Sunday, 31 December 2023

स्थापत्य और प्राकृतिक सौंदर्य का मिलन स्थल - किराड़ू

स्थापत्य और प्राकृतिक सौंदर्य का मिलन स्थल - किराड़ू

दसवी सदी में मालवा में परमारों की सत्ता अपने चरम पर थी। परमार सम्राट वाकपति मूंज ने अपने बाहूबल से परमारों की सत्ता कई राज्यों में स्थापित की। नये विजित राज्यों में परमार राजकुमारों को अधिपति बनाकर शासन स्थापित किया। वाकपति मूंज ने अपने अनुज सिंधुराज के पुत्र दुसल को मरूमंडल के भीनमाल का प्रशासन सौंपा जिसके आधिपत्य का विस्तार पश्चिम में बाड़मेर तक था। वर्तमान राजस्थान के बाड़मेर जिले के किराड़ू में आज भी परमार राजाओं के बनाये भव्य देवालय एवं अभिलेख प्राप्त होते है। 

किराड़ू के मंदिर पूरे भारत में पूर्व मध्यकाल की स्थापत्य एवं मूर्तिकला के कारण महत्वपूर्ण स्थान रखते है। मोतियों की माला की तरह सुशोभित पर्वतमालाओं से घिरा किराड़ू एक खूबसूरत ऐतिहासिक स्थल है। पहाड़ों की तराई में स्थापित देवालयों के कारण यह क्षेत्र ऐतिहासिक एवं प्राकृतिक खूबसूरती का अनूठा संगम स्थल है। 

इन मंदिरों की कलाकृतियां अपने अतीत की कहानियां कहती नजर आती है। प्राचीन मान्यताओ के अनुसार यहां पर परमारों के द्वारा कुल 24 मंदिरों का निर्माण कराया गया था किन्तु आज सिर्फ पांच मंदिर ही शेष है। गुर्जर मारू शैली में निर्मित ये देवालय चालुक्य स्थापत्य कला के सर्वोत्तम उदाहरण है। मारू गुर्जर शैली मरूदेश और गुजरात में प्रचलित शैलियों का सम्मिश्रण है। इन मंदिरों का निर्माण ग्यारहवी बारहवी सदी में निर्मित माना गया है। 

किराड़ू के इन पांच मंदिरो में चार शैव तथा एक वैष्णव धर्म से संबंधित है। इन मंदिरो में दो मुख्य मंदिर मंडप अंतराल और गर्भगृह योजना में निर्मित है। जिनमें से सुरक्षित मंदिर सोमेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है। वहीं दुसरा मंदिर विष्णु मंदिर है जिसका सिर्फ गोलाकार मंडप ही सुरक्षित है। अन्य तीन छोटे शिव मंदिरों में सिर्फ गर्भगृह ही मात्र शेष है। 

किराड़ू मंदिर समूह में सोमेश्वर मंदिर वर्तमान मे लगभग सुरक्षित अवस्था में है। इस मंदिर की वास्तुकला दर्शनीय है। यह मंदिर उंची जगती पर स्थापित है। मंदिर की वास्तुयोजना में गोलाकार सभामंडप, अंतराल एवं गर्भगृह का समावेश है। सभामंडप अंदर अलंकृत स्तंभों की गोलाकार श्रृंखला है। इन स्तंभों पर बनाई गई कलाकृतियों के देखकर आभास होता है कि पूर्व मध्यकाल में भारतीय शिल्पकला की अपने चरम पर थी।

पत्थरों पर इतनी बारीक खुदाई कर विभिन्न मूर्तियां एवं ज्यामिती आकृतियां बनाई गई कि दांतो तले उंगलियां दबा ली जाये। यह ऐसा कि प्रतीत होता है कि स्वर्णकार जैसे सोने के सुंदर आभूषणों पर नक्काशी करता है वैसे ही शिल्पियों ने भी पत्थरों पर स्वर्णकार की तरह नक्काशी कर अपनी कला की कुशलता का परिचय दिया हो। 

गर्भगृह का प्रवेश द्वार सर्वाधिक अलंकृत है। देवी देवताओं की छोटी छोटी प्रतिमाओं से सुशोभित द्वार मंदिर का मुख्य आकर्षण है। यह कारीगरों की कुशलता के परिणाम है आज भले ही उनके नाम भूला दिये गये है किन्तु पत्थरों पर किये उनके हस्ताक्षर और उनकी यह कला सदा के लिये उन्हे अमर कर गई।किराड़ू मंदिर समूहों के सारे मंदिरों के शिखर श्रृंग एवं उरूश्रृंगों से सुसज्जित किये गये है जो कि गुर्जर शैली को प्रदर्शित करती है। 

किराडू मंदिर समूह देवप्रतिमाओं के किसी विशाल संग्रहालय समान है। इन मंदिरों के गर्भगृह आज भले ही प्रतिमाविहिन है किन्तु बाहरी दीवारों सैकड़ों प्रतिमाओं से सुसज्जित है। यहां की प्रतिमायें आकार में छोटी, सौम्य, जीवंत एवं आध्यात्मिक भावों को लिये हुए प्रदर्शित है। मूर्तियां विभिन्न आभूषणों एवं वस्त्रों से अलंकृत की गई है जिससे इनके प्रति आकर्षण एवं अनुराग उत्पन्न होता है। प्रतिमायें इतनी सजीव बनाई गई है कि लगता है कि बस अब बोल उठेगी। शिल्प और सौंदर्य का समागम ही किराड़ू की आज विशेषता बन गई है। 

किराड़ू के मंदिरों में शिव विष्णु ब्रम्हा, हरिहर, गणेश, कुबेर, सूर्य, महिषासुरमर्दिनी, अष्ट दिकपाल, अप्सरायें, धार्मिक एवं तत्कालीन सामाजिक जीवन का अंकन किया गया है। धार्मिक कथाओं में रामायण महाभारत एवं कृष्णलीलाओं का अंकन किया गया है। कृष्ण लीला में वृषभासुर वध, केशी वध, पूतना वध, गोवर्धनधारण आदि दृश्यों का अंकन है। रामायण दिग्दर्शन में सप्त साल भेदन, सुग्रीव संभाषण, सुग्रीव बाली युद्ध, सेतु निर्माण, राम रावण युद्ध, लक्ष्मण का मूर्च्छित होना, लक्ष्मण का उपचार आदि दृश्य सज्जित है। महाभारत में शर शैया पर भीष्म का सुंदर अंकन है। 

समाजिक जनजीवन में अपसराओं का नृत्य, वादक दल, शैव साधू, कुम्हार द्वारा मटके बनाना, सुरापान करते युवक, गायों का चारा खिलाना, जानवरों का शिकार, युद्ध-आक्रमण, एवं मैथुन दृश्यों को भी स्थान दिया गया है। मैथून प्रतिमाओं के कारण किराड़ू बाडमेर का खजुराहो कहलाता है। 

इन मंदिरों में परमारों एवं चौहान सामंतो के अभिलेख भी जड़े हुए है। ये अभिलेख परमारों के इतिहास और गुजरात के चालुक्यों के साथ उनके संबंधों के बारे मे जानकारी देते है। सबसे पहला अभिलेख सन 1153 ई में चौहान सामंत अल्हणदेव का है। इस अभिलेख में चालुक्य शासक कुमारपाल का उल्लेख है। किराड़ू तत्कालीन समय में चालुक्य कुमारपाल के अधीनस्थ था। इसी अभिलेख में किराड़ू के प्राचीन नाम किरातकुप का लेख है। 

दूसरा अभिलेख 1161 ई में परमार सामंत सोमेश्वर देव का है। किराड़ू परमारों का शासन क्षेत्र था किन्तु चालुक्य कुमारपाल के अधीनस्थ होने के कारण परमार मांडलिक के तौर पर ही शासन संभालने लग गये थे। सोमेश्वर परमार ने अपने स्वामीभक्ति का परिचय देते हुए कुमारपाल से पुनः अपने राज्य को प्राप्त कर लिया था। मांडलिक सोमेश्वर के अभिलेख में परमारों की वंशावली उल्लेखित है जिसमें इनके आदिपुरूष सिन्धुराज से लेकर दूसल, देवराज धंधूक एवं उसके पितामह सोछराज एवं पिता उदयराज का उल्लेख है। 

इस अभिलेख के अनुसार सोमेश्वर देव ने किराड़ू के सोमेश्वर मंदिर का प्राण प्रतिष्ठा चालुक्य कुमारपाल से करवा कर किरातकूप और शिवकुप में चिरकाल तक क्षात्रधर्म का पालन किया था। इस मंदिर का तीसरा अभिलेख सन 1178 ई में सामंत मदन ब्रहादेव का है जिसमें उसके मंत्री तेजपाल की पत्नी अनुपमा देवी द्वारा तुरूष्को द्वारा भग्न इस मंदिर में पुनः शिव की प्रतिमा स्थापित करने का उल्लेख है।(संदर्भ परमार राजवंश का इतिहास - डी0सी0 गांगुली )

किराड़ू के मंदिर से आज भी कई रहस्य जुड़े है। परमारों की इस समृद्ध नगरी के उजाड़ होने के पीछे एक साधू का श्राप भी उत्तरदायी माना गया है। वैसे इन मंदिरों को मोहम्मद गौरी और उसकी सेना ने नष्ट किया था जिसके संकेत 1178 के किराडू अभिलेख में ही मिलता है। किराड़ू के ये शानदार मंदिर राजस्थान के बाडमेर जिले में अवस्थित है। बाड़मेर शहर से 40 किलोमीटर की दुरी पर हाथमा गांव के पास ही किराड़ू में पहाड़ियों के मनभावन दृश्यों से सज्जित परिवेश ये मंदिर अवस्थित है। मरू गुर्जर शैली के इन मंदिरों में शिल्प स्थापत्य के उन्नत आयाम शोधार्थियां एवं पर्यटकों के लिये किसी कौतुहल से कम नहीं है।

ओमप्रकाश सोनी

असिस्टेंट प्रोफेसर सुकमा 



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