शिव मंदिर देवबलोदा ....!
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के पास यदि आपको आश्चर्यजनक मूर्तिशिल्प युक्त ऐतिहासिक मंदिर देखने की ईच्छा हो तो आप देवबलोदा जरूर जाईये। पिछले दो तीन सालों से देवबलोदा के शिव मंदिर को देखने की मेरी ईच्छा थी किन्तु रायपुर आने के बाद भी वह ईच्छा किन्हीं कारणों से पुरी नहीं हो पा रही थी। गुरू घासीदास जयंती के पावन अवसर पर मेरे मित्र जितेन्द्र नक्का के सौजन्य से देवबलोदा के शिव मंदिर को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
जहां पुरा छत्तीसगढ़ फेथाई तुफान के कारण शीतलहर और बरसात के चपेट में था वहीं हम दोनों दिन के तीन बजे मोटरसायकिल से देवबलोदा की ओर जा रहे थे। हड्डियां कप कपा दे ऐसी ठंडी हवा के झोंके सहने की ताकत पता नहीं कैसे हम दोनो में आ गई थी। दरअसल हमारी प्रबल इच्छाशक्ति के कारण हममें गजब की ताकत आ गई थी। जितेन्द्र नक्का का कहना था कि कम से कम दो सप्ताह में एक टूर उनके लिये एनर्जी के इंजेक्शन की तरह काम करता है। यदि कोई टूर ना हो तो उनकी एनर्जी लो हो जाती है। ऐसी कुछ कहानी मेरी भी यही थी। हम दोनो पुराने मित्र है। जितेन्द्र नक्का जी ने तो छत्तीसगढ़ के लगभग सभी ऐतिहासिक मंदिरो, झरनों और गुफाओं के दर्शन कर लिये है। उनके मुकाबले मैने अभी आधी दुरी तय की है। खैर बस्तर भ्रमण के मामले में मैं उनसे कई गुना आगे हूं।
रायपुर की टैªफिक से भरपूर रास्तों में धक्का-मुकी , पुचकारते-दुतकारते और गिरते-पड़ते हम देवबलोदा की ओर बहुत तेजी से बढ़ रहे थे। इस बार शाम होने का कोई डर नहीं था क्योंकि बादल छाये होने के कारण दिन के तीन बजे भी शाम के छः बजे सा अहसास हो रहा था।
देवबलोदा रायपुर से लगभग 18 -20 किलोमीटर की दुरी पर ही है। भिलाई चरोदा के पास ही देवबलोदा नाम की छोटी सी बस्ती है। मुख्य राजमार्ग से लगभग तीन किलोमीटर अंदर जाने पर छत्तीगसढ़ की इस ग्राम की झलकियां देखने को मिलती है। यह तीन किलोमीटर का मार्ग भी बड़ा ही पेचीदा है। घुमावदार कच्चे पक्के मार्ग और बीच में पड़ते रेलवे फाटकों की मुसीबत को झेलना तो अनिवार्य है। चंूकि बस्ती पुरी तरह रेल्वे लाईन के किनारे बसी है जिसके कारण हमें बार बार पटरियां की भूलभूलैया को पार करना पड़ रहा था। बस्ती की तंग गलियों से पूछते पूछते हम देवबलोदा के ऐतिहासिक शिव मंदिर के द्वार पर पहंूच गये।
मंदिर की स्थिति:-
यह मंदिर केन्द्रीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है जिसके कारण इसके चारों तरफ पक्की दिवार से घेरा बंदी की गई है। मंदिर रेल्वे लाईन के बेहद ही पास होने के कारण चलती टेªन से भी इस मंदिर की एक झलक को देखा जा सकता है। मंदिर परिसर के बाहर एक विशाल तालाब है। पुराने समय में यह प्रथा रही कि मंदिर के साथ तालाब अनिवार्य रूप से खुदवाया जाता था। मंदिर परिसर के अंदर भी मंदिर से लगी हुई एक मध्यम बावड़ी बनी हुई है।
यह मंदिर पूर्वाभिमुख है। लाल बलूआ पत्थर से बना हुआ यह ऐतिहासिक मंदिर अपने मूर्तिशिल्प के कारण किसी भी शोधार्थी के लिये आदर्श स्थल है। मैं तो मंदिर की बाहरी दिवारों पर लगी प्रतिमाओं को देखकर दंग रह गया था। रायपुर के आसपास के लगभग सभी ऐतिहासिक मंदिरों में से देवबलोदा का यह मंदिर प्रतिमाओं के मामले में सबसे आगे है। इस कारण ही मुझे इसे देखने की ईच्छा थी।
मंदिर गर्भगृह अंतराल और मंडप में विभक्त है। मंदिर में प्रवेश करने के लिये दो द्वार है एक पूर्व की तरफ से और दूसरा उत्तर की तरफ। दोनो तरफ सात सीढ़ियां चढ़कर मंदिर में प्रवेश करना होता है। मंदिर का मंडप कुल 16 स्तंभों पर टिका हुआ है। प्रत्येक स्तंभ आकर्षक शिल्पाकृतियांे से युक्त है। स्तंभों पर महिषासुर मर्दिनी, कृष्ण, गणेश, भैरव और कीर्तिमुख की सुंदर आकृतियां निर्मित है।
मंदिर का प्रवेशद्वार बेहद अलंकृत है। दोनो तरफ शैवद्वार पाल पहरा देते हुये स्थापित है। द्वारशाखा के दोनो तरफ अमृतकलश युक्त स्तंभ है। द्वारशाखा के ललाट बिंब पर भगवान गणेश की प्रतिमा अंकित है। उपर की तरफ भगवान कृष्ण भैरव आदि की प्रतिमायें अंकित है। क्षरित होने के कारण अधिक जानना संभव नहीं हो पाया। प्रवेशद्वार के पास ही दोनो तरफ के आलिंदो में भगवान गणेश की प्रतिमायें स्थापित है।
मंदिर का गर्भगृह काफी गहराई में है। लगभग 7-8 खड़ी सीढ़ियां उतरने के बाद ही गर्भगृह में प्रवेश किया जा सकता है। गर्भगृह में शिवलिंग प्रतिष्ठापित है। शिवलिंग जल की निकासी के लिये प्रणालिका का मुख भी बावड़ी के तरफ ही निर्मित की गई है।
मंदिर का शिखर बारसूर के बत्तीसा मंदिर की तरफ बिल्कुल समतल एवं सपाट है। पुरातत्व विभाग के सूचना पटट के अनुसार शिखर नागर शैली में निर्मित रहा होगा। मंदिर की बाहरी भित्तियों पर सबसे उपर की दो पंक्तियो में वेणुगोपाल, महिषासुर मर्दिनी, भैरव, नरसिंह, वराह, त्रिपुरान्तक शिव, गजान्तक शिव, केशिवध जैसी प्रतिमाओं का सुरूचिपूर्ण अंकन किया गया है। पिछली दिवार की दो आलिंद प्रतिमा विहिन है।
मंदिर के निचले तीन थर नर थर, अश्वथर और गज थर में विभक्त है। जिसमें हाथी, शिकार, और किसी युद्ध एवं अन्य मानवीय दृश्यों का बेहद ही कलात्मक अंकन किया गया है। मंदिर के सामने नंदी महाराज विराजित है। पास हीएक सती स्तंभ रखा हुआ है। किनारे पीपल पेड़ के नीचे बहुत सी भग्न प्रतिमायें भी रखी हुई है।
इस मंदिर से जुड़ी हुई दो किंवदंतियां लोगों की जुबान से सुनने को मिलती है। कहते है कि मंदिर का शिल्पी मंदिर निर्माण में इतना तल्लीन हो गया था कि उसे अपने कपड़ो का भी होश नहीं रहा। वह पूर्णतः नग्न होकर मंदिर के निर्माण में लगा हुआ था। एक दिन उसकी पत्नि की जगह उसकी बहन उसके लिये खाना लेकर आयी। बहन के सामने नग्न अवस्था में होने के कारण शिल्पी को बेहद शर्म महसूस हुई।
उसने खुद को छिपाने के लिये मंदिर के कुंड में छलांग लगा ली। भाई के मरने के गम में बहन भी बाहर बने तालाब में कुद गई। वह पानी के कलश के साथ पानी में कुद गई थी जिसके कारण उस तालाब का नाम करसा तालाब पड़ गया। आसपास के लोगों के अनुसार तालाब के मध्य में आज भी कलश आकृति प्रस्तर है। कुंड के बारे में लोगों का कहना है कि इस के मध्य में एक सुरंग बनी हुई है जो सीधे आरंग को जाती है। शिल्पी जब कुंड में कुदा तो तो उसे वहां सुरंग मिली। कहते है कि वह शिल्पी सुरंग में पत्थर का बन गया है।
दुसरी किंवदंती के मुताबिक यह मंदिर छः मासी रात दिन के समय में निर्मित हुआ है जिसके कारण इस मंदिर को छमासी मंदिर भी कहा जाता है।
इस मंदिर को कल्चुरी शासन के दौरान तेरहवी सदी में निर्मित माना गया है। अगले भाग में मंदिर के प्रतिमाओं में अंकित हाथी, शिकार एवं युद्ध दृश्य के संबंध में चर्चा करेंगे। क्रमशः
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