छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में शिवनाथ नदी के तट पर स्थित है एक महत्त्वपूर्ण नगर धमधा। छ कोरी छह आगर तरिया वाली कहावत अर्थात 126 तालाबों की नगरी धमधा तालाबों की नगरी के साथ ही ऐतिहासिक महत्व की नगरी भी है। यहां इतिहास और तालाबों का आपस में गहरा संबंध है। यहां के सभी स्थानीय शासकों ने तालाबों के निर्माण में विशेष रुचि ली है जिससे धमधा का यह ऐतिहासिक नगर ऐसा लगता है जैसे तालाबों पर तैरती कोई पुरानी बसाहट हो। बारहों मासी पानी से परिपूर्ण तालाबों के बीच इस नगर का अपना एक समृद्ध इतिहास भी है। कल्चुरी शासन काल के यहां कई अवशेष बिखरे पड़े हैं।

धमधा में त्रिमुर्ति महामाया का प्राचीन मंदिर है जो लक्ष्मी काली और सरस्वती को समर्पित है। देवियो की प्रतिमा सिंदूर से पुती हुई है जिससे उनकी पहचान किया जाना संभव नहीं है। महामाया मंदिर के द्वार पट्ट पर संस्कृत का लेख मौजुद है जो संभवत कल्चुरी शासकों द्वारा अंकित होना चाहिए। आश्चर्य होता है कि यह लेख अभी तक ना ही अनुवादित है और ना ही कहीं प्रकाशित है। निश्चित ही इस अभिलेख के पाठन से धमधा के इतिहास में नई कड़ियां जुड़ेगी।महामाया मंदिर के आकर्षण का केंद्र है उसका पुराना विशाल प्रवेश द्वार जिस पर विभिन्न देवी देवताओं और दशावतार की प्रतिमाएं लगी हुई है जो कल्चुरी काल की प्रतीत होता है।

कल्चुरी शासकों के बाद इस क्षेत्र में गोंड शासकों का आधिपत्य स्थापित हुआ। इन गोंड शासकों का एक लंबा शासन धमधा में चला। दुर्ग जिले का गजेटियर के अनुसार सरदा के गोंड जमींदार भाईयो ने धमधा की पुनर्स्थापना की थी। उन्हें सरदा का परगना भी रतनपुर के राजा ने एक पागल हाथी को वश में करने के बदले उपहार में दिया था। यहां गोंड जमींदार को पंच भैया गोंड राजा कहा जाता था जिसका कारण यह है कि ये पांच भाई किसी भी युद्ध में आपस मे गोलाकार बनाकर या एक साथ आगे पीछे घूम घूम कर लड़ते थे।
इन गोंड जमींदारो की एक वंशावली का उल्लेख धमधा के स्थानीय युवा इतिहासकार श्री गोविंद पटेल जी करते हुए लिखते हैं कि धमधा के दाऊ स्व. रामजी अग्रवाल की हस्तलिखित डायरी के अनुसार एक हजार साल पहले धमधा खंडर और जंगल था। वहां कुछ मंदिर, कुंड और प्राचीन मूर्तियों के अवशेष बिखरे पड़े थे। यह किस राजा का राज्य था, किसी को नहीं मालूम है।
सरदा के राजा सांड-विजयी 11-12वीं सदी में यहां पहुंचे। उन्होंने धमधा की पुनर्स्थापना की। उनके राजवंश की सूची इस प्रकार है।
1. सांडदेव- सन् 1165
2. राजा बेन- सन् 1225
3. अवधूत सिंह- सन् 1303
4. गोरखसाय- सन्1338
5. बरियार सिंह- सन् 1365
6. जयभिमान- सन् 1385
7. मधुकर साय- सन् 1428
8. रेवासाय- सन् 1488 (सबसे चर्चित राजा)
9. जयसिंह साय-
10. दशवंत सिंह- सन् 1589 (महामाया मंदिर के संस्थापक)
11. अपरबल सिंह- सन् 1630 (संतान विहीन)
12. मेर सिंह- सन् 1674 (अपरबल सिंह का भतीजा)
13. भवानी सिंह- सन् 1743 (तोप से बांधकर उड़ा दिया गया)
बाद में भोसले शासकों ने धमधा में विभिन्न कमाउसदार नियुक्त कर शासन प्रशासन चलाया।1855 में अंग्रेज शासक सी इलियट ने धमधा में कैंप किया। (स्त्रोत- डॉ. रमेंद्रनाथ मिश्र- अभिलेख साक्ष्य)
1856 में धमधा में नायब तहसीलदार का कार्यालय बना। उस समय रायपुर में छह हजार घर, रतनपुर में तीन हजार घर और धमधा में एक हजार घर होते थे।1856 में धमधा थाना रायपुर तहसील के अंतर्गत आता था। 1857 में धमधा तहसील मुख्यालय को बदलकर दुर्ग तहसील बना दिया गया।(संदर्भ श्री गोविंद पटेल जी धमधा)

धमधा में मध्यकालीन दो पुराने देवालय अवस्थित है। ये देवालय क्रमश: श्री हरि विष्णु और शिव जी को समर्पित है। ये मन्दिर बूढ़ेश्वर शिव मंदिर और चतुर्भुजी मंदिर के नाम से विख्यात है। दोनों देवालय धमधा में बूढ़ा तालाब और चौखड़िया तालाब के मध्य स्थित है। शिव मंदिर आकार में विशाल रहा किंतु इसका शिखर भाग पूर्णत विनष्ट हो चुका है। देवालय के गर्भगृह में शिव लिंग प्रतिष्ठापित है। यह स्थानीय लोगों द्वारा पूजित देवालय है। मन्दिर के सामने नंदी की प्रतिमा है। दूसरा देवालय चतुर्भुजी विष्णु को समर्पित है। यह देवालय आकार में लघु किंतु पूर्ण रूप में अवस्थित हैं। गर्भगृह में विष्णु जी की प्रतिमा स्थापित है। ये दोनों ही मन्दिर चौदहवीं पंद्रहवीं शताब्दी में निर्मित अनुमानित है। इसके साथ ही धमधा में गोंड शासकों का पुराना ध्वस्त महल भी मौजूद है। धमधा में कई सती स्मारक, टूटी फूटी प्रतिमाएं बिखरी पड़ी हुई है। पास ही तितुरघाट में में एक नवीन मन्दिर में विष्णु की अद्भुत प्रतिमा स्थापित है।

धमधा का इतिहास हजार वर्ष से अधिक प्राचीन मालूम होता है। पर्व में कलचुरियो और बाद में स्थानीय गोंड शासकों ने धमधा पर निरंतर शासन किया। इन शासकों की दूर दृष्टि और सुरक्षागत कारणों से ही धमधा में तालाबों का वृहत पैमाने पर जाल बिछा हुआ है। ये तालाब जन उपयोग हेतु आज भी प्रासंगिक है।
आज भले ही धमधा में 25—30 तालाब ही शेष है किंतु धमधा में श्री गोविंद पटेल जी और उनकी पुरी टीम धमधा के इतिहास और तालाबों के सरंक्षण के प्रति सजग है। समय समय पर उनके द्वारा इन विरासतो के प्रति सरंक्षण और जन जागरुकता के कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं। श्री गोविंद पटेल जी के द्वारा धमधा के 126 तालाबों का दस्तावेजीकरण कर एक लघु पुस्तिका के रुप में प्रकाशित किया गया है।आज धमधा एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल के रुप में पहचाना जा रहा है तो उसका कारण धमधा के। श्री गोविंद पटेल जी और उनकी पुरी टीम के जागरूक युवा ही है, जिनके प्रयास सदैव प्रशंसनीय है।
ओम प्रकाश सोनी
असिस्टेंट प्रोफेसर इतिहास
सुकमा छत्तीसगढ़
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