Sunday, 22 June 2025

ऐतिहासिक मंदिरों का संग्रहालय – बटेश्वर

भारत में ऐसे बहुत ही कम ऐतिहासिक स्थल है जहां एक साथ लगभग सौ से अधिक पुराने मंदिर एक साथ हो। भारत में ऐसे कई स्थान आक्रांताओं के भेंट चढ़ गए। मध्य भारत में बटेश्वर एक ऐसा ऐतिहासिक स्थल है जहां इतने अधिक पुराने मंदिर एक साथ स्थित है। बटेश्वर भारत में कुख्यात चंबल बीहड़ में किसी महंगे रत्न की तरह है जिसे बीहड़ों ने सुरक्षित बचा रखा है। मध्यप्रदेश के मुरैना जिले में स्थित बटेश्वर आज एक मुख्य दर्शनीय स्थल है। 

प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता श्री के के मुहम्मद साहब ने बटेश्वर के  मंदिरों का जीर्णोद्धार करके इन्हें इनका मूल स्वरूप लौटाया है। भारतीय संस्कृति में पुनर्जन्म की अवधारणा इन मंदिरों पर अक्षरशः सही होती है। इन मंदिरों का निर्माण बड़ी योजनाबद्ध तरीके से पहाड़ की तलहटी में हुआ। पहाड़ी की तलहटी की सीढ़ियों की तरह काटकर उन पर एक के बाद एक करके पंक्तिबद्ध तरीके से इन मंदिरों को बनाया गया। पंक्तिबद्ध स्वरूप और सीढ़ीदार तलहटी में बने ये मंदिर इस तरह से प्रतीत होते हैं जैसे किसी दर्शक दीर्घा में बैठे हुए असंख्य जनमानस। एक साथ एक ही आकार प्रकार के इन मंदिरों का देखना सुखद अहसास होता है।

मूल रूप से इन मंदिरों का मुख मुख्य शिवालय की तरफ बनाया गया है। यहां का मुख्य शिवालय भूतेश्वर नाथ के नाम से विख्यात है। इसी भूतेश्वर नाथ के नाम से यह घाटी बटेश्वर के नाम से जानी गई। बटेश्वर से भूतेश्वर नाथ का अपभ्रंश है। इन सभी मंदिरों के अतिरिक्त एक बावड़ी भी है जो सदा से जल से भरी रहती है।

बटेश्वर के सभी मंदिर शिव, विष्णु और देवी को समर्पित रहे। इन मंदिरों में शिवलिंग, कार्तिकेय, लकुलीश का अंकन मिलता है। मंदिरों की द्वार शाखाओं पर नवग्रह और गरुडासिन विष्णु जिसमे गरुड़ नागों की पूंछ पकड़े हुए दर्शित है। ये सारे मंदिर आठवीं सदी से बारहवीं सदी के कालखंड में बनाए गए हैं। इन मंदिरों का आकार लगभग एक सा मध्यम है। 

इन मंदिरों से सीधे किसी राजवंश या किसी राजा का कोई अभिलेख प्राप्त नहीं होता है जिससे इन मंदिरों के निर्माताओं का पता हो सके। फिर भी अनुमानित है कि इन मंदिरों का निर्माण गुर्जर प्रतिहार राजवंश के राजत्व काल में हुआ। ये मंदिर भूकंप के कारण नष्ट हो गए थे इन्हें के के मुहम्मद साहब ने पुनः संयोजित करके इनका मूल स्वरूप लौटाया है। मंदिरों की मूर्तिशिल्प अभी भी सही अवस्था में है।

अंत में यह जिज्ञासा होती है कि एक साथ इतने देवालय किस प्रयोजन हेतु बनाए गए और किसने बनवाए? इस संबंध में अनुमान होता है कि यह बटेश्वर, पढ़ावली और चौसठ योगिनी की आकार का गोलाकार शिवालय ये सब आसपास ही है। पहाड़ी पर स्थित गोलाकार आकृति का देवालय शिव पूजा का प्राचीन स्थल रहा है। यहां से कुषाण काल की कार्तिकेय और नंदी की भारी भरकम मूर्तियां मिली हैं। बटेश्वर में भी कार्तिकेय और लकुलिश शिव की मूर्तियां अधिक हैं। 

बटेश्वर के मूल नाम भूतेश्वर से भी अनुमान होता है कि यह बीहड़ों में आम जनमानस से दूर एक बड़ा तांत्रिक स्थल रहा होगा। यहां शैव साधुओं का बड़ा मठ रहा होगा। ये मंदिर शैव साधु तांत्रिक आदि का साधना केंद्र रहे हैं। पास ही शनिचरा स्थान है जहां शनि देव का मंदिर है। वहां एक साधु की प्रतिमा है जिसे शनि देव के रूप में पूजा जाता है। बटेश्वर आम जनमानस की पहुंच से दूर निश्चित ही शैव साधकों का गुप्त साधना केंद्र रहा है। आज जीर्णोद्धार के कारण से यह स्थान भारत का मुख्य ऐतिहासिक स्थल बन गया है। जीवन में एक बार यहां की यात्रा अवश्य करनी चाहिए।












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