अनमोल धरोहर है बाघ गुफाओं के प्राचीन चित्र......!
प्राकृतिक सौंदर्य एवं मनमोहक दृश्यों से परिपूर्ण परिवेश में स्थित बाघ की गुफायें अपनी अनोखी भित्ती चित्रकला के लिये पुरे विश्व में प्रसिद्ध है। धार से 90 किलोमीटर बाघ नामक ग्राम में स्थित ये गुफाये बौ़द्ध धर्म को समर्पित है। पंद्रह सौ साल पहले चटटानों को काटकर बनाई गई ये गुफायें तत्कालीन स्थापत्यकला की संुदर उदाहरण है। ये गुफायें स्थापत्यकला की दृष्टि में भले ही साधारण हो सकती है परन्तु अपने प्राचीन चित्रों के कारण पुरे भारत में विशिष्ट स्थान रखती है। इन गुफाओं में बने चित्रों की तुलना अजंता एलोरा की गुफाओं में बने चित्रों से की जाती है। बाघ के अद्वितीय सौंदर्य और भगवान बुद्ध के दिव्य संदेशों का अदभुत समन्वय यहां के चित्रों में दिखलाई पड़ता है।
प्रागऐतिहासिक काल से प्रारंभ हो चुकी चित्रकारी बाघ के चित्रों में उन मानवीय अनुभूतियों को परिलक्षित करती है जिसमें प्राकृतिक दृश्यावली और धार्मिक विचारों का अनोखा मेल है। बुद्ध के जीवनकाल से जुड़ी घटनाओं की झलक बाघ के इन चित्रों में देखने को मिलती है। बौद्ध कथानकों, बौधिसत्व, राजदरबार, की पवित्रता एवं शुद्धता इन चित्रों में महसूस की जा सकती हैं। यहां के असीमित प्राकृतिक सौंदर्य का विराट चित्रण भी इन गुफाओं में देखने को मिलता है। नदी पहाड़ भू दृश्यावली के चित्रों में प्राकृतिक सौंदर्य के रस का वेगपूर्ण प्रवाह को चित्रित करने की कुशलता भी बेहद प्रशंसनीय है।
प्रागऐतिहासिक काल से प्रारंभ हो चुकी चित्रकारी बाघ के चित्रों में उन मानवीय अनुभूतियों को परिलक्षित करती है जिसमें प्राकृतिक दृश्यावली और धार्मिक विचारों का अनोखा मेल है। बुद्ध के जीवनकाल से जुड़ी घटनाओं की झलक बाघ के इन चित्रों में देखने को मिलती है। बौद्ध कथानकों, बौधिसत्व, राजदरबार, की पवित्रता एवं शुद्धता इन चित्रों में महसूस की जा सकती हैं। यहां के असीमित प्राकृतिक सौंदर्य का विराट चित्रण भी इन गुफाओं में देखने को मिलता है। नदी पहाड़ भू दृश्यावली के चित्रों में प्राकृतिक सौंदर्य के रस का वेगपूर्ण प्रवाह को चित्रित करने की कुशलता भी बेहद प्रशंसनीय है।
इन चित्रों के पीछे का आधुनिक इतिहास भी काफी रोचक है। कर्नल सी0 ई0 ल्यूवर्ड ने 1907-08 में इन चित्रों को पुनः प्रकाश में लाया। 1920 में मुकूल डे ने इन चित्रों के स्केच तैयार किये वहीं 1921 के समय में नंदलाल बोस, ए0के0 हालदार जैसे प्रतिष्ठित चित्रकारों ने बाघ की इन चित्रों की अनुकृतियां तैयार की थी। बाद में जगताप, आप्टे,भोंसले जैसे कलाकारों के दलों ने भी यहां के चित्रों की प्रतिलिपियां तैयार की। धुयें एवं गुफा में नमी के कारण ये चित्र खराब हो रहे थे। 1982 इन चित्रों को वहां से सावधानी पूर्वक हटाकर संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया। इन चित्रों की मौलिकता बचाये रखने के लिये रासायनिक लेप का भी प्रयोग किया गया। बाघ के संग्रहालय में रखे ये पुराने चित्र आज भी कलाप्रेमियों एवं दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।
पंद्रह सौ साल बीतने के बाद भी ये चित्र एकदम नवीन और जीवंत लगते है। इन्हे चित्रित करने की कला और अमिट रंगों के पीछे की तकनीक जानने की लालसा यहां आने वाले हर कलाप्रेमी को होती है। पुरातत्व विभाग हमारी इस जिज्ञासा को काफी हद तक अपने इन जानकारियों से दुर कर देता है। बाघ गुफाओं की चित्रकारी, टेम्परा तकनीक से की गई है। इसके लिये दीवारों एवं छतों पर लाल भूरे रंग की बजरी, मिटटी एवं मिटटी के गारे का मोटा पलस्तर लगाकार आधार बनाया गया है। यदयपि मिटटी का पलस्तर मोटाई में एक समान नहीं है। फिर भी यह चटटान की खुरदरी सतह को चिकना बनाता है। पलस्तर के उपर चूने की एक परत चढ़ी है जिसके उपर चित्रकारी की गई है।
मार्शल महोदय चित्रकारी की तकनीक का विश्लेषण करते हुये लिखते है कि अजंता की तरह ही बाघ में चित्रकारी टेम्परा में की गई है न कि उस तकनीक जैसा अक्सर कहा जाता है कि ये फेस्को है। दोनो ही स्थानों पर रंग एवं प्रयोग में लाई गई पद्धति एक जैसी दृष्टिगोचर होती है। यदयपि बाघ में पहली मोटी परत बनाने में कम सावधानी बरती गई है। अजंता में यह परत स्थानीय लोह अयस्क युक्त मिटटी में कंकर, चूना, पटसन, एवं सन के रेशे मिलाकर बनाई गई है। बाघ में कार्य कुछ लापरवाहीपूर्वक किया गया है एवं इसी के परिणामस्वरूप इसका प्रथम स्तर अजंता की अपेक्षाकृत कम सुदृढ़ है।
इन चित्रों में उपयोग किये गये अधिकांश रंग द्रव्य मिटी या खनिज मूल के है। मात्र काले रंग को छोड़कर जिसे काजल के नाम से जाना जाता है। इनकी स्थानीय उपलब्धता थी। इसके अतिरिक्त बाघ में लाल लाख के उपयोग का भी विवरण मिलता हैं। गेरूआ लाल लाल रंग के लिये, गेरूआ पीला पीले रंग के लिये, पेड़ों के हरा रंग हरे रंग के लिये, लाजवर्द या लेपिस लेजुली नीले रंग के लिये एवं चूना सफेद रंग के लिये उपयोग किया गया। रंगों को घोलने एवं लगाने के लिये गोंद का उपयोग किया गया है।
संग्रहालय में सुरक्षित इन चित्रो में धार्मिकता के बजाय भौतिकवाद अधिक परिलक्षित होता है। पेड़ पौधों पशु पक्षियों एवं बौद्ध कथानकों के दृश्यों की अदभुत चित्रकारी को देखने के बाद हर कोई मंत्रमुग्ध हो जाता है। बौद्ध कथानकों के दृश्य तो एकदम से जीवंत लगते हैं। राजदरबार के दृश्यों को देखने से लगता है कि अभी सभासदों की कोई गरमागरम बहस चल रही हो। बोधिसत्व पदमपाणि के चित्र तो हमसे संवाद करते हुये नजर आते है।
पशु पक्षियों के चित्र
पशु पक्षियों के चित्रों में पुष्प युक्त पौधों के साथ हंस का चित्रण का काफी प्रभावी लग रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि हंस उसे पौधे पर खिले सफेद पुष्प की सुंदरता से मोहित हो गया है। एक अन्य चित्र में दो गायों , पक्षियों एवं पौधों को दर्शाया गया है। गाय के गले में बंधी घंटी से आभास होता है कि ततकालीन समय में गाय का धार्मिक महत्व रहा होगा। गौ पालन पूण्य का कार्य समझा जाता था।
फूलों की बनावट भी काफी आकर्षक है। इन गुफाओं के आसपास खिलने वाले रंग बिरंगे संुदर फूलो ही चित्रण इन चित्रों में देखने को मिलता है। केवड़ा और कमल फूल की जुगलबंदी भी काफी रोचक और आश्चर्यजनक है। ज्यामितीय आकृतियों के साथ इठलाते हुये हंस का चित्रण भी काफी प्रभावोत्पादक है।
विदुर पंडित जातक -
बौद्ध कथानकों में विदुर पंडित जातक के चित्र का अंकन भी किया गया हैं। जिसके पीछे एक रोचक कथा हैं। वाराणसी के चार ब्राहमण थे जिन्होने सन्यास लिया था। उन्होने अपनी अभिलाषा एवं अच्छे कर्मो के फलस्वरूप अगले जन्म में देवताओं के राजा शक, नागों के राजा नागराज, सुपर्ण के राजा एवं कुरूओं के राजा के रूप में जन्म लिया था। संयोगवश वे चारों एक सुंदर बगीचे में मिले और एक विवाद में उलझ बैठे कि चारो में श्रेष्ठ कौन है। जब वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे तब उन्होने कुरूओं के राजा के मंत्री विदुरपंडित की मदद ली। मंत्री ने अपने विवेकपूर्ण व्याख्या से उन सभी के सदकर्मो की सराहना की। फलक के दायीं ओर से बैठा हुआ दुसरा व्यक्ति जो श्रृंगार रहित है वो मंत्री विदुर पंडित है। विदुर पंडित के बांयी ओर कुरूओं के राजा धनंजय है। विदुर पंडित के सामने देवताओं के राजा शक एवं शक के पीछे नागराज है। नागराज के सामने बच्चे की आकृति राजा सुपर्ण की है।
बुद्ध का चमत्कार -
एक बार कालदुयी भिक्षु के आग्रह पर बुद्ध कपिलवस्तु भ्रमण हेतु सहमत हो गये। तदनुसार वह अपने बीस हजार अनुयायियों के साथ कपिलवस्तु आये। शाक्यो ने उनका सम्मानपूर्वक स्वागत किया। किन्तु वरिष्ठ शाक्य इस संशय में थे कि बुद्ध उनके पुत्र या भतीजे के समान हैं। इसलिये उनके सम्मान की आवश्यकता नहीं है। जब बुद्ध को इस बात का पता चला तब उन्होने वरिष्ठ शाक्यों को अपने बोधित्व ज्ञान से परिचय कराने के लिये उनके समक्ष एक चमत्कार करने का निर्णय लिया। तब वह आकाश की ओर उठे और अपने चरणों की धुल उनके सिर पर बिखेर दी। राजा शुद्धोधन और अन्य शाक्य उनके इस चमत्कार को देख बेहद प्रसन्न हुये और उनका सम्मानपूर्वक अभिवादन किया। फलक के मध्य में मुख्य चित्र वरद मुद्रा में बुद्ध का है जिनके चारों ओर पांच भिक्षु है।
महावस्तु अवदान की मालिनी वस्तु -
बनारस के राजकुमारी मालिनी तिष्य, कश्यप एवं भारद्वाज बौद्ध भिक्षुओ के प्रति समर्पित थी। बुद्ध एवं बौद्ध धर्म के प्रति अपनी भक्ति एवं विश्वास के कारण वह ब्राहमणों की आंखो में खटकने लगी है। तत्पश्चात उसे रास्ते से हटाने के लिये ब्राहमणों ने एक योजना तैयार की। राजा को अंतिम चेतावनी दी कि वह मालिनी अथवा ब्राहमणों में से किसी एक को चुने। तब राजा ने अनिच्छा से मालिनी को त्यागने का निर्णय लिया। हृदय विदारक समाचार सुनकर एक स्त्री जो कि मुंह ढके हुये है चित्रित फलक की दाहिनी ओर अंतपुर से निकलकर राजकुमारी मालिनी को अनपेक्षित समाचार सुनाने आयी है।
चित्रकारी के क्षय होने के कारण पर पुरातत्व विभाग प्रकाश डालते हुये कहता है कि गुफा क्षेत्र में अवसादी चटटानों के अनुक्रम में बलुआ पत्थरों एवं स्लेटी पत्थरों की प्रमुखता है। इसके अंचल में दरिया का बहता पानी एवं चटटानों के मध्य बड़ी दरारों के माध्यम से बरसात का पानी गुफाओं में रिसता है। बारी बारी से नम एवं शुष्क परिस्थितियों ने स्लेटी पत्थर को बुरी तरह से प्रभावित किया है इसके परिणामस्वरूप स्लेटी पत्थर और मिटटी की सम्बद्धता समाप्त हो रही है। ये दोनो विषम परिस्थितियां चित्रों के नष्ट होने के लिये जिम्मेदार है। इसके अतिरिक्त चटटानों के अत्यंत कमजोर गुणवत्ता वाली भौतिक संरचना, चित्रों पर धुयें एवं गर्म गैसों का प्रभाव, वर्षा के पानी का रिसाव , चमगादड़ों एवं किटाणुओं से नुकसान जैसे प्रमुख कारणों से भी चित्र खराब हुये है।
OM SONI DANTEWADA
















सुंदर फोटो और जानकारी! बहुत खूब
ReplyDeleteशुक्रिया सर
Deleteबहुत बहुत आभार सर
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