रोजा का मकबरा मांडू.......!
मांडू का सौंदर्य यहां के प्राकृतिक दृश्यों में तो समाहित है ही, साथ ही साथ यहां की मध्यकालीन ऐतिहासिक ईमारतों की वास्तुकला भी मांडू के सौंदर्य में चार चांद लगा देती है। हरे भरे खेतों के बीच, उंची पहाड़ियों पर, तालाबों के मध्य बनी हुई ये ईमारते मांडू के प्राकृतिक दृश्यावली के असीम सौंदर्य का अहम हिस्सा है। मांडू में गेंहू के खेतों के मध्य बना रोजा का मकबरा भी एक बेहद शानदार ईमारत है। हरे भरे खेतों के बीच स्थित यह ऐतिहासिक मकबरा, अपने वास्तुकला के कारण, मांडू में आये पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करने में कोई कसर नहीं छोड़ता है।
इस मकबरे का इतिहास भी काफी रोचक है। मांडू को सूफी संतो ने अपना केन्द्र बनाकर अपने विचारों का प्रचार प्रसार किया था। यह मकबरा भी तत्कालीन एक मात्र महिला सूफी साधिका खदीजा बीबी की कब्र पर बना हुआ है। इस सूफी साधिका का विवाह कुतूबुददीन से हुआ था। उसके देहांत के बाद इन्हे भी इसी मकबरे में दफनाया गया। यहां स्थित कब्रो पर अरबी लिपि में कलमा खुदा हुआ है। गौसी सत्तारी द्वारा लिखित ग्रंथ गुलजारे अबरार में खदीजा बीबी के बारे में विशद वर्णन है। जिसमें उन्हें मांडू की एक मात्र सूफी साधिका के रूप में उल्लेखित किया गया है।
यह मध्यम आकार का मकबरा वास्तुकला की दृष्टि से भी बेहद नायाब है। इसका विशाल गुंबद काले पत्थरों से निर्मित है। मकबरे का प्रवेश द्वार पश्चिम दिशा की तरफ है। बाकी तीनों ओर जालिकावत बंद द्वार निर्मित है। प्रवेशद्वार एवं शेष तीन बंद द्वार लाल पत्थरों से निर्मित है। मकबरे के छज्जे पदम संरचना युक्त ठोड़ियों पर आधारित है। मकबरे के पास टूटी हुई मस्जिद और बावड़ी निर्मित है।






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