Monday, 11 March 2019

अनजाने इतिहास का साक्षी है .. हेलियोडोरस का स्तंभ

अनजाने इतिहास का साक्षी है .. हेलियोडोरस का स्तंभ.....!

सांची के पास ही बेसनगर में स्थित हेलियोडोरस के स्तंभ का महत्व भी उतना ही है जितना सांची के स्तूपों का, किन्तु पर्यटकों में इस स्तंभ को देखने में इतनी दिलचस्पी नहीं दिखाई देती है। यह स्तंभ भारत के उस वैभवशाली युग का मूक साक्षी रहा है, जिस युग में भारत के साथ साथ विदेशों में भी भागवत धर्म की ध्वज पताका लहराती थी। इस स्तंभ के आसपास आज भी उस गौरवशाली इतिहास को महसूस किया जा सकता है।



सांची से लगभग 07 किलोमीटर दुरी पर बेसनगर नामक छोटा सा ग्राम है। गांव के पास बहने वाली बेस नदी के कारण ही यह ग्राम भी बेसनगर के नाम से ही जाना जाता है। बेसगनर नाम से किसी बड़े नगर के होने का आभास होता है किन्तु यह एक छोटी सी ग्रामीण बस्ती है। इस बेसनगर में 150 ईसा पूर्व में स्थापित किया गया एक पाषाण स्तंभ आज भी मौजूद है। जिसे यहां के स्थानीय लोग खाम बाबा या खंबा बाबा के नाम से पूजा करते है। इस स्तंभ के पीछे वह इतिहास छिपा पड़ा है जिससे शुंग और यवनों के पारस्परिक संबंधो की अदभूत जानकारी मिलती है, दुर्भाग्य से आज भी उन जानकारियों से आमजन अनभिज्ञ ही है। 


यह स्तंभ वास्तव में एक गरूड़ स्तंभ था जिसे एक युनानी राजदूत ने भगवान वासुदेव के सम्मान में स्थापित किया था। जिस पर ब्राहमी लिपि और प्राकृत भाषा में लेख अंकित है।  भारतीय पुरातत्व विभाग के मुताबिक शुंगवंश के नौंवे शासक भागभद्र के शासन काल में हेलियोडोरस नामक यवन भारत आया था। हेलियोडोरस तक्षशिला के शासन एंटियोकस के राजदूत के रूप में आया था। हेलियोडोरस ने भगवान विष्णु के मंदिरों के सामने इस स्तंभ को गरूड़ स्तंभ के रूप में स्थापित किया था। इस स्तंभ के समीप चैथी सदी ईसा पूर्व विष्णु मंदिरों की पुष्टि यहां हुये उत्खनन में हो चुकी है। 


इस स्तंभ के साथ यहां की कई रोचक मान्यताओं को देशज भाषा में बहुत ही शानदार तरीके से भारतीय पुरातत्व विभाग ने व्यक्त किया है।  जिस पर नजर डालने से मालूम होता है कि  इस खंबे को खाम बाबा कहते है और ज्यादातर धीमर लोग इसे पूजते है। इस पर दो बीजक खुदे हुये है उनसे इनका असली हाल मालूम होता है। यह बीजक ब्राही हरफों में  है और उनकी बोली प्राकृत है। 

एक बीजक से मालूम होता है कि यह खंभा गरूड़ ध्वज है। जिसको भगवान विष्णु के मंदिर के सामने हेलियोदर ने खड़ा किया था। हेलिओदर तक्षशिला का रहने वाला ग्रीक था।। वह पंजाब के आंतलिकित नाम के ग्रीक राजा की तरफ से मध्य देश के भागभद्र राजा के पास वकील था और उसने भागवत धर्म को स्वीकार कर लिया था। यह खंभा दो हजार साल से भी ज्यादा पुराना है अर्थात हजरत ईसा से भी 150 साल पहिले बना है। 


इस स्तंभ के सबसे पहले अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1877 ई में अपने लेखों के माध्यम से प्रकाश में लाया था। यह स्तंभ स्थानीय तौर पर खाम बाबा के नाम से ही जाना जाता है। इस स्तंभ पर लिखे लेख के अनुसार हेलियोडोरस भागवत धर्म से अत्यधिक प्रभावित था। इस स्तंभ पर उत्कीर्ण लेखों की जानकारी भारतीय पुरातत्व विभाग ने बहुत ही विस्तार से दी है। स्तंभ पर अंकित लेख दो भागों में है। इन लेखों पर संस्कृत और प्राकृत भाषा का प्रभाव दिखलाई पड़ता है। लेख ब्राहमी लिपि में खुदा हुआ है। यह लेख कुछ इस प्रकार है:-
पहला भाग

देवादेवासा वा(सुदे)वसा  गरूड़ध्वजो अयम
करितो ई (आ) हेलिटोडोरेना भागा
वटेना दियासा पुतरेना तखासिलाकेना
योनादातेना अगातेना  महाराजासा
अमतालिकितेसा उप(मा) ता  सामाकसम रानो
कासीपूतासा  (भा)गभद्रासा तरातारासा
वासेना (चातू)दासेना राजेना वधमानासा

दुसरा भाग
तिरीनी अमूतपदानी (सू) अनुतिथानी
नयामति स्वागा दामो चागो अपरामदो

इन लेखों से भारत के अनजाने इतिहास की नयी जानकारियां प्राप्त होती है। यह लेख भारत के प्राचीन भागवत धर्म से संबंधित पहला महत्वपूर्ण लेख है। यह लेख दर्शाता है कि ईसा से दुसरी सदी पूर्व में पुरे दक्षिण एशिया में भागवत धर्म ग्रीक लोगों में काफी लोकप्रिय था। 

हेलियोडोरस ने भी भागवत धर्म स्वीकार कर लिया था ऐसा अनुमान इन लेखों से होता है। हेलियोडोरस जिस यवन राजा के राजदूत था उसका राज्य काफी विस्तृत था जो कि प्राचीन बैक्ट्रिया साम्राज्य का भाग था जिसकी स्थापना सिकंदर ने की थी। यह लेख भारत और ग्रीकों के आपसी संबंधो का भी गवाह है। 


हेलियोडोरस का यह स्तंभ और उसमें अंकित लेख भारत के उस प्राचीन इतिहास का साक्षी है जिस काल में भारत विश्वगुरू था। यहां प्रचलित मान्यताओं को पुरा विश्व मानता था। उसे सम्मान और आदर देता था। 

आलेख - ओम सोनी दंतेवाड़ा

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