Tuesday, 15 July 2025

आदित्य नायक ने बनवाया था गुरुर का काल भैरव मंदिर

बारहवीं सदी में छत्तीसगढ़ के कल्चुरी और बस्तर के नागवंश के मित्रता और शत्रुता के काल में एक राजवंश का उदय हुआ। वह राजवंश था कांकेर क्षेत्र का सोमवंश। बारहवीं सदी से लेकर चौदहवीं सदी तक कांकेर क्षेत्र में सोमवंशी शासकों का शासन हुआ करता था। इस राजवंश में सिंहराज, बाघराज, कर्णराज, पंपराज, भानुदेव जैसे प्रसिद्ध और प्रतापी राजा हुए। सिहावा अंचल का कर्णेश्वर महादेव मंदिर इन्हीं सोमवंशी शासकों द्वारा निर्मित है। इन राजाओं ने अपने इस पूरे कांकेर अंचल में कई मंदिर और मूर्तियां का निर्माण कराया। ऐसा ही एक मंदिर गुरूर में भी बना हुआ। 

बालोद जिले के गुरुर गांव में एक प्राचीन मंदिर है जिसे देऊर मंदिर कहा जाता है। यह काल भैरव को समर्पित है। मंदिर गर्भगृह अन्तराल और मंडप में विभक्त है। गर्भगृह वर्तमान में रिक्त है। मंडप चार साधारण स्तंभों पर आधारित है। यह मंदिर दक्षिण के चालुक्य शैली में निर्मित है। इस आधार पर इस मंदिर को आजकल सातवीं आठवीं सदी में बना हुआ कहा जाने लगा है। मूलतः यह मंदिर बारहवीं सदी सोमवंशी राजा बाघराज के नायक आदित्य देव द्वारा निर्मित है। इस मंदिर में कालभैरव की प्रतिमा रही होगी जो अब मंदिर में नहीं है। 

इस मंदिर का अभिलेख पास के खेत में पड़ा हुआ है। जिससे मंदिर के इतिहास पर प्रकाश पड़ता है। अभिलेख नागरी लिपि और संस्कृत भाषा में है। अभिलेख का मूल पाठ रायबहादुर हीरालाल ने प्रस्तुत किया है।  अभिलेख की निचली पंक्तियां घिस गई जिसके कारण पूरा पाठ उपलब्ध नहीं है। (संदर्भ इण्डियन एंटीक्वेरी 1926 पृष्ठ 44)

स्वस्ति काकरय

परम महेश्वर 

सोम कुल तिलक 

राणक श्री वाघराज 

राज्य नायक श्री आदित्येव  

श्री उमानाथ श्री कालभैरव 

भूमि प्रदत्ता राज्य भविष्यति तस्य अहम कृत

इन पंक्तियों से स्पष्ट है कि काकरय (कांकेर) के सोम कुल तिलक राणक श्री वाघराज के राज्य में नायक श्री आदित्य ने श्री उमानाथ (शिव) और श्री कालभैरव को भूमि अर्पित की।

इस अभिलेख और सोमवंशी राजा बाघराज के शासन अवधि से स्पष्ट है कि कालभैरव का यह मंदिर इस आदित्य नायक ने बारहवीं सदी में बनवाया था। 

धमतरी से बालोद जाने वाले मार्ग में गुरुर कस्बे में यह कालभैरव को समर्पित प्राचीन मंदिर अवस्थित है। 



तालाबों के साथ संरक्षित है धमधा का इतिहास

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में शिवनाथ नदी के तट पर स्थित है एक महत्त्वपूर्ण नगर धमधा। छ कोरी छह आगर तरिया वाली कहावत अर्थात 126 तालाबों की नगरी धमधा तालाबों की नगरी के साथ ही ऐतिहासिक महत्व की नगरी भी है। यहां इतिहास और तालाबों का आपस में गहरा संबंध है। यहां के सभी स्थानीय शासकों ने तालाबों के निर्माण में विशेष रुचि ली है जिससे धमधा का यह ऐतिहासिक नगर ऐसा लगता है जैसे तालाबों पर तैरती कोई पुरानी बसाहट हो। बारहों मासी पानी से परिपूर्ण तालाबों के बीच इस नगर का अपना एक समृद्ध इतिहास भी है। कल्चुरी शासन काल के यहां कई अवशेष बिखरे पड़े हैं। 

धमधा में त्रिमुर्ति महामाया का प्राचीन मंदिर है जो लक्ष्मी काली और सरस्वती को समर्पित है। देवियो की प्रतिमा सिंदूर से पुती हुई है जिससे उनकी पहचान किया जाना संभव नहीं है। महामाया मंदिर के द्वार पट्ट पर  संस्कृत का लेख मौजुद है जो संभवत कल्चुरी शासकों द्वारा अंकित होना चाहिए। आश्चर्य होता है कि यह लेख अभी तक ना ही अनुवादित है और ना ही कहीं प्रकाशित है। निश्चित ही इस अभिलेख के पाठन से धमधा के इतिहास में नई कड़ियां जुड़ेगी।महामाया मंदिर के आकर्षण का केंद्र है उसका पुराना विशाल प्रवेश द्वार जिस पर विभिन्न देवी देवताओं और दशावतार की प्रतिमाएं लगी हुई है जो कल्चुरी काल की प्रतीत होता है। 

कल्चुरी शासकों के बाद इस क्षेत्र में गोंड शासकों का आधिपत्य स्थापित हुआ। इन गोंड शासकों का एक लंबा शासन धमधा में चला। दुर्ग जिले का गजेटियर के अनुसार सरदा के गोंड जमींदार भाईयो ने धमधा की पुनर्स्थापना की थी। उन्हें सरदा का परगना भी रतनपुर के राजा ने एक पागल हाथी को वश में करने के बदले उपहार में दिया था। यहां गोंड जमींदार को पंच भैया गोंड राजा कहा जाता था जिसका कारण यह है कि ये पांच भाई किसी भी युद्ध में आपस मे गोलाकार बनाकर या एक साथ आगे पीछे घूम घूम कर लड़ते थे।

इन गोंड जमींदारो की एक वंशावली का उल्लेख धमधा के स्थानीय युवा इतिहासकार श्री गोविंद पटेल जी करते हुए लिखते हैं कि धमधा के दाऊ स्व. रामजी अग्रवाल की हस्तलिखित डायरी के अनुसार एक हजार साल पहले धमधा खंडर और जंगल था। वहां कुछ मंदिर, कुंड और प्राचीन मूर्तियों के अवशेष बिखरे पड़े थे। यह किस राजा का राज्य था, किसी को नहीं मालूम है।

सरदा के राजा सांड-विजयी 11-12वीं सदी में यहां पहुंचे। उन्होंने धमधा की पुनर्स्थापना की। उनके राजवंश की सूची इस प्रकार है।

1.      सांडदेव- सन् 1165

2.      राजा बेन- सन् 1225

3.      अवधूत सिंह- सन् 1303

4.      गोरखसाय- सन्1338

5.      बरियार सिंह- सन् 1365

6.      जयभिमान- सन् 1385

7.      मधुकर साय- सन् 1428

8.      रेवासाय- सन् 1488 (सबसे चर्चित राजा)

9.      जयसिंह साय-

10.  दशवंत सिंह- सन् 1589 (महामाया मंदिर के संस्थापक)

11.  अपरबल सिंह- सन् 1630 (संतान विहीन)

12.  मेर सिंह- सन् 1674 (अपरबल सिंह का भतीजा)

13.  भवानी सिंह- सन् 1743 (तोप से बांधकर उड़ा दिया गया)

बाद में भोसले शासकों ने धमधा में विभिन्न कमाउसदार नियुक्त कर शासन प्रशासन चलाया।1855 में अंग्रेज शासक सी इलियट ने धमधा में कैंप किया। (स्त्रोत- डॉ. रमेंद्रनाथ मिश्र- अभिलेख साक्ष्य)

1856 में धमधा में नायब तहसीलदार का कार्यालय बना। उस समय रायपुर में छह हजार घर, रतनपुर में तीन हजार घर और धमधा में एक हजार घर होते थे।1856 में धमधा थाना रायपुर तहसील के अंतर्गत आता था। 1857 में धमधा तहसील मुख्यालय को बदलकर दुर्ग तहसील बना दिया गया।(संदर्भ श्री गोविंद पटेल जी धमधा)

धमधा में मध्यकालीन दो पुराने देवालय अवस्थित है। ये देवालय क्रमश: श्री हरि विष्णु और शिव जी को समर्पित है। ये मन्दिर बूढ़ेश्वर शिव मंदिर और चतुर्भुजी मंदिर के नाम से विख्यात है। दोनों देवालय धमधा में बूढ़ा तालाब और चौखड़िया तालाब के मध्य स्थित है। शिव मंदिर आकार में विशाल रहा किंतु इसका शिखर भाग पूर्णत विनष्ट हो चुका है। देवालय के गर्भगृह में शिव लिंग प्रतिष्ठापित है। यह स्थानीय लोगों द्वारा पूजित देवालय है। मन्दिर के सामने नंदी की प्रतिमा है। दूसरा देवालय चतुर्भुजी विष्णु को समर्पित है। यह देवालय आकार में लघु किंतु पूर्ण रूप में अवस्थित हैं। गर्भगृह में विष्णु जी की प्रतिमा स्थापित है। ये दोनों ही मन्दिर चौदहवीं पंद्रहवीं शताब्दी में निर्मित अनुमानित है। इसके साथ ही धमधा में गोंड शासकों का पुराना ध्वस्त महल भी मौजूद है। धमधा में कई सती स्मारक, टूटी फूटी प्रतिमाएं बिखरी पड़ी हुई है। पास ही तितुरघाट में में एक नवीन मन्दिर में विष्णु की अद्भुत प्रतिमा स्थापित है। 

धमधा का इतिहास हजार वर्ष से अधिक प्राचीन मालूम होता है। पर्व में कलचुरियो और बाद में स्थानीय गोंड शासकों ने धमधा पर निरंतर शासन किया। इन शासकों की दूर दृष्टि और सुरक्षागत कारणों से ही धमधा में तालाबों का वृहत पैमाने पर जाल बिछा हुआ है। ये तालाब जन उपयोग हेतु आज भी प्रासंगिक है। 

आज भले ही धमधा में 25—30 तालाब ही शेष है किंतु धमधा में श्री गोविंद पटेल जी और उनकी पुरी टीम धमधा के इतिहास और तालाबों के सरंक्षण के प्रति सजग है। समय समय पर उनके द्वारा इन विरासतो के प्रति सरंक्षण और जन जागरुकता के कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं। श्री गोविंद पटेल जी के द्वारा धमधा के 126 तालाबों का दस्तावेजीकरण कर एक लघु पुस्तिका के रुप में प्रकाशित किया गया है।आज धमधा एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल के रुप में पहचाना जा रहा है तो उसका कारण धमधा के।  श्री गोविंद पटेल जी और उनकी पुरी टीम के जागरूक युवा ही है, जिनके प्रयास सदैव प्रशंसनीय है।


ओम प्रकाश सोनी

असिस्टेंट प्रोफेसर इतिहास

सुकमा छत्तीसगढ़


#dhamdha

Monday, 14 July 2025

सोमवंशी राजाओं की विरासत — कर्णेश्वर मंदिर सिहावा

विश्व विरासत दिवस के अवसर पर आज के बस्तर का ही अंग कांकेर और उसके प्राचीन धरोहरों की चर्चा करना नितांत आवश्यक है। आज कांकेर अपनी अलग संस्कृति और इतिहास के बावजूद भी बस्तर में विलीन हो गया है। बस्तर की छाप कांकेर पर इतनी गहरी पड़ चुकी है कि कांकेर का गौरवपूर्ण इतिहास और यहां की प्राचीन विरासत अपनी अलग पहचान खो चुके हैं। 

कांकेर एक अलग राज्य रहा है। इसका अपना समृद्ध इतिहास रहा है। आजादी के बाद बस्तर और कांकेर दोनो रियासतों को मिलाकर बस्तर जिला बना दिया गया था। आज बस्तर  में कुल 7 जिले है एवं संभाग का नाम बस्तर है। 

कांकेर मे ग्यारहवी सदी से चौदहवी सदी के पूर्वाद्ध तक सोमवंशी राजाओं का शासन था। सोमवंशी शासकों ने कांकेर के अलावा सिहावा क्षेत्र में भी अपनी राजधानी बनाई थी। सिहावा क्षेत्र वर्तमान धमतरी जिले के अंतर्गत आता है। सिहावा 1830 ई तक बस्तर रियासत का महत्वपूर्ण परगना था।  

बस्तर ग्यारहवीं सदी में चक्रकोट के नाम से छिंदक नाग राजाओं द्वारा शासित कल्याणकारी राज्य था। पड़ोसी कांकेर जिला काकरय के नाम से तत्समय सोमवंशी शासकों का शासन क्षेत्र था। काकरय के सोमवंशी राजाओं में सिंहराज, व्याघ्रराज, बोपदेव, कर्णराज, पंपराज प्रमुख शासक हुए।  कर्णराज की  शासन अवधि काकरय राज्य का स्वर्ण काल था। आज भी कांकेर के जन सामान्य में कर्ण राजा की कई अनुश्रुतियां व्याप्त है। कर्णराज के समय कांकेर में कई देवालयों का निर्माण हुआ। ये मंदिर आज भी करप सिहावा में देखे जा सकते हैं।

सिहावा में कांकेर के सोमवंशी राजा कर्णराज द्वारा बनवाये हुये कुल 5 प्राचीन मंदिर है। इन मंदिर समूह को कर्णेश्वर महादेव मंदिर समूह के नाम से जाना जाता है। इन मंदिरों में एक मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। दुसरा मंदिर रामजानकी मंदिर है जिसमें भगवान राम सीता लक्ष्मण की संगमरमर की नवीन प्रतिमा एवं विष्णु की दो तथा सूर्य की एक प्राचीन प्रतिमा रखी हुई है। अन्य दो मंदिरों मे क्रमश भगवान गणेश, दुर्गा की प्रतिमायें कालांतर में रखी गई है। एक मंदिर बेहद छोटा है जिसमें सूर्य की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर परिसर में सूर्य, गणेश, सरस्वती, सती, और योद्धाओ की कई प्रतिमाएं भी रखी हुई।

शिवमंदिर के मंडप की भित्ति में शिलालेख जड़ा हुआ हे। शिलालेख की भाषा संस्कृत और लिपि नागरी है। इस शिलालेख के अनुसार सोमवंशी राजा कर्ण ने स्वयं के पूण्य लाभ के लिये देवहदा में भगवान शिव और केशव के मंदिर बनवाये। राजा कर्ण ने अपने माता पिता के पूण्य लाभ के लिये त्रिशुलधारी शिव के दो मंदिर एवं अपने भाई रणकेसरी के लिये एक मंदिर बनवाया था। देवहदा आज का देऊरपारा है जहां ये मंदिर अवस्थित है।

इन मंदिर समुह से एक किलोमीटर की दुरी पर तालाब के किनारे एक प्राचीन कुंड है। इसके पास ही एक नदी बहती है। नदी के तट पर एक मंदिर के अवशेष बिखरे पड़े है। इस मंदिर का निर्माण कर्णराज की रानी भोपल देवी ने करवाया था। जिसमें विष्णु की प्रतिमा स्थापित थी। 

ये सभी मंदिर ओडिसा शैली में है। शिलालेख में तिथि शकसंवत 1114 ई तदनुसार सन 1192 अंकित है। यही मंदिरों के निर्माण तिथि भी है। बस्तर और कांकेर के मंदिरो की एक ही निर्माण अवधि के बावजूद भी शिल्प और स्थापत्य दोनों में बेहद ही भिन्नता नजर आती है। 


धमतरी के पास स्थित नगरी से पहले बायीं तरफ पांच किलोमीटर दुर देवपुर गांव है इस देवपुर गांव के देउरपारा में ये मंदिर स्थित है। पास ही महानदी का उदगम एवं श्रृंगी ऋषि का आश्रम भी स्थित है , इन मंदिरो के साथ ही आश्रम के दर्शन भी किए जा सकते हैं।


Sunday, 13 July 2025

बालोद का कपिलेश्वर मंदिर समूह

छत्तीसगढ़ में बालोद जिला दुर्ग जिले से 2012 में  अलग होकर एक नया जिला बना है। बालोद का पुरा क्षेत्र मध्यकालीन पुरातात्विक स्मारकों के लिये भी प्रसिद्ध है। बालोद शहर के अंतिम छोर पर कपिलेश्वर मंदिर समूह है। इस मंदिर समूह में भगवान शिव, देवी दुर्गा, भगवान गणेश, भगवान कृष्ण, देवी संतोषी और राम जानकी को समर्पित छः मंदिर है। इसके अतिरिक्त बालोद में एक प्राचीन किले के भग्नावशेष उसका द्वार, कई प्रतिमाएं मौजूद है। बालोद के आसपास की परिधि में जगन्नाथपुर, पलारी, मालीघोरी , चिरचारी, महामाया, डौंडी लोहारा, गौरेया आदि स्थलों में ऐतिहासिक महत्त्व के स्मारक, मूर्तियां और भग्नावशेष प्राप्त होते हैं।

ये सारे स्मारक मध्यकाल में निर्मित अनुमानित है। छत्तीसगढ़ में दसवीं ग्यारहवीं सदी से लेकर अठारहवी सदी तक कल्चुरी शासकों का शासन रहा। ग्यारहवी बारहवी सदी इनके राजत्व का स्वर्णिम युग था। इस दौरान पुरे छत्तीसगढ़ में इन्होंने कई देवालय बनवाए जो स्थापत्य और मूर्तिकला के बेजोड़ नमूने हैं। इस दौरान बस्तर क्षेत्र में छिंदक नागवंशी और कवर्धा क्षेत्र में फणि नागवंशी राजाओं का शासन रहा। मध्य काल में कल्चुरी शासकों की सत्ता कमजोर पड़ गई थी और इनकी राज्य लक्ष्मी भी लुप्त हो गई थी। 

इस दौरान बालोद क्षेत्र में ऐसा कौन सा राजवंश शासनरत रहा जिसने इन मंदिरों का निर्माण कराया? स्थानीय तौर पर लोगों का मानना है कि यहां नागवंशी राजाओं का शासन रहा और उन्होंने ही ये सारे मन्दिर बनवाए। कपिलेश्वर मन्दिर में नाग की प्रतिमाएं उत्कीर्ण है जिससे इस बात को थोड़ा बल मिलता है। बालोद के कपिलेश्वर मन्दिर परिसर में कोई अभिलेख अभी मौजूद नहीं है किंतु दुर्ग गजेटियर में यहां दो अभिलेख मौजूद होने की बात कही गई किंतु उन्हें वहां से हटा लिया गया ऐसा उल्लेख मिलता है। 

अगर वो अभिलेख कहीं सही स्थिति में है या उनका अनुवाद कहीं छपा होता तो यह पता चल जाता कि यहां अतीत में कौन सा वंश रहा और किसने कब इन मंदिरों को बनवाया। अगर स्थानीय स्तर की बात को सही मानकर चले कि यहां नागवंशियो की राज रहा तो वे नागवंशी शासक कौन रहे? अनुमान कर सकते हैं कि नागों की वो शाखा कवर्धा के फणी नागवंशी शाखा से संबंध रही या फिर बस्तर के छिंदक नागवंशी शाखा से या फिर स्वतंत्र कोई अलग शाखा। 

दुसरी महत्त्वपूर्ण बात मुझे देखने को मिली कि छत्तीसगढ़ में बस्तर के बाद बालोद ऐसा क्षेत्र है जहां सर्वाधिक गणेश प्रतिमाएं देखने को मिलती है। जिसमे अधिकांश गणेश प्रतिमाएं पांच फीट या उससे भी बड़ी है। तब ऐसा अनुमान होता है कि यहां नागवंशियो की स्थानीय शाखा निश्चित ही बस्तर के छिंदक नागवंश से सम्बन्धित रही तभी इन्होंने बस्तर के नागवंशियो की तरह ही गणेश की इतनी प्रतिमाएं बनवाई। हालांकि यह सिर्फ़ अनुमान है। यहां कौन राजवंश रहा इसकी कोई लिखित जानकारी मुझे प्राप्त नहीं हुई है। महासिंह और बाला शाह जैसे राजाओं के नामोल्लेख की कुछ अपुष्ट जानकारी बस प्राप्त हुई है।यदि इस बारे में कोई जानकारी किसी को हो तो अवश्य साझा करें।

बालोद में शहर से दूर कुल छह मंदिरों का एक समूह है जिसे कपिलेश्वर मंदिर समूह कहा जाता है। यह कपिलेश्वर नाम कैसा पड़ा? इसका कोई उल्लेख नहीं मिला है।भगवान शंकर को समर्पित कपिलेश्वर मंदिर इनमें सबसे बड़ा मंदिर है। पूर्वाभिमुख इस मंदिर में सिर्फ गर्भगृह मात्र है। मंदिर का शिखर भी काफी उंचा है। दोनों तरफ भगवान गणेश की 6 फीट की प्रतिमायें स्थापित है। मंदिर के द्वारशाखा के दायें  और बायें तरफ गंगा यमुना और द्वारपाल की प्रतिमायें स्थापित है। 

इन मंदिरों समुहों में दुसरा मंदिर भगवान गणेश को समर्पित है। इस मंदिर के गर्भगृह में भगवान गणेश की छ फीट की प्रतिमा स्थापित है। इस मंदिर का शिखर उपर की ओर संकरा होता गया है। मंदिर का शिखर पीड़ा देवल प्रकार में निर्मित है। छत्तीसगढ़ में भगवान गणेश की अनेकों प्रतिमायें मिलती है किन्तु अधिकांश प्रतिमायें खुले में या किसी मंदिर के मंडप में स्थापित प्राप्त होती है किन्तु ऐसे मंदिर बेहद की कम प्राप्त होते है जो कि सिर्फ भगवान गणेश को समर्पित है। भगवान राम का मंदिर गर्भगृह और मंडप में विभक्त है। इसमें भगवान राम की आधुनिक प्रतिमा स्थापित है।  

भगवान कृष्ण और मां दुर्गा के पुराने मंदिरों में इनके आधुनिक प्रतिमायें स्थापित है। संतोषी माता का मंदिर इन सभी मंदिरों में सबसे छोटा है। इस मंदिर का शिखर पीड़ा देवल आकृति में बना हुआ है। मंदिरों के पास बावड़ी या तालाब बनाने की परंपरा यहां पर भी देखने को मिलती है। 

शिव मंदिर के सामने एक बावड़ी बनी हुई है।  जिसमें योद्धाओं की प्रतिमायें स्तंभों पर स्थापित  है। इन मंदिरों का निर्माण काल 15 वी -16 वी सदी माना गया है। शहर में ही कुछ दूरी पर बूढ़ा तालाब मौजूद हैं जिस पर किले की चार दिवारी और एक बड़ा प्रवेशद्वार अवस्थित है। जिससे प्रतीत होता है यहां कभी बड़ा सा किला रहा होगा जिसमे राजपरिवार निवासरत रहा होगा। इसके पास ही चार दिवारी में खुला संग्रहालय है जिसमे कई प्रतिमाएं रखी हुई है।

ओम प्रकाश सोनी

Saturday, 12 July 2025

भोरमदेव क्षेत्र का मड़वा महल मंदिर

छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहे जाने वाले भोरम देव देवालय के पास ही एक मध्य कालीन शिव मंदिर अवस्थित हैं। वर्तमान में यह मंदिर मड़वा महल के नाम से चर्चित है। यह मंदिर स्थापत्य की अपेक्षा इतिहास की दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण है। कारण कि इस मंदिर से एक अभिलेख प्राप्त हुआ है जिससे फणि नागवंशी राजाओं के प्राचीन इतिहास की दुर्लभ जानकारी प्राप्त होती है। 

देवालय स्थापत्य की दृष्टि से सामान्य ही है। मंदिर गर्भगृह अंतराल और मण्डप में विभक्त है। शिखर पूरी तरह से खंडित है। मण्डप सादे प्रस्तर स्तंभों पर आधारित है। गर्भगृह का प्रवेश द्वार अलंकृत है। द्वार पर शिव, गणेश, परिचारिका आदि का अलंकरण है। गर्भगृह में शिवलिंग प्रतिष्ठापित है।इस शिव मंदिर को मड़वा महल या दूल्हा देव मंदिर कहा जाता है। माना जाता है कि इस मंदिर में विवाह होता था इसलिए इसे मड़वा महल कहा जाता है।

इस मंदिर से फणि  नागवंशी राजा रामचंद्र देव का विक्रम संवत 1406 सन 1349 का अभिलेख प्राप्त हुआ है। संस्कृत में लिखा यह लेख वर्तमान में महंत घासीदास संग्रहालय रायपुर में प्रतिस्थापित है। इस अभिलेख के अनुसार मड़वा महल मंदिर मूल रूप से रामेश्वर शिव मंदिर है। यह मंदिर फणि  नागवंशी राजा रामचंद्र देव ने बनवाया था। इसका वास्तुकार महादेव था जो शिल्प शास्त्र का ज्ञाता था। मन्दिर के भोग प्रसाद के लिए राजपुरा ग्राम दान दिया गया था।

इस अभिलेख में फणि  नागवंशी राजाओं की उत्पत्ति की कथा का उल्लेख है। इसमें अहिराज से लेकर रामचंद्र देव तक राजाओं की वंशावली का भी लेख मिलता है। राजा रामचंद्र की सात रानियों और उसके कई पुत्र पुत्रियों का नाम भी लेख में आया है। इसमें प्रशस्ति कार का नाम विट्ठल है जो दक्षिण का है। प्रशस्ति के उत्कीर्ण कर्ता का नाम नष्ट हो गया है। मड़वा महल का अभिलेख फणि  नागवंशी राजाओं के इतिहास की आधार पूर्ण जानकारी उपलब्ध कराता है। (अभिलेख की महत्त्वपूर्ण जानकारी के लिए संदर्भ पुस्तक भोरमदेव क्षेत्र लेखक श्री अजय चन्द्रवंशी) 

मंदिर के बाहरी दीवारों पर कई मिथुन प्रतिमाएं स्थापित है जिसके कारण यह मन्दिर भी खजुराहो के मंदिरो की तरह छत्तीसगढ़ मे अपनी पहचान रखता है। मन्दिर परिसर में कई योद्धा स्मारक, सती स्मारक रखे हुए हैं। 


ओम प्रकाश सोनी

आदित्य नायक ने बनवाया था गुरुर का काल भैरव मंदिर

बारहवीं सदी में छत्तीसगढ़ के कल्चुरी और बस्तर के नागवंश के मित्रता और शत्रुता के काल में एक राजवंश का उदय हुआ। वह राजवंश था कांकेर क्षेत्र क...