शिव मंदिर देव बलोदा ....!
देव बलोदा का यह महादेव मंदिर मूर्तिशिल्प के मामले में बेहद ही समृद्ध है। मंदिर के बाहरी दिवारों एवं मंडप के स्तंभों पर देवी-देवताओं की कलात्मक प्रतिमायें अंकित है। मंदिर के निचले थरों पर तदयुगीन समाज की झलकियों को शिल्पकार ने अपने छैनी हथोड़े से जीवंत कर दिया है।
किसी भयानक युद्ध का चित्रण इतने प्रभावी ढंग से उन प्रतिमाओं में देखने को मिलता है जिसके लिये शिल्पी बधाई का पात्र है। शिकार के दृश्यों में शिकारी और शिकार के भावों को बहुत ही बढ़िया ढंग से प्रदर्शित किया गया है। युद्ध के दौरान हाथियों की भाव भंगिमा, उनकी चेष्टाओं को आंखो देखा वर्णन शिल्पकार ने मंदिर की दिवारों पर उकेरा है।
युद्ध के दृश्य और हाथियों का उत्पात:-
इस मंदिर के निचले थरों पर अंकित हाथी और मानव द्वंद की प्रतिमायें किसी भी पर्यटक या शोधार्थी के लिये कौतुहल का विषय हो सकती है। इन प्रतिमाओं के अवलोकन से एक बात समझ आयी कि शिल्पकार किसी भयानक युद्ध का या तो साक्षी रहा है या उसने पूर्व में हुये किसी युद्ध की बाते जान रखी थी। हाथियों द्वारा मचाये गये उत्पात को भी शिल्पकार ने बखूबी प्रदर्शित किया है।
सुक्ष्मावलोकन के दौरान एक प्रतिमा ने मेरे अनुमान को मजबूती प्रदान की। रथ पर सवार दो राजा आमने-सामने एक दुसरे पर तीरों की बौछार कर रहे है। दोनो के रथों पर अंकित राजचिन्ह ने मेरा ध्यान खींचा। एक राजा का राजचिन्ह हनुमान है तथा दुसरे का राज चिन्ह सर्प अंकित है। सर्प राजचिन्ह को देखने से अनुमान होता है कि यह राज चिन्ह निश्चित तौर पर किसी नागवंशी राजा से ही संबंधित है।
दसवी सदी से लेकर चैदहवी सदी तक बस्तर, कवर्धा और बालोद क्षेत्रों पर नागवंशी शासको का शासन था। शिल्पकार ने उस समय स्थानीय राजा पर किसी नागवंशी राजा के आक्रमण का उल्लेख किया है। बस्तर में ग्यारहवी सदी में राजभूषण सोमेश्वर देव नामक छिंदक नागवंशी राजा का एकछत्र शासन स्थापित था। सोमेश्वर देव के कुरूषपाल अभिलेखो से कल्चुरी राजाओं पर विजय प्राप्त कर कौसल के छः लाख ग्रामों का स्वामी होने की जानकारी प्राप्त होती है।
सोमेश्वर देव के पास विशाल हस्ती सेना थी। बस्तर के हाथ्यिों से जुड़ी जानकारी चोल शासको, कल्याणी के चालुक्य राजाओं के इतिहास संबंधी विवरणों से प्राप्त होती है। निश्चित तौर पर सोमेश्वर देव ने विशाल हस्ती सेना लेकर कौसल क्षेत्र के किसी राजा पर आक्रमण किया होगा ऐसा अनुमान देवबलोदा की इन प्रतिमाओं से प्राप्त होती है। हाथियों ने तो स्थानीय राजा की सेना में काफी उत्पात मचाया था। हाथी और सैनिक संघर्ष की ये प्रतिमायें कुछ यही कहानी बयां करती है।
किसी सैनिक के पीछे हाथी दौड़ रहा है तो किसी हाथी को कोई सैनिक खदेड़ रहा है। किसी सैनिक के जंघा को पकड़ कर हाथी ने उसे पटक दिया है तो कहीं दो दो हाथी मिलकर पेड़ को उखाड़ रहे है। हाथी भी प्रशिक्षित एवं सुसज्जित है। लकड़ी के बड़े लटठ को लेकर हाथी युद्ध मैदान में ताल ठोंक रहे है।
कहीं कहीं कतारबद्ध हाथी आगे बढ़ रहे तो कहीं कहीं दो हाथी का एक मुख प्रदर्शित है। इस मंदिर के तीन भित्तियों पर हाथी और बैल के दृश्य को अनोखे ढंग से प्रदर्शित है। हाथी और बैल दोनो आमने सामने खड़े है। दोनो को मुख एक ही है। एक तरफ से देखे तो वह हाथी का मुख नजर आता है तो दुसरी तरफ से वह बैल का मुख नजर आता है। हाथी और वृषभ का संयुक्त मूख बनाकर शिल्पकार ने उस समय शैव और वैष्णव संप्रदाय के मिलन के गज-नदंी प्रतीक को प्रस्तुत किया है।
शिकार के दृश्य:-
तदयुगीन समाज में प्रचलित शिकार के दृश्यों को शिल्पकार ने मंदिर की दिवारों पर स्थान दिया है। शिकारी भाले लेकर जंगली सुकर एवं हिरणों का शिकार कर है। शिकार में शिकारी के साथ-साथ उसका पालतू कुत्ता भी मदद करते हुये दिखाई पड़ रहा है। निश्चित तौर पर इस क्षेत्र में घना जंगल रहा होगा और यहां पर जंगली सुकर एवं हिरणों का शिकार किया जाता था। शिकार के ये दृश्य आज वनांचल क्षेत्रों में प्रचलित है जिसमें वफादार कुत्ता भी शामिल रहता है।
अगले पोस्ट में हम इस मंदिर पर जड़ी भगवान की प्रतिमाओं, मैथुन प्रतिमायें एवं अन्य सामाजिक दृश्यों की चर्चा करेंगे।
an English word, please?
ReplyDeletenot an elephant area I guess. They don't seem to know exactly how one looks.
ReplyDeleteYes it was not an elephant area. Naga King Someswar deo of Bastar Attacked on kalchuri king with his elephant army. Elephant destroyed enemy kalchuri's army in era of 11th century
DeleteThanks for explaining about the elephants, Om.
ReplyDelete