प्राचीन कालीन मंडपदुर्ग - मांडू.....!
मांडू मध्यप्रदेश के मालवा अंचल का सुप्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। पुरातात्त्विक एवं प्राकृतिक सौन्दर्य का अनूठा संगम मांडू मे देखने को मिलता है। शायद यही कारण है यहां के स्मारको को देखने का मोह देश भर के पर्यटको को यहां खींच ले आता है। माँडू के हसीन वादियो मे, यहाँ के गौरव शाली प्राचीन इतिहास की महक अभी भी मौजूद है।
प्राचीन अभिलेखों में मांडू , मंडप दुर्ग के नाम से ही उल्लेखित है। तत सम्बन्धित सबसे प्राचीन अभिलेख विक्रम संवत 612 ईस्वी सन 555 का प्रतिमा लेख संस्कृत में प्राप्त होता है। यह लेख आदिनाथ भगवान की प्रतिमा के नीचे हिस्से में अंकित है। उक्त प्रतिमा धार जिले में कुक्सी के पास तालनपुर ग्राम से प्राप्त हुई है। प्रतिमा लेख मे चन्द्रसिम्हा व्यापारी द्वारा मंडप दुर्ग के तारापुर ग्राम के पार्श्वनाथ मन्दिर मे आदिनाथ की प्रतिमा स्थापित करवाई गयी। इतिहासकारो ने उक्त मंडप दुर्ग की पहचान मांडू से की है।
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| नागबंध शिलालेख |
मंडप दुर्ग आधुनिक मांडव का प्राकृत नाम माना गया है। छठवी सदी के बाद से तीन शताब्दियो तक मांडू से जुड़ी कोई जानकारी प्राप्त नहीं होती हैं। नवी सदी ने मांडू गुर्जर प्रतिहारो द्वारा शासित कनौज राज्य मे एक प्रमुख सामरिक स्थल के रूप मे अस्तित्व मे आया। इससे जुड़ा एक महत्वपूर्ण अभिलेख राजस्थान के प्रताप गढ़ मे प्राप्त हुआ है। गुर्जर प्रतिहार वंश के राजा महेन्द्रपाल के राजत्व काल का यह अभिलेख विक्रम संवत 1003 इस्वी सन 946 का है। उक्त अभिलेख मे यह अंकित है कि राजकुमार माधव उज्जैन का महाराज्यपाल के रूप में पदस्थ थे। इनके सेनापति (बालाधिकृत) श्री शर्मन राज्य के अन्तर्गत मंडपिका के शासन कार्यो एवं अन्य मामलो की देख रेख करते थे। छठवी सदी का मंडप दुर्ग नौवी सदी मे मंडपिका नाम में परिवर्तित हो चुका था।
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| हनुमान |
ग्यारहवी सदी मे मालवा अंचल मे परमार शासको ने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली। प्रारंभ में इनकी राजधानी उज्जैन थी, कालांतर में यह मांडू से 35 किलोमीटर दुर धार स्थानान्तरित कर दी गई। परमार शासको यथा मुंज एवं भोज के राजनीतिक सांस्कृतिक उत्थान में मांडू का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। जहाज महल के पार्श्व का मुंज तालाब मांडू में आज भी परमारो की स्वर्णिम शासन की याद दिलाता है।
जहाज महल के संग्रहालय में रखा हुआ नाग बन्ध अभिलेख भी मांडू के प्राचीन इतिहास की मह्त्वपूर्ण कड़ी है। विक्रम संवत 1125 इस्वी सन 1068 काल के इस अभिलेख मे श्री भटारक देवेंद्र देव का नाम अंकित है जिसे परमार शासक उदयादित्य का सामन्त माना गया है। उदयादित्य के निर्बल उत्तराधिकारियो ने अपनी कमजोर सैन्य व्यवस्था के चलते एवं भौगोलिक रूप से अभेद्य एवं सुरक्षित होने के कारण मांडू को अपना मुख्यालय बनाया।
मांडू में किले के मलबे से एक विस्तृत अभिलेख खोजा गया है।भगवान विष्णु की स्तुति से आरम्भ इस लेख मे बारहवी सदी मे शासनरत मालवा के परमार शासक विन्ध्यवर्मन के युद्ध एवं शान्ति मंत्री बिल्हण का नाम उल्लेखित है।
1210 से 1218 इस्वी के बीच अर्जुनवर्मन के अधीन चाहमान शाल्ल्कशाहन ने मान्डू के लोहानी गुफाओ के पास कुछ मन्दिरो का निर्माण कराया था। अर्जुनवर्मन के शाही दान मे प्रयुक्त शाही मुहर भी प्राप्त हुई है जिस पर मंडप दुर्ग नाम अंकित है।
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| ब्रम्हाजी |
1256 ईस्वी से 1261 इस्वी तक जयवर्मन ने मांडू पर शासन किया। निमाड के गोदुरापुर से इसका एक ताम्रपत्र प्राप्त हुआ है। जयवर्मन का उत्तराधिकारी जयसिम्हा द्वितीय हुए। धार के पास वलीपुर ग्राम के स्मारक लेख मे इसे मंडप दुर्ग का स्वामी बताया गया है।
1269 ईस्वी मे जैत्रसिम्हा नामक चाहमान शासक ने मांडू पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। इसके पश्चात 1283 इस्वी में भोज द्वितीय राज गद्दी पर आसीन हुआ।
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| मांडू का दिलकश नजारा चलती बस से। |
1293 ईस्वी मे मांडू को दिल्ली के सुल्तान जलालुददीन खिलजी के गुस्से का शिकार होना पड़ा और इसके बाद मांडू पर मुस्लिम शासको के आक्रमण प्रारंभ हो गये। अलाउददीन खिलजी के शासन अवधि में मांडू पर दिल्ली सल्तनत की सत्ता स्थापित हो गई।
संदर्भ:- 1. दिल्ली सल्तनत 711 ई से 1526 ई आर्शीवादीलाल श्रीवास्तव
2. मांडू सिटी आफ जाॅय - एस0सी0 पाठक
3. मोनूमेन्टस आफ मांडू - ए0पी0 सिंह
4 याजदानी - द इनस्क्रिप्शन आफ धार एंड मांडू
5 मांडू आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया - डी आर पाटिल
2. मांडू सिटी आफ जाॅय - एस0सी0 पाठक
3. मोनूमेन्टस आफ मांडू - ए0पी0 सिंह
4 याजदानी - द इनस्क्रिप्शन आफ धार एंड मांडू
5 मांडू आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया - डी आर पाटिल
लेख - ओम सोनी दंतेवाड़ा।





Good information. Thanks.
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