Thursday, 19 June 2025

इतिहास और प्रकृति के सानिध्य में घुमली का पुरातत्व

प्रकृति और पुरातत्व का मिलन इतिहास को और अधिक रोचक बना देता है। खूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों से सज्जित क्षेत्र में पग पग पर बिखरा पुरातत्व अपना इतिहास खुद ही कह देता है। भारत में ऐसे कई पुरातात्विक स्थल है जहां की भौगोलिक सुंदरता देखते ही बनती है। गुजरात में घुमली भी अपनी पुरातात्विक महत्व के अतिरिक्त अपनी भौगोलिक परिवेश के कारण आकर्षण का केंद्र है। 

चारों तरफ से हरे भरे ऊंचे पहाड़ों के मध्य घुमली के प्राचीन देवालय दूर से ध्यान खींचते हैं। पहाड़ों के बीच घाटी में स्थित पुराने मंदिर आज भी किसी रत्न की तरह चमकते हुए दिखलाई पड़ते है। घुमली ग्यारहवीं बारहवीं सदी में स्थानीय जेठवा शासकों का केंद्र हुआ करता था। जेठवा शासक गुजरात के चालुक्य राजाओं के अधीनस्थ शासन करते थे। इन जेठवा शासकों की राजधानी घुमली दुर्भेद्य भौगोलिक स्थिति के कारण आक्रमणकारियों से सुरक्षित रही।

घुमली के कोने कोने में पुरातात्विक संपदा बिखरी हुई पड़ी है। यहां मुख्य तौर पर दो प्राचीन मंदिर सुरक्षित अवस्था में है। एक मंदिर है नवलखा मंदिर और दूसरा मंदिर गणेश को समर्पित मंदिर। इनमें नवलखा मंदिर अपने स्थापत्य के कारण अधिक महत्व का है। यह मंदिर मूलतः सूर्य को समर्पित था। गुजरात में सूर्य पूजा के अत्यधिक प्रभाव के कारण प्रायः जितने भी प्राचीन मंदिर मिलते हैं सभी सूर्य को समर्पित मिलते हैं। 

नवलखा सूर्य मंदिर एक विशाल और ऊंची जगती पर स्थापित है। यह जगती लगभग 15 फीट ऊंची है। इसी तरह की ऊंची जगती गोप के मंदिर में भी दिखलाई पड़ती है। मंदिर पूर्वाभिमुख है। मंदिर के मुख्य द्वार के सामने कभी तोरण द्वार रहा किंतु अब सिर्फ निचले अवशेष ही शेष है। मंदिर गर्भगृह अन्तराल और मंडप में विभक्त है। गर्भगृह वर्तमान में प्रतिमा रहित है। इसका मंडप गोलाकार स्वरूप और ऊपर से छत विहीन है। मंदिर के मंडप में तीनों तरफ से प्रवेश के द्वार निर्मित है। मंडप दो मंजिला भवन की तरह निर्मित है। मंदिर की पिछली दीवार पर लड़ते हुए दो हाथियों की विशाल प्रतिमा लगाई गई है। इस मंदिर की बाह्य तीनों मुख्य दीवारों पर ब्रह्मा सावित्री, शिव पार्वती और लक्ष्मी नारायण की प्रतिमा स्थापित रही।

इसके अतिरिक्त शिव, विष्णु, अष्ट दिकपाल, हाथियों के संघर्ष, अप्सराएं, दैनिक जीवन, संगीत, युद्ध आदि के शिल्पांकन है। कहते हैं कि इस मंदिर को बनाने में तत्कालीन समय में नौ लाख की मुद्रा व्यय हुई थी इसलिए इसे नवलखा मंदिर कहा जाता है। यह देवालय चालुक्य राजाओं की प्रसिद्ध मरु गुर्जर शैली में निर्मित है। इसका निर्माण काल ग्यारहवीं बारहवीं सदी माना गया है। हाथियों के संघर्ष की विशाल प्रतिमा इस मंदिर की विशिष्ट पहचान है। 

नवलखा मंदिर के अतिरिक्त दसवीं सदी का एक अन्य देवालय भी घुमली में दर्शनीय है। यह मंदिर मूलतः भगवान गणेश को समर्पित है। यह मंदिर गर्भगृह अन्तराल और मंडप में निर्मित रहा। वर्तमान में मंडप पूरी तरह से नष्ट हो गया है। पास ही एक नवीन मंदिर में स्थानक गणेश और ब्रह्मा की पुरातन भव्य प्रतिमा स्थापित है। इसके अतिरिक्त एक पुरानी बावड़ी भी है जो ध्वस्त हो चुकी है। घुमली में पग पग पर पुरानी प्रतिमाएं बिखरी पड़ी हैं। घुमली की पुरातात्विक संपदा को आने वाली पीढ़ी के इतिहास बोध के लिए सहेज कर रखने की आवश्यकता है।



















ओमप्रकाश सोनी 

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