Wednesday, 11 June 2025

गुजरात का अद्वितीय गोप सूर्य मंदिर

पूर्वकाल में गुजरात ऐसा क्षेत्र रहा जहां अरब आक्रमणकारियों ने धार्मिक स्थलों को सर्वाधिक क्षति पहुंचाई। गुजरात के सभी धार्मिक स्थल आर्थिक रूप से समृद्ध रहे और पूरे भारत के धार्मिक आस्था के केंद्र रहे। आर्थिक समृद्धि के कारण विभिन्न राजवंशों ने देवी देवताओं को समर्पित असंख्य देवालयों का निर्माण कराया। गुजरात में सोमनाथ मंदिर और द्वारिका धाम सनातन धर्म के प्रमुख धार्मिक केंद्र है।  इन स्थलों के अतिरिक्त गुजरात सूर्य पूजा का केंद्र रहा। जिनके कई मंदिर गुजरात में मिलते है। गुजरात में अरब आक्रमणकारियों ने धार्मिक स्थलों को इतनी क्षति पहुंचाई कि अब यहां पुरातत्व महत्व की मूर्तियां और देवालय गिनती के ही शेष मिलते हैं। 

इन मंदिरों में एक मंदिर गोप का सूर्य मंदिर है, जो आज पंद्रह सौ वर्ष बाद भी मूल अवस्था में मौजूद है। यह देवालय संभवतः अपने दुर्भेद्य भौगोलिक परिवेश के कारण सुरक्षित रह गया। यह देवालय 550 ईस्वी में प्रामाणिक रूप से निर्मित माना गया है। इस तथ्य के कारण यह मंदिर और भी विशिष्ट हो जाता है। क्योंकि भारत में इस काल के मंदिर यदि मिल भी जाए तो क्षतिग्रस्त ही मिलते है। यह देवालय अपने आप में आज भी मूल स्वरूप में यथावत हैं, यह एक पुरातात्विक उपलब्धि है।

गुजरात राज्य का सौराष्ट्र क्षेत्र प्राकृतिक वन संपदा और पहाड़ों से घिरा हुआ क्षेत्र है। इस कारण यहां के पुरातात्विक स्थल आज भी अपने मूल रूप में स्थापित है। इन स्थलों में गोप का सूर्य मंदिर भी है। जामनगर जिले के जामजोधपुर से 25 किलोमीटर की दूरी पर गोप गांव है। इस गोप गांव के पास ही जिनावरी गांव है। इस जिनावरी गांव को नानी गोप भी कहा जाता है। इस गांव के मध्य में यह भव्य देवालय आज भी शान से खड़ा है। स्थानीय ग्रामीण इसे सूर्य मंदिर कहते हैं। मूलतः यह शिव को समर्पित मंदिर है। इस मंदिर में गणेश, स्कन्द और शिव गणों की प्रतिमाओं के आधार पर इसे शिव मंदिर माना गया है। इसे गोपनाथ महादेव मंदिर भी कहा जाता है। गांव के पास ही वर्तुआ नदी बहती है। यह क्षेत्र को महाप्रभु वल्लभाचार्य के 84 बैठकों में से एक है। 

इस मंदिर की मुख्य विशेषता इसकी वास्तुकला है। यह देवालय पूर्वाभिमुख है। इसका अधिष्ठान लगभग दस से बारह फीट की ऊंचाई लिए हुए है। अधिष्ठान प्रदक्षिणा पर विभिन्न देवी देवताओं की प्रतिमाएं रथिकाओं में बनी हुई है। ये प्रतिमाएं द्वारपाल, सूर्य, विष्णु, गणेश, कार्तिकेय, गणों की है। इसका शिखर सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र है। इसका शिखर किसी मुकुट की तरह बना हुआ है। शिखर पिरामिड नुमा है जिसके मध्य में आमलक है। शिखर के चारों तरफ गवाक्ष निर्मित है। इसके अतिरिक्त कुछ देवी देवताओं की मूर्तियां भी शिखर में चारों तरफ स्थापित है। कश्मीर के मंदिरों की झलक इस मंदिर के शिखर में देखने को मिलती है। इसका गर्भगृह अंदर से ऊपर शिखर की ओर त्रिशंकु और रिक्त है। 

गर्भगृह में विष्णु, स्कन्द और सूर्य की प्रतिमाएं हैं जो सातवीं आठवीं सदी की है। इस कारण इसे सूर्य मंदिर कहते है। ये प्रतिमाएं बाद में स्थापित की गई है। मंदिर के अवलोकन उपरांत यह भी देखने को मिला कि इस देवालय के अधिष्ठान प्रदक्षिणा की मूर्तियां कम्बोडियन शैली में निर्मित है। अर्थात ये प्रतिमाएं खंड खंड संयोजन पद्धति में बनाई गई हैं। प्रतिमाओं को खंडों में बनाकर संयोजित किया गया है। भारत में तेलंगाना के मूलुगु जिले का देवनीगुट्टा का बौद्ध तांत्रिक देवालय भारत में इस तरह का मंदिर है जो खंड खंड संयोजन पद्धति से निर्मित है। यह मंदिर छठवीं सदी का है। गोप के इस सूर्य मंदिर के अधिष्ठान की प्रतिमाएं भारत में इस तरह की दूसरी प्रतिमाएं हैं जो खंड खंड संयोजन पद्धति से निर्मित है। मूर्तिशिल्प और वास्तुकला की दृष्टि से यह मंदिर पूरे भारत में अद्वितीय है।

इस मंदिर का निर्माण 550 ईस्वी में माना गया है। उस काल में गुजरात में मैत्रक राजवंश के शासकों का शासन हुआ करता था। इस मंदिर का निर्माण वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने किया। मैत्रक वंश भारत का प्राचीन वंश है, जिसकी स्थापना गुप्त वंश के एक सेनापति भट्टारक द्वारा 475 ई० में की गयी थी। वल्लभी इनके राज्य की राजधानी थी। इस मंदिर के पास ही एक छोटी नदी बहती है जिसके तट पर एक गुफा बनी हुई है। इस गुफा में सप्तमातृकाओ की प्रतिमाएं ग्रामीणों द्वारा पूजित है। सिंदूर से पुती हुई ये मूर्तियां गुजरात की सबसे प्राचीन मूर्तियों में से मानी जाती हैं। मंदिर के पास ही एक पुरानी गढ़ी है जो जीर्ण शीर्ण है। 

गोप के इस मंदिर के अतिरिक्त पास ही घुमली का नवलखा मंदिर, बिलेश्वर शिव मंदिर आदि कई ऐतिहासिक देवालय इस क्षेत्र में दर्शनीय है। गोप का यह मंदिर पुरातत्व और सनातन संस्कृति के अध्येताओं के लिए दर्शनीय है। इस क्षेत्र की यात्रा अवश्य करनी ही चाहिए। इसके साथ ही गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र की ग्रामीण संस्कृति को देखने समझने का अवसर भी प्राप्त होता है। पोरबंदर की तरफ से या फिर जामजोधपुर में रुक कर अपनी व्यवस्था से इस गांव में जाया जा सकता है। 


ओम प्रकाश सोनी 

असिस्टेंट प्रोफेसर इतिहास 


















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