उज्जैन का उपेक्षित पर्यटन स्थल - रूमी का मकबरा
महाकाल की नगरी उज्जैन पुरे विश्व में धार्मिक नगरी के रूप में विश्वप्रसिद्ध है। उज्जैन के बीचों बीच में स्थित भगवान महाकाल का ऐतिहासिक मंदिर। हजारों साल पुराना यह मंदिर भारत के 12 ज्योर्तिलिंग में से एक है। इसके अतिरिक्त उज्जैन में अनेक धार्मिक स्थल है जिनका भी अपना महत्व है।
भैरूबाबा, मंगलनाथ मंदिर, देवी मां का शक्तिपीठ, विक्रमादित्य टीला आदि प्रमुख है। देश विदेश से हजारों श्रद्धालु उज्जैन में आकर इन धार्मिक स्थानों के दर्शन कर पूण्य लाभ अर्जित करते है।उज्जैन में धार्मिक स्थलों के अलावा कुछ प्रमुख पर्यटन स्थल भी है जहां पर पर्यटकों का आना जाना लगा रहता है। इन पर्यटन स्थलों में जंतर मंतर, क्षिप्रा का तट, म्युजियम आदि है।इन सभी धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों के बीच उज्जैन के एक कोने में स्थित रूमी का मकबरा आज भी अपनी पहचान के लिये मोहताज है।
जंगल झाड़ियों से घिरे एवं एक उंचे से टीले पर स्थित यह ऐतिहासिक ईमारत भर्तहरि गुफा के कुछ दुरी पर ही बनी हुई है।हैरानी की बात तो यह है कि दिन भर श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लाने जाने वाले, आटो वाले भी इस प्राचीन मकबरे से अधिक परिचित नहीं है।
मुख्य सड़क से कुछ दुरी पर , एक उंचे टीले पर यह मकबरा बना हुआ है। यहां तक जाने के लिये ना ही कोई मार्ग है और ना ही कोई दिशासूचक है। आसपास बने कुछ घरों से होते हुए, टीले की चढ़ाई कर मकबरे तक पहुंचा जा सकता है।पठारी टीले पर हरे भरे खेतों के बीच यह ऐतिहासिक मकबरा एकदम सा उपेक्षित है। नगर निगम वालों ने चारों तरफ चारदीवारी बनाकर इसे कुछ संरक्षित करने की कोशिश की है।
मौलाना रूमी का यह मकबरा एक उंचे प्लेटफार्म पर स्थापित है। मकबरा षटकोणीय है। मकबरे के निर्माण शैली में बंगाल स्थापत्य शैली का प्रभाव स्पष्ट रूप से झलकता है।मौलाना रूमी एक तुर्की सौदागर था। यह ऐतिहासिक ईमारत लगभग पांच सौ साल पुरानी है। किन्तु आज भी उपेक्षित एवं पर्यटकों की नजरों से ओझल है।




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