भग्नावशेष उसका द्वार, कई प्रतिमाएं मौजूद है। बालोद के आसपास की परिधि में जगन्नाथपुर, पलारी, मालीघोरी , चिरचारी, महामाया, डौंडी लोहारा, गौरेया आदि स्थलों में ऐतिहासिक महत्त्व के स्मारक, मूर्तियां और भग्नावशेष प्राप्त होते हैं।

ये सारे स्मारक मध्यकाल में निर्मित अनुमानित है। छत्तीसगढ़ में दसवीं ग्यारहवीं सदी से लेकर अठारहवी सदी तक कल्चुरी शासकों का शासन रहा। ग्यारहवी बारहवी सदी इनके राजत्व का स्वर्णिम युग था। इस दौरान पुरे छत्तीसगढ़ में इन्होंने कई देवालय बनवाए जो स्थापत्य और मूर्तिकला के बेजोड़ नमूने हैं। इस दौरान बस्तर क्षेत्र में छिंदक नागवंशी और कवर्धा क्षेत्र में फणि नागवंशी राजाओं का शासन रहा। मध्य काल में कल्चुरी शासकों की सत्ता कमजोर पड़ गई थी और इनकी राज्य लक्ष्मी भी लुप्त हो गई थी। 

इस दौरान बालोद क्षेत्र में ऐसा कौन सा राजवंश शासनरत रहा जिसने इन मंदिरों का निर्माण कराया? स्थानीय तौर पर लोगों का मानना है कि यहां नागवंशी राजाओं का शासन रहा और उन्होंने ही ये सारे मन्दिर बनवाए। कपिलेश्वर मन्दिर में नाग की प्रतिमाएं उत्कीर्ण है जिससे इस बात को थोड़ा बल मिलता है। बालोद के कपिलेश्वर मन्दिर परिसर में कोई अभिलेख अभी मौजूद नहीं है किंतु दुर्ग गजेटियर में यहां दो अभिलेख मौजूद होने की बात कही गई किंतु उन्हें वहां से हटा लिया गया ऐसा उल्लेख मिलता है। 

अगर वो अभिलेख कहीं सही स्थिति में है या उनका अनुवाद कहीं छपा होता तो यह पता चल जाता कि यहां अतीत में कौन सा वंश रहा और किसने कब इन मंदिरों को बनवाया। अगर स्थानीय स्तर की बात को सही मानकर चले कि यहां नागवंशियो की राज रहा तो वे नागवंशी शासक कौन रहे? अनुमान कर सकते हैं कि नागों की वो शाखा कवर्धा के फणी नागवंशी शाखा से संबंध रही या फिर बस्तर के छिंदक नागवंशी शाखा से या फिर स्वतंत्र कोई अलग शाखा। 

दुसरी महत्त्वपूर्ण बात मुझे देखने को मिली कि छत्तीसगढ़ में बस्तर के बाद बालोद ऐसा क्षेत्र है जहां सर्वाधिक गणेश प्रतिमाएं देखने को मिलती है। जिसमे अधिकांश गणेश प्रतिमाएं पांच फीट या उससे भी बड़ी है। तब ऐसा अनुमान होता है कि यहां नागवंशियो की स्थानीय शाखा निश्चित ही बस्तर के छिंदक नागवंश से सम्बन्धित रही तभी इन्होंने बस्तर के नागवंशियो की तरह ही गणेश की इतनी प्रतिमाएं बनवाई। हालांकि यह सिर्फ़ अनुमान है। यहां कौन राजवंश रहा इसकी कोई लिखित जानकारी मुझे प्राप्त नहीं हुई है। महासिंह और बाला शाह जैसे राजाओं के नामोल्लेख की कुछ अपुष्ट जानकारी बस प्राप्त हुई है।यदि इस बारे में कोई जानकारी किसी को हो तो अवश्य साझा करें।

बालोद में शहर से दूर कुल छह मंदिरों का एक समूह है जिसे कपिलेश्वर मंदिर समूह कहा जाता है। यह कपिलेश्वर नाम कैसा पड़ा? इसका कोई उल्लेख नहीं मिला है।भगवान शंकर को समर्पित कपिलेश्वर मंदिर इनमें सबसे बड़ा मंदिर है। पूर्वाभिमुख इस मंदिर में सिर्फ गर्भगृह मात्र है। मंदिर का शिखर भी काफी उंचा है। दोनों तरफ भगवान गणेश की 6 फीट की प्रतिमायें स्थापित है। मंदिर के द्वारशाखा के दायें  और बायें तरफ गंगा यमुना और द्वारपाल की प्रतिमायें स्थापित है। 

इन मंदिरों समुहों में दुसरा मंदिर भगवान गणेश को समर्पित है। इस मंदिर के गर्भगृह में भगवान गणेश की छ फीट की प्रतिमा स्थापित है। इस मंदिर का शिखर उपर की ओर संकरा होता गया है। मंदिर का शिखर पीड़ा देवल प्रकार में निर्मित है। छत्तीसगढ़ में भगवान गणेश की अनेकों प्रतिमायें मिलती है किन्तु अधिकांश प्रतिमायें खुले में या किसी मंदिर के मंडप में स्थापित प्राप्त होती है किन्तु ऐसे मंदिर बेहद की कम प्राप्त होते है जो कि सिर्फ भगवान गणेश को समर्पित है। भगवान राम का मंदिर गर्भगृह और मंडप में विभक्त है। इसमें भगवान राम की आधुनिक प्रतिमा स्थापित है।  

भगवान कृष्ण और मां दुर्गा के पुराने मंदिरों में इनके आधुनिक प्रतिमायें स्थापित है। संतोषी माता का मंदिर इन सभी मंदिरों में सबसे छोटा है। इस मंदिर का शिखर पीड़ा देवल आकृति में बना हुआ है। मंदिरों के पास बावड़ी या तालाब बनाने की परंपरा यहां पर भी देखने को मिलती है। 

शिव मंदिर के सामने एक बावड़ी बनी हुई है।  जिसमें योद्धाओं की प्रतिमायें स्तंभों पर स्थापित  है। इन मंदिरों का निर्माण काल 15 वी -16 वी सदी माना गया है। शहर में ही कुछ दूरी पर बूढ़ा तालाब मौजूद हैं जिस पर किले की चार दिवारी और एक बड़ा प्रवेशद्वार अवस्थित है। जिससे प्रतीत होता है यहां कभी बड़ा सा किला रहा होगा जिसमे राजपरिवार निवासरत रहा होगा। इसके पास ही चार दिवारी में खुला संग्रहालय है जिसमे कई प्रतिमाएं रखी हुई है।

ओम प्रकाश सोनी

Saturday, 12 July 2025

भोरमदेव क्षेत्र का मड़वा महल मंदिर

छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहे जाने वाले भोरम देव देवालय के पास ही एक मध्य कालीन शिव मंदिर अवस्थित हैं। वर्तमान में यह मंदिर मड़वा महल के नाम से चर्चित है। यह मंदिर स्थापत्य की अपेक्षा इतिहास की दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण है। कारण कि इस मंदिर से एक अभिलेख प्राप्त हुआ है जिससे फणि नागवंशी राजाओं के प्राचीन इतिहास की दुर्लभ जानकारी प्राप्त होती है। 

देवालय स्थापत्य की दृष्टि से सामान्य ही है। मंदिर गर्भगृह अंतराल और मण्डप में विभक्त है। शिखर पूरी तरह से खंडित है। मण्डप सादे प्रस्तर स्तंभों पर आधारित है। गर्भगृह का प्रवेश द्वार अलंकृत है। द्वार पर शिव, गणेश, परिचारिका आदि का अलंकरण है। गर्भगृह में शिवलिंग प्रतिष्ठापित है।इस शिव मंदिर को मड़वा महल या दूल्हा देव मंदिर कहा जाता है। माना जाता है कि इस मंदिर में विवाह होता था इसलिए इसे मड़वा महल कहा जाता है।

इस मंदिर से फणि  नागवंशी राजा रामचंद्र देव का विक्रम संवत 1406 सन 1349 का अभिलेख प्राप्त हुआ है। संस्कृत में लिखा यह लेख वर्तमान में महंत घासीदास संग्रहालय रायपुर में प्रतिस्थापित है। इस अभिलेख के अनुसार मड़वा महल मंदिर मूल रूप से रामेश्वर शिव मंदिर है। यह मंदिर फणि  नागवंशी राजा रामचंद्र देव ने बनवाया था। इसका वास्तुकार महादेव था जो शिल्प शास्त्र का ज्ञाता था। मन्दिर के भोग प्रसाद के लिए राजपुरा ग्राम दान दिया गया था।

इस अभिलेख में फणि  नागवंशी राजाओं की उत्पत्ति की कथा का उल्लेख है। इसमें अहिराज से लेकर रामचंद्र देव तक राजाओं की वंशावली का भी लेख मिलता है। राजा रामचंद्र की सात रानियों और उसके कई पुत्र पुत्रियों का नाम भी लेख में आया है। इसमें प्रशस्ति कार का नाम विट्ठल है जो दक्षिण का है। प्रशस्ति के उत्कीर्ण कर्ता का नाम नष्ट हो गया है। मड़वा महल का अभिलेख फणि  नागवंशी राजाओं के इतिहास की आधार पूर्ण जानकारी उपलब्ध कराता है। (अभिलेख की महत्त्वपूर्ण जानकारी के लिए संदर्भ पुस्तक भोरमदेव क्षेत्र लेखक श्री अजय चन्द्रवंशी) 

मंदिर के बाहरी दीवारों पर कई मिथुन प्रतिमाएं स्थापित है जिसके कारण यह मन्दिर भी खजुराहो के मंदिरो की तरह छत्तीसगढ़ मे अपनी पहचान रखता है। मन्दिर परिसर में कई योद्धा स्मारक, सती स्मारक रखे हुए हैं। 


ओम प्रकाश सोनी

Friday, 11 July 2025

छेरकी महल कवर्धा का परिचय।

छत्तीसगढ़ का कवर्धा क्षेत्र पुरातन काल में फणि नागवंशी राजाओं का शासन क्षेत्र रहा। मैकल पर्वत श्रृंखला के खूबसूरत दृश्यों से सज्जित यह क्षेत्र इतिहास पुरातत्व से समृद्ध है। यहां का भोरमदेव का देवालय अपनी स्थापत्य शैली में पुरे छत्तीसगढ़ में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। इसी तरह यहां के हरे भरे खेतों में स्थित एक सदियों पुराना देवालय अपने नाम विशेष के कारण आकर्षण का केंद्र है।

भोरमदेव मंदिर के पास ही चौरा ग्राम में मध्यकाल का एक पुराना मंदिर स्थित है जिसे स्थानीय तौर पर छेरकी महल कहा जाता है। छत्तीसगढ़ में बकरी के लिए स्थानीय लोग छेरी शब्द का उपयोग करते हैं। इस मंदिर का नामकरण छेरकी महल होने का कारण यह माना जाता है कि यहां लोग अपनी बकरियां छोड़ देते थे जो कि मंदिर में बैठी रहती थी और दूसरा कारण यह प्रसिद्ध है कि यहां मंदिर के गर्भगृह में बकरी की गंध महसूस होती है। किसी पशु के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर संभवत छत्तीसगढ़ में इकलौता मंदिर है।

मंदिर स्थापत्य और मूर्तिकला की दृष्टि से सामान्य ही है। एकायतन शैली का मंदिर सिर्फ गर्भगृह युक्त है जिसमे काले पत्थर का बना शिवलिंग प्रतिष्ठापित है। द्वार शाखा अलंकृत है। ललाट बिंब पर पद्मासन में विराजित लक्ष्मी अंकित है। द्वार शाखा में शैव द्वारपाल और चंवर धारिणी की सुंदर प्रतिमाएं स्थापित है। 

मंदिर का शिखर खंडित और साधारण है। हालांकि यहां से कोई भी अभिलेख नहीं मिला है, जिससे इसके निर्माता और वंश की कोई प्रत्यक्ष जानकारी नहीं मिलती है। मंदिर चौदहवीं सदी में स्थानीय फणि नागवंशी राजाओं द्वारा निर्मित अनुमानित किया गया है। 

ओम प्रकाश सोनी

Thursday, 10 July 2025

नगपुरा का प्राचीन शिवालय

छत्तीसगढ़ में दुर्ग शहर से लगभग सोलह किलोमीटर की दूरी पर नगपुरा नाम का गांव है। यह गांव छत्तीसगढ़ की संस्कृति सरिता शिवनाथ नद के तट पर स्थित है। यह नगपुरा गांव जैन तीर्थ के रुप में आज विश्व विख्यात है। यहां भगवन पार्श्वनाथ की प्राचीन प्रतिमा स्थापित है। इस गांव की घनी आबादी में तालाब के किनारे एक प्राचीन देवालय है जो कि भगवन शिव को समर्पित है। यह मन्दिर पूर्वाभिमुख है। नागर शैली में निर्मित इस मन्दिर में सिर्फ गर्भगृह है जिसमे शिवलिंग प्रतिष्ठापित है। इसकी द्वार शाखा अलंकृत है। जिसमे गरुड़ एवं नवग्रहों का अंकन है।साथ ही द्वारपाल एवम नदी देवियों की प्रतिमाएं स्थापित है।

मन्दिर के शिखर में सिर्फ आमलक ही शेष है। सामने की तरफ़ मानव मुख के सदृश्य कीर्तिमुख बना हुआ है। इसके इसके अतिरिक्त गणेश, भैरव, नटराज, ब्रम्हा आदि एवम मैथुन प्रतिमाएं जड़ी हुई है।मन्दिर मूर्तिकला  एवम स्थापत्य की दृष्टि से साधारण ही है। कोई विशेष आकर्षण इस मन्दिर में दिखलाई नहीं पड़ता है।

इस मंदिर में सामने मानव मुख सदृश्य कीर्ति मुख की तुलना बारसूर में मामा भांजा मंदिर में बने इसी मानव मुख कीर्ति मुख के साथ की जा सकती है जो इसी तरह से बना हुआ है। मंदिर से कुछ पास ही एक सती स्मारक भी मौजूद है।

इस मंदिर का निर्माण कल्चुरी शासकों के शासन काल में बारहवी सदी में निर्मित अनुमानित किया गया है। इस क्षेत्र में कलचुरी शासकों का आधिपत्य रहा है। भिलाई के पास देव बलौदा का शिव मंदिर भी कल्चुरी शासकों द्वारा निर्मित माना गया है। इस क्षेत्र में देवर बीजा, गंडई, सहसपुर में भी इसी शैली आकार में बने हुए प्राचीन मंदिर है जो लगभग एक निश्चित अंतराल में बने हुए हैं।

दुर्ग जिले के गजेटियर के अनुसार इस क्षेत्र में कल्चुरी शासकों का प्रमुख सामंत जगपाल देव स्वयं इस दुर्ग क्षेत्र में निवास करता था। इसके साथ ही उल्लेख है कि नगपुरा, देव बलौदा और आरंग के मंदिर इन तीनो का निर्माण भी एक ही साथ हुआ है ऐसा यहां माना जाता है।

ओम प्रकाश सोनी

Wednesday, 9 July 2025

गंडई का भांड देउर मंदिर।

छत्तीसगढ़ में कल्चुरी शासकों द्वारा निर्मित ऐतिहासिक देवालयों में से गंडई का प्राचीन मंदिर विशेष महत्व का है। आकर्षक मूर्तिशिल्प और स्थापत्य की दृष्टि से यह मंदिर छत्तीसगढ़ में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ जिले के गंडई कस्बे में स्थित यह मंदिर स्थानीय तौर पर  भांड देउर मंदिर के नाम से चर्चित है। घनी आबादी के मध्य स्थित यह ऐतिहासिक देवालय हजार वर्ष बाद भी अच्छी अवस्था में है। नागर शैली में निर्मित यह मंदिर पूर्वाभिमुख एकायतन देवालय है। 

यह मंदिर गर्भगृह और अंतराल में विभक्त है। देवालय के शिखर पर आमलक सहित कलश स्थापित है। शिखर में आमलक के नीचे चारों तरफ शैवाचार्य विराजित है। मंदिर के अंतराल के उपर शार्दुल की प्रतिमा स्थापित है। यह प्रतिमा गज शार्दुल की होनी चाहिए वर्तमान में यहां गज की प्रतिमा नहीं है और सिंह की प्रतिमा भी खंडित है।

मंदिर का प्रवेशद्वार बेहद भव्य एवं आकर्षक है। द्वार के दोनों पर शैव द्वारपालों एवं नदी देवी गंगा यमुना की सुंदर प्रतिमायें स्थापित है। द्वार के ललाट बिंब पर गणेश का अंकन है। प्रवेशद्वार के सबसे उपर शैवचार्यो के साथ पांडवों के द्वारा महिषपीठ पर स्थापित शिवलिंग पूजन का भव्य शिल्पांकन किया गया है। रोचक तथ्य यह है कि प्रत्येक पांडव के नीचे देवनागरी लिपि में स्पष्ट तौर पर उनका नाम अंकित है। गर्भगृह में शिवलिंग प्रतिष्ठापित है। मंदिर के सम्मुख नंदी विराजमान है। 

मंदिर के अधिष्ठान भाग पर गजथर और अश्वथर की पंक्तियों में हाथियों, घोड़े युद्ध शिकार आदि का अंकन किया गया है। अश्वथर के उपर नरथर भाग में रामायण और कृष्णलीला के दृश्यों को शिल्पांकित किया गया है। श्री कृष्ण लीला में कालिया नाग मर्दन, गोवर्धन पर्वत का धारण एवं बंसीवादन के आकर्षक दृश्य है। रामायण के शिल्पांकन में बालि सुग्रीव युद्ध, बाली वध, राम लक्ष्मण, हनुमान एवं अन्य वानरों के दृश्य प्रमुख है। उपर रथिकाओं में देवी देवताओं की सिर्फ तीन प्रतिमायें काल भैरव, सती स्तंभ और महिषासुर मर्दिनी स्थापित है। 

इसके अतिरिक्त तत्कालीन सामान्य जनजीवन को दर्शाते कई मोहक प्रतिमायें भी प्रदर्शित है। इन प्रतिमाओं में एक प्रतिमा एक महिला की है जो कि पलंग पर लेटी हुई कुछ खाते हुए प्रदर्शित है। उपर शिखर पर शंख बजाते हुए पुरूष की आकृति, कई सैन्य योद्धा, नायिकाओं, नृत्यांगनाओं, व्याल आदि का उत्तम चित्रण मंदिर की दीवारों पर प्रदर्शित है। इन प्रतिमाओं का आश्चर्य जनक पहलू यह है कि इन प्रतिमाओं का मुख मंडल, देहिक बनावट आदि साधारण होकर भी असाधारण है।यह शिल्पांकन छत्तीसगढ़ के अन्य सभी प्राचीन मंदिरों के ऐसे शिल्पांकन से सर्वथा भिन्न है। एक प्रतिमा के नीचे देवनागरी लिपि में राणी राजी खुदा है। संभव है कि यह नाम मंदिर के शिल्पियों के प्रमुख का हो जिसके निर्देर्शन में मंदिर का निर्माण हुआ हो।

इस मंदिर से किसी भी प्रकार का कोई अभिलेख प्राप्त नहीं हुआ जिससे की इसके निर्माता राजा या सामंत का पता चल सके। स्थापत्य एवं मूर्तिशिल्प के दृष्टि से यह मंदिर बारहवी सदी के पूर्वाद्ध में निर्मित होना चाहिए। यहां के स्थानीय इतिहासकारों एवं विद्वानों का मानना है कि यह इस क्षेत्र में शासनरत फणिनागवंशी शासकों द्वारा निर्मित है।

हालांकि मेरा मानना है कि यह देवालय किसी कल्चुरी शासक द्वारा निर्मित कराया गया है। ऐसा इसलिये कि इस मंदिर के शिखर या अन्य किसी भाग पर फणिनागवंशियों के प्रतीक नाग का कोई शिल्पांकन नहीं है जबकि इस क्षेत्र में देवरबीजा, सहसपुर, नगपुरा के देवालयों के शिखर पर नाग का अंकन है जिससे वे फणिनागवंशियों द्वारा निर्मित माने जा सकते है। गंडई के इस मंदिर में नाग का अंकन नहीं है जबकि अंतराल के उपर गज शार्दुल की प्रतिमा स्थापित है। कल्चुरी शासक जाजल्यदेव जो बारहवी सदी के पूर्वाद्ध में इस कौसल अंचल के सबसे शक्ति शाली राजा के रूप में प्रतिष्ठित हुए थे। जाजल्यदेव ने पुरे कौसल अंचल, बस्तर और उसके आगे के भी शासकों को भी पराजित कर अपना शासन क्षेत्र विस्तृत किया था। 

जाजल्यदेव ने गज शार्दुल की उपाधि धारण की थी अर्थात हाथियों का शिकारी। ऐसी गज शार्दुल की प्रतिमा गंडई के इस प्राचीन मंदिर के अंतराल के उपर स्थापित है जिससे अनुमान होता है कि यह मंदिर कल्चुरी शासक संभवत जाजल्यदेव या उसके किसी शक्तिशाली सामंत द्वारा निर्मित होना चाहिए। यह देवालय फणि नागवंशियों पर कल्चुरियों के विजय का प्रतीक है। इसके अतिरिक्त अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि देवरबीजा, सहसपुर, नगपुरा के देवालय इस मंदिर के निर्माण के बाद निर्मित हुए है। देवरबीजा का प्राचीन सीता मंदिर शिल्प स्थापत्य में गंडई के इस मंदिर की नकल ही प्रतीत होता है। 

उस मंदिर के प्रवेशद्वार पर भी इसी तरह पांडवों को महिषपीठ पर स्थापित शिवलिंग के पूजन करते दर्शाया गया है। ऐसा शिल्पांकन जांजगीर के कल्चुरीकालीन प्राचीन नकटा मंदिर में भी किया गया है। जांजगीर का इतिहास सीधे कल्चुरी शासक जाजल्यदेव से जुड़ता है। इन तीन मंदिरों में एक जैसा यह अनुपम शिल्पांकन विशेष तौर पर गंडई और जांजगीर के मंदिर का शिल्पांकन कल्चुरी शासक जाजल्यदेव का स्मरण कराता है। पांडवों के द्वारा महिषपीठ पर स्थापित शिवलिंग के पूजन का दृश्य उनके स्वर्गारोहण के समय को प्रदर्शित करता है। 


यह शिल्पांकन कहीं न कहीं जाजल्यदेव से भी जुड़ता है। संदर्भ तो याद नहीं किन्तु कहा जाता है कि जाजल्यदेव भी अपने अंतिम समय में प्रसिद्ध शैवाचार्य मकरध्वज जोगी के साथ चले गये और फिर कभी नहीं लौटे। पांडवों के स्वर्गारोहण से पूर्व शिव पूजन का दृश्य और जाजल्यदेव का शैवचार्य के साथ सब कुछ छोड़कर मोक्ष और भक्ति की तलाश में जाना , इस शिल्पांकन और इस कथा में कुछ ना कुछ  संबंध जरूर रहा होगा। 

ओमप्रकाश सोनी

Tuesday, 8 July 2025

देवरबीजा का प्राचीन सीता मंदिर

छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले का देवरबीजा ग्राम प्रवासी पक्षियों के रहवास का एक मुख्य स्थल है। इन प्रवासी पक्षियों ने देवरबीजा के प्राचीन मंदिर के आसपास के पेड़ो पर ही अपना ठिकाना बना रखा है। शांत सुरम्य वातावरण में स्थित प्राचीन मन्दिर इन पक्षियों का कोलाहल से महीनो तक निरंतर गुंजायमान रहता है।

इस ऐतिहासिक मंदिर को देवरबीजा के स्थानीय लोग सीता देवी मंदिर कहते हैं। हालांकि यह सही ज्ञात नही हो पाया कि इसे सीता देवी मंदिर क्यों कहते हैं। यहां के स्थानीय लोग गर्भगृह में स्थापित राजपुरूष की प्रतिमा को सीता देवी मानते हैं और लोक में यह नाम प्रचलन में आ गया।

तालाब के किनारे स्थित यह मंदिर मूल रूप से शिव मंदिर है।मंदिर में सिर्फ़ एक वर्गाकार गर्भगृह मात्र है। गर्भगृह में राजपुरूष की एक प्रतिमा और कुछ अन्य खंडित प्रतिमाएं रखी हुई है। प्रवेशद्वार के दोनों तरफ़ नदी देवियां गंगा यमुना की प्रतिमाएं स्थापित है। प्रवेशद्वार के ललाट बिंब में गणेश जी का अंकन है। ऊपर सिरदल में नवग्रह एवम महिष पीठ स्थापित शिवलिंग की पूजा करते हुए पांडवों का अंकन किया गया है। ऐसा शिल्प पट्ट पास के गंडई, जांजगीर और बालोद के मंदिरों में भी मिलता है। 

इसका शिखर नागर शैली में निर्मित है। शिखर पर मात्र आमलक ही शेष है। शिल्प कला की दृष्टि से यह मंदिर छत्तीसगढ़ की पुरातात्विक विरासतों में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है।यह प्राचीन देवालय देवी देवताओं एवम तत्कालीन लोक दृश्यों की विभिन्न प्रतिमाओं से सज्जित किया गया है। एक प्रतिमा में नृत्य करते हुए स्त्री पुरुषों को अंकित किया गया है। ।इस दृश्य में दो पुरूषों के मध्य एक स्त्री पीछे से हाथ पकड़े हुए नृत्य की मुद्रा में है। इस नृत्य दृश्य को बस्तर के आदिवासी समुदायों में प्रचलित नृत्य की प्राचीनता से भी जोड़कर देखा जा सकता है। 

देवी देवताओं की प्रतिमाओं में अष्टभुजी गणेश की प्रतिमा स्थापित है, जिनके हाथों में परशु, सर्प, पद्म, मोदक पात्र आदि हैं। एक प्रतिमा मुण्ड माला पहने चतुर्भुजी भैरव की है, जिनके हांथों में डमरू व कपाल स्पष्ट दिखाई दे रहा है। एक प्रतिमा में चतुर्भुजी शिव अन्धकासुर का बध करते हुए दिखाये गये है, जबकि ऊपरी आले में चतुर्भुजी नटराज का अंकन है। जिनके दो हाथों में खटवांग एवं त्रिशूल तथा शेष दो भुजाएं नृत्य मुद्रा में है। प्रतिमा के नीचे दायीं ओर नंदी का अंकन है।

इस मंदिर में एक ब्रह्म की मूर्ति भी है। चतुर्भुजी ब्रम्हा, स्रुव, पुस्तक, कमण्डल एवं एक हाथ बरद मुद्रा मेंप्रदर्शित है।  कमल पुष्प धारण किये हुए स्थानक मुद्रा में सूर्य की प्रतिमा भी स्थापित है। एक दुर्लभ प्रतिमा ष्ठभुजी हरिहरहिरण्यगर्भ प्रतिमा भी स्थापित है, जिनके दायें हाथों में पद्म, शंख, त्रिशूल तथा बायें हाथों में खट्वांग, चक्र व पद्म सुशोभित है, वे किरीट मुकुट, कुंडल, हार, यज्ञोपवीत एवं मेखला धारण किये हुए हैं। 

देवी मूर्तियों में  चतुर्भुजी महिषासुर मर्दिनी त्रिशूल, खड्ग, खेटक लिए महिष का बध करते हुए अंकित है। दुसरी प्रतिमा चतुर्भुजी वैष्णवी पद्मासन मुद्रा में शंख, चक्र, पद्म एवं गदा लिए हुए आसीन है, जो कुंडल, हार, केयूर, मेखला आदि आभूषणों से अलंकृत है।  

ललितासन में चतुर्भुजी कौमारी  की भग्न प्रतिमा है, जिनके एक हाथ में कुक्कुट है तथा दूसरा हाथ घुटने पर रखा है, शेष दो हाथ खंडित है। इसके अतिरिक्त  सरस्वती,  गणेश, गजलक्ष्मी, ब्रम्हा एवं शिव प्रमुख हैं। बाह्य भित्ति की अन्य प्रतिमाओं में नृत्यरत अप्सरा, नृत्य पुरूष, मृदंग वादक, मिथुन-युगल, मालाधारी विद्याधर, गंधर्व, पुरूष उपासक व अंजलिमुद्रा में उपासक की प्रतिमाओं को यथोचित अंकित किया गया है। एक पुरूष प्रतिमा को दोनों हाथों में गदा लिए कई स्थानों पर उकेरा गया है। 

इन प्रतिमाओं में कुछ प्रतिमाएं अधूरी है अर्थात् इन्हें पुरी तरह से ना बनाकर जैसे तैसे देवालय की भित्तियों पर स्थापित कर दिया गया है। इसका कारण क्या रहा होगा? संभव हो कोई आसन्न आक्रमण, या शासक की मृत्यु या अन्य कोई ना कोई कारण रहा होगा।


मन्दिर के समीप ही उत्तर मध्यकालीन प्रस्तर निर्मित सती-स्तम्भ भी है जिसे संरक्षित किया गया है।

यह देवालय कलचुरी शासन काल में बारहवी सदी में निर्मित माना गया है। मन्दिर के शिखर के दोनो तरफ़ नागों का अंकन है जिससे अनुमानित होता है कि कल्चुरी शासकों के अधीनस्थ इस क्षेत्र के किसी फणी नागवंशी सामंत ने इस मंदिर का निर्माण कराया हो।


ओम प्रकाश सोनी

Monday, 7 July 2025

सहसपुर के प्राचीन शिव मंदिर

छत्तीसगढ़ पुरातात्विक रुप से बेहद ही समृद्ध क्षेत्र है। यहां के प्रत्येक क्षेत्र में सम्पन्न राजवंशों का शासन रहा जिन्होंने अपने शासन अवधि में कई प्राचीन और कला की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण देवालयों का निर्माण करवाया था। सैकड़ों वर्षों बाद ये मंदिर आज भी जन आस्था के केंद्र है। छत्तीसगढ़ में दुर्ग बेमेतरा कवर्धा क्षेत्र में लंबे समय तक फणि नागवंशी शासकों का शासन रहा। ये कल्चुरी शासकों की अधीनता स्वीकार करते थे किंतु मंदिरों के निर्माण में स्वतंत्र रहे, इस कारण इस क्षेत्र में आज भी उनके काल के कई प्राचीन देवालय दर्शनीय हैं। 

दुर्ग जिले का सहसपुर ग्राम दो प्राचीन मंदिरों के कारण छत्तीसगढ़ के पुरातात्विक नक्शे में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस सहसपुर ग्राम में दो प्राचीन देवालय स्थित है। दोनों ही मंदिर भगवन शिव को समर्पित रहे हैं किंतु एक मंदिर में ग्रामीणों ने हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित कर दी है इसलिए इसे बजरंग बली मन्दिर कहा जाता है। इन दोनों मंदिरों में बजरंगबलि मंदिर अधिक प्राचीन प्रतीत होता है।

बजरंगबली मन्दिर पूर्वाभिमुख है। यह मन्दिर गर्भगृह अंतराल और मण्डप में विभक्त है। गर्भगृह का शिखर आमलक कलश से शोभित है। चारों तरफ शैव साधु विराजित है। मंदिर के मंडप का शिखर पीड़ा देवल संरचना युक्त है। ऐसा मण्डप शिखर बालोद के कपिलेश्वर मन्दिर समूह और सिहावा कर्णेश्वर मन्दिर समूह के मंदिरों में देखने को मिलता है। मण्डप में कुल सोलह स्तम्भ है। स्तंभ सादे अलंकरण विहीन है। 

गर्भगृह के प्रवेश द्वार के ललाट बिंब पर गणेश जी का अंकन है, एवम उसके ऊपर ब्रम्हा विष्णु महेश का अंकन है। गर्भगृह में अंदर शिला पर उकेरी हुई हनुमान जी की प्रतिमा है जो सिंदूर से पुती हुई है। मंडप में किनारे राजपुरूष की खंडित मूर्ति रखी हुई है। मन्दिर के बाहरी भित्तियो पर नृत्य गणेश, वेणु गोपाल,चामुंडा, भैरव, सूर्य की प्रतिमा स्थापित है। यह मन्दिर बारहवी तेरहवीं सदी में निर्मित होना चाहिए। संभव है यह स्थानीय फणि नागवंशी शासकों द्वारा ही बनवाया गया हो।

दूसरा मंदिर इस मंदिर के कुछ दूर पीछे ही बना हुआ है जो शिव मंदिर है। यह मंदिर भी गर्भगृह, अंतराल और मण्डप में विभक्त है। मंदिर का शिखर आमलक कलश युक्त सादा सरल है। मण्डप भी सामान्य शिखर युक्त है। यह मण्डप भी सोलह सादे स्तंभो पर आधारित है। गर्भगृह में शिवलिंग प्रतिष्ठापित है। मन्दिर की भित्तियो पर गणेश और सूर्य की प्रतिमा है। इन प्रतिमाओं के साथ परिचारिकाओ का अंकन है जो स्थानीय वेशभूषा और केश सज्जा युक्त है। यह देवालय चौदहवीं पंद्रहवीं शताब्दी में स्थानीय फणि नागवंशी राजाओं द्वारा निर्मित होना अनुमानित है।

सहसपुर ग्राम के आसपास नगपुरा, धमधा,देवरबीजा और देवकर जैसे महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है। दुर्ग से धमधा होते हुए 50 किलोमीटर का सफर तय कर सहसपुर पहुंचा जा सकता है।

ओम प्रकाश सोनी

Sunday, 6 July 2025

कला तीर्थ है छत्तीसगढ़ का खजुराहो भोरमदेव

पश्चिम में परमार कालीन स्थापत्य कला का प्रवाह नर्मदा के तीरे तीरे मालवा से गुजरात तक हुआ। वहीं पूर्व में परमार कला दक्षिण कौसल के मैकल घाटी तक पहुंची। मालवा में परमार काल के प्रसिद्ध मंदिर स्थापत्य की छाप छत्तीसगढ़ के सुविख्यात भोरमदेव मंदिर में भी दिखलाई पड़ती है। भूमिज शैली और शिखर पर उरुश्रृंगो की कलात्मक सज्जा सहित ऊपर से मध्य तक की चौड़ी पट्टिका, परमार कालीन स्थापत्य की ऐसी खूबियां मध्यप्रदेश राजस्थान गुजरात के मंदिरों में दिखती है।

यही खासियत छत्तीसगढ़ के भोरमदेव मंदिर में भी दिखती है। ग्यारहवीं सदी की यह स्थापत्य शैली आज खुद ही प्रमाणित कर देती है कि अमुक देवालय परमार काल की निर्मिति है और इस कला के संरक्षक राजा भोज जैसे परमार वंशीय शासक हुए। उस दौर में यह स्थापत्य शैली बेहद फली फूली, इसका अधिकतम प्रसार नर्मदा के प्रवाह के साथ साथ हुआ। वहीं छत्तीसगढ़ में भी इस शैली में एक मंदिर निर्मित हुआ है जिसे आज भोरमदेव शिव मंदिर कहा जाता है।

मैकल पर्वत मालाओं से घिरे कवर्धा क्षेत्र में स्थित भोरमदेव का प्राचीन प्रासाद आज छत्तीसगढ़ की मुख्य पहचान बन चुका है। मैकल की घाटियों में परमार स्थापत्य शैली का यह देवालय स्थानीय फणि नागवंशी राजाओं की देन है। कवर्धा से 18 किलोमीटर दूर मैकल पहाड़ियों की घाटी में चौरा ग्राम स्थित हैं। इसी चौरा ग्राम में भोरमदेव के तीन प्राचीन मंदिर है जिनमे सबसे प्राचीन विशाल शिव मंदिर जो भोरमदेव मंदिर के नाम से विख्यात है, दूसरा छैरकी महल और तीसरा मड़वा महल, यह भी पास ही स्थित है। माना जाता है गोंड आदिवासियों के देवता भोरमदेव के कारण यह नामकरण प्रसिद्ध हुआ।

वास्तु और स्थापत्य योजना में यह देवालय छत्तीसगढ़ की स्थापत्य क्षेत्र में मुकुट मणि की तरह है। प्रस्तर निर्मित यह मंदिर नागर शैली में बना हुआ पूर्वाभिमुख स्थिति में है। एक ऊंचे अधिष्ठान पर बना यह मंदिर गर्भगृह अंतराल और मण्डप में विभक्त है। मंदिर में पूर्व, उत्तर और दक्षिण से प्रवेश हेतु द्वार निर्मित है। प्रत्येक प्रवेश द्वार में अर्ध मंडप और मध्य में चौकोर मंडप स्थित हैं। मंदिर का गर्भगृह वर्गाकार है, यहां गर्भगृह में नीचे जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई है। गर्भगृह में शिवलिंग प्रतिष्ठापित है। इसके अतिरिक्त राजपुरूष, योगी, उमा महेश्वर, नाग आदि प्रतिमाएं गर्भगृह और मंडप में रखी हुई है। मंदिर का शिखर कलश विहीन है। शिखर से मध्य तक चौड़ी सज्जा पट्टियां बनाई गई है। इसकेे साथ ही शिखर लघु शिखरों से सज्जित है। मंदिर की इस तरह की वास्तु योजना इसे परमार स्थापत्य शैली का आभास कराती है।

मन्दिर के बाहरी भित्तियो पर देवी देवताओं की विभिन्न प्रतिमाओं यथा गणेश, वामन, चामुंडा, विष्णु आदि की प्रतिमाएं स्थापित है। इसके अतिरिक्त अत्यधिक मात्रा में नायक नायिकाओ की प्रेम लीला, मैथुन प्रतिमाएं, जन सामान्य, युद्ध, विनोद आदि की सैकड़ों मूर्तियां मन्दिर में लगी हुई है। इस कारण इसे छत्तीसगढ़ का खजुराहो भी कहा जाता है।

मंदिर स्थापत्य और मूर्तिकला में जितना जीवंत है उतना ही रुचिकर इतिहास इसके निर्माता राजवंश फणि नागवंशी के राजाओं का है। ग्यारहवीं सदी में छत्तीसगढ़ में दो नागवंशी राज घराने शासन कर रहे थे एक था बस्तर में छिंदक नाग घराना और दूसरा वर्तमान कवर्धा में शासनरत रहा फणि नागवंश। फणि नागवंश के इतिहास की जानकारी के लिए कई अभिलेख और प्रतिमा लेख प्राप्त हुए हैं। इनमे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है भोरमदेव क्षेत्र के मड़वा महल से मिला अभिलेख। मड़वा महल अभिलेख से फणि नागवंश के प्राचीन इतिहास पर प्रकाश पड़ता है। 

1349 ईसवी के मड़वा महल अभिलेख राजा रामचंद्र देव से सम्बन्धित है जिसमे उन्होंने शिव मंदिर बनवाने का उल्लेख किया है। रामचंद्र देव ने कल्चुरी राजकुमारी अम्बिका देवी से विवाह किया था।  अभिलेख में इस वंश के अहिराज से लेकर रामचंद्र देव और उसके पुत्र अर्जुन तक कुल 25 राजाओं की वंशावली दी गई है। इसमें नागवंश की उत्तपति की कथा दी गई है जिसके अनुसार विंध्य पर्वत पर एक साधु जातुकर्ण रहता था जिसके दो पुत्र सुशर्मा, देवशर्मा तथा एक पुत्री मिथिला थी। अपने बेटों को चौदह विद्याओं की शिक्षा देकर, उन्हें अपनी पुत्री को सौंपकर जातुकर्ण अपनी पत्नी के साथ स्वर्ग चला गया। एक दिन मिथिला आंगन में खेल रही थी तब एक सर्पराज के सेवक ने उसे देख लिया और मिथिला की जानकारी सर्पराज को दी। सर्पराज ने ब्राह्मण कुमार का वेश धारण कर मिथिला को देखने गया। मिथिला और सर्पराज में प्रेम संबंध हो गया और दोनों ने विवाह कर लिया। इन दोनों का पुत्र अहिराज हुआ। अहिराज ने आसपास के राजाओं पर विजय प्राप्त कर राज्य स्थापित किया। अहिराज के बाद राजल्ला शासक हुआ। राजल्ला का बेटा धरणीधर अल्प वयस्क होने के कारण उसका भाई धारल्ला राजा बना। बाद में धरणीधर ने अपने चाचा धारल्ला को हटाकर राज प्राप्त कर लिया। धरणीधर के बाद शक्ति चंद्र और उसके बाद गोपाल देव हुआ। गोपाल देव के बाद नल देव और फिर भुवनपाल राजा हुए।(संदर्भ पुस्तक भोरमदेव क्षेत्र लेखक श्री अजय चंद्रवंशी) 

इसी गोपाल देव को भोरमदेव के इस प्राचीन शिव मंदिर का निर्माता भी माना जाता है। मंदिर में ही 1551 के लेख में इसे भुवन पाल का शिवालय कहा गया है।  अधिकांश इतिहासकार गोपाल देव को ही भोरमदेव के इस शिव मंदिर का निर्माता मानते हैं। भोरमदेव शिव मंदिर में ही योगी की मूर्ति पर राणक गोपाल देव कल्चुरी संवत 840अंकित है जिससे यह समय 1088–89 ठहरता है। भारतीय इतिहास में यह कालखंड मध्य भारत के परमार राजाओं का रहा। 1055 में राजा भोज की मृत्यु के बाद उसका भतीजा उदयादित्य राजा हुआ और उसी के शासन अवधि 1059 ईसवी में मध्य भारत में परमार स्थापत्य कला का मुकुट मणि उदयपुर का नीलकंठेश्वर देवालय प्रतिष्ठित हुआ और 1080 में पुन उदयादित्य ने उसका जीर्णोद्धार कराया। फणि नागवंश के राजा गोपाल देव द्वारा 1088 ईस्वी में भोरमदेव के शिव मंदिर का निर्माण काल भी , तदयुगीन परमार स्थापत्य कला के प्रभावित होने से भी उचित प्रतीत होता है।

भोरमदेव मंदिर के पास ही छेरकी महल और मड़वा महल मंदिर भी दर्शनीय है। कवर्धा क्षेत्र में पचराही, कटंगी, बिरखा, घटियारी, सहसपुर, हरमो आदि गांवों में फणि नागवंश के काल की पुरा संपदा बिखरी पड़ी है। फणि नागवंश का इतिहास भी इस क्षेत्र के मंदिरो की तरह रुचिकर है जिसे इन मंदिरो में छिपे रहस्यों की तरह अनुभूत किया जा सकता है।


ओम प्रकाश सोनी

असिस्टेंट प्रोफेसर इतिहास

सुकमा

आदित्य नायक ने बनवाया था गुरुर का काल भैरव मंदिर

बारहवीं सदी में छत्तीसगढ़ के कल्चुरी और बस्तर के नागवंश के मित्रता और शत्रुता के काल में एक राजवंश का उदय हुआ। वह राजवंश था कांकेर क्षेत्र क...