Friday, 13 June 2025

तेली का मंदिर ग्वालियर

ग्वालियर स्थित तेली का मन्दिर अपने भव्य आकार, स्थापत्य और अपने किंवदंतियों के कारण पुरे भारत में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। यह ऐसा देवालय है जिसके इस नामकरण के पीछे कई तरह की किंवदंतियां लोक में और अध्येताओं में प्रचलित हैं। यह देवालय प्रतिहार काल की स्थापत्य का बेजोड़ उदाहरण है। एक ऊंची जगती पर बना यह देवालय पूर्वाभिमुख है। मन्दिर निर्माण योजना में एक अर्ध मण्डप, अन्तराल और आयताकार गर्भगृह शामिल हैं। मण्डप इसका नष्ट हो चुका है। 

मंदिर का प्रवेशद्वार अंलकृत तोरण द्वार के रुप में है। द्वार शाखा के ललाट बिंब पर दोनों हाथों से सर्प को पकड़े हुए गरुड़ की आकृति अंकित है। प्रवेश द्वार के दोनों तरफ नदी देवियां, शैव द्वारपाल की मूर्तियां अंकित है। इस मन्दिर का शिखर लगभग 100 फिट ऊंचा है। शिखर का ऊपरी हिस्सा संकरा होते बेलनाकार रूप में बनाया गया है। देवालय के बाहरी कुलिकाओ लकुलीश, शिव, ब्रम्हा, दिकपाल, विष्णु, पार्वती आदि प्रतिमाएं प्रतिष्ठित है। 

इस मन्दिर का गर्भगृह वर्तमान में रिक्त हैं। मंदिर के शिखर पर अष्ट भुजी सिंहवाहिनी दुर्गा की मूर्ति बनी हुई है जिसके आधार पर इसे देवी मंदिर माना गया है।

विभिन्न साहित्यिक स्रोतों के आधार पर इतिहासकारों ने लिखा है कि कन्नौज के शासक यशोवर्मन के पुत्र आम के 25 वे राज्यवर्ष के समय अर्थात 765 ईस्वी से 775 ईसवी के बीच गंगोलाताल का निर्माण तथा उससे जुड़ा हुआ 100 हाथ ऊंचा मंदिर बनवाए जाने की सूचना मिलती है।

दुसरी जनश्रुति के अनुसार तेली का मंदिर प्रतिहार शासकों द्वारा बनवाया गया है। इस मंदिर की वास्तुकला एवम स्थापत्य शैली प्रतिहार कालीन मन्दिर स्थापत्य शैली से मेल खाती है। इस मत की पुष्टि में इस मन्दिर के बाहर लगी शिला पट्टिका में इसे सबसे पुराना और सबसे ऊंचा मन्दिर बताया गया है प्रतिहार राजा मिहिर भोज के शासनकाल में तेल के व्यापारियों द्वारा दिए गए धन से निर्मित होना बताया है। संभवत इसलिए इसका नामकरण तेली का मन्दिर हुआ ऐसा मालूम होता है।

इसी शिला पट्टिका में इस मंदिर की प्रमुख विशिष्टता छत गज पृष्ठाकार जो की द्रविड़ शैली तथा देवालय की बाहरी सज्जा को उत्तर भारत की शैली में चिन्हित किया गया है। शिलापट्ट की सूचना इस मन्दिर को स्थापत्य की दृष्टि से उत्तर और दक्षिण भारतीय वास्तु शैली का मिश्रित रुप बताती है। इसका बाहरी प्रवेशद्वार 1881 में मेजर कीथ द्वारा बनवाया गया है। 

प्रतिहार और राष्ट्र कूट शासकों की आपसी प्रतिद्वंदिता का प्रभाव इस देवालय पर भी पड़ा। राष्ट्रकूट शासक गोपाल तृतीय ने 793 — 824 ईस्वी में कुछ समय के लिए ग्वालियर पर अधिकार कर लिया था। निश्चित ही विभिन्न शासकों के काल में इस देवालय में निरंतर निर्माण या जीर्णोद्धार कार्य चलता रहा इस कारण इस मन्दिर पर मिश्रित प्रभाव दिखता है।

इस मंदिर को तेली के मंदिर कहे जानें की यह भी जानकारी मिलती है कि ग्वालियर की प्राचीन बस्तियों में रहने वाले तेलिक श्रेणियों को मंदिर को प्रकाशित करने अर्थात दीपक आदि की व्यवस्था का दायित्व दिया गया था। इसलिए लोक में यह देवालय तेली का मन्दिर नाम से पहचाना गया।

संदर्भ ग्वालियर क्षेत्र का इतिहास लेखिका डा. मधुबाला कुलश्रेष्ठ।

ओम प्रकाश सोनी

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