Wednesday, 9 July 2025

गंडई का भांड देउर मंदिर।

छत्तीसगढ़ में कल्चुरी शासकों द्वारा निर्मित ऐतिहासिक देवालयों में से गंडई का प्राचीन मंदिर विशेष महत्व का है। आकर्षक मूर्तिशिल्प और स्थापत्य की दृष्टि से यह मंदिर छत्तीसगढ़ में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ जिले के गंडई कस्बे में स्थित यह मंदिर स्थानीय तौर पर  भांड देउर मंदिर के नाम से चर्चित है। घनी आबादी के मध्य स्थित यह ऐतिहासिक देवालय हजार वर्ष बाद भी अच्छी अवस्था में है। नागर शैली में निर्मित यह मंदिर पूर्वाभिमुख एकायतन देवालय है। 

यह मंदिर गर्भगृह और अंतराल में विभक्त है। देवालय के शिखर पर आमलक सहित कलश स्थापित है। शिखर में आमलक के नीचे चारों तरफ शैवाचार्य विराजित है। मंदिर के अंतराल के उपर शार्दुल की प्रतिमा स्थापित है। यह प्रतिमा गज शार्दुल की होनी चाहिए वर्तमान में यहां गज की प्रतिमा नहीं है और सिंह की प्रतिमा भी खंडित है।

मंदिर का प्रवेशद्वार बेहद भव्य एवं आकर्षक है। द्वार के दोनों पर शैव द्वारपालों एवं नदी देवी गंगा यमुना की सुंदर प्रतिमायें स्थापित है। द्वार के ललाट बिंब पर गणेश का अंकन है। प्रवेशद्वार के सबसे उपर शैवचार्यो के साथ पांडवों के द्वारा महिषपीठ पर स्थापित शिवलिंग पूजन का भव्य शिल्पांकन किया गया है। रोचक तथ्य यह है कि प्रत्येक पांडव के नीचे देवनागरी लिपि में स्पष्ट तौर पर उनका नाम अंकित है। गर्भगृह में शिवलिंग प्रतिष्ठापित है। मंदिर के सम्मुख नंदी विराजमान है। 

मंदिर के अधिष्ठान भाग पर गजथर और अश्वथर की पंक्तियों में हाथियों, घोड़े युद्ध शिकार आदि का अंकन किया गया है। अश्वथर के उपर नरथर भाग में रामायण और कृष्णलीला के दृश्यों को शिल्पांकित किया गया है। श्री कृष्ण लीला में कालिया नाग मर्दन, गोवर्धन पर्वत का धारण एवं बंसीवादन के आकर्षक दृश्य है। रामायण के शिल्पांकन में बालि सुग्रीव युद्ध, बाली वध, राम लक्ष्मण, हनुमान एवं अन्य वानरों के दृश्य प्रमुख है। उपर रथिकाओं में देवी देवताओं की सिर्फ तीन प्रतिमायें काल भैरव, सती स्तंभ और महिषासुर मर्दिनी स्थापित है। 

इसके अतिरिक्त तत्कालीन सामान्य जनजीवन को दर्शाते कई मोहक प्रतिमायें भी प्रदर्शित है। इन प्रतिमाओं में एक प्रतिमा एक महिला की है जो कि पलंग पर लेटी हुई कुछ खाते हुए प्रदर्शित है। उपर शिखर पर शंख बजाते हुए पुरूष की आकृति, कई सैन्य योद्धा, नायिकाओं, नृत्यांगनाओं, व्याल आदि का उत्तम चित्रण मंदिर की दीवारों पर प्रदर्शित है। इन प्रतिमाओं का आश्चर्य जनक पहलू यह है कि इन प्रतिमाओं का मुख मंडल, देहिक बनावट आदि साधारण होकर भी असाधारण है।यह शिल्पांकन छत्तीसगढ़ के अन्य सभी प्राचीन मंदिरों के ऐसे शिल्पांकन से सर्वथा भिन्न है। एक प्रतिमा के नीचे देवनागरी लिपि में राणी राजी खुदा है। संभव है कि यह नाम मंदिर के शिल्पियों के प्रमुख का हो जिसके निर्देर्शन में मंदिर का निर्माण हुआ हो।

इस मंदिर से किसी भी प्रकार का कोई अभिलेख प्राप्त नहीं हुआ जिससे की इसके निर्माता राजा या सामंत का पता चल सके। स्थापत्य एवं मूर्तिशिल्प के दृष्टि से यह मंदिर बारहवी सदी के पूर्वाद्ध में निर्मित होना चाहिए। यहां के स्थानीय इतिहासकारों एवं विद्वानों का मानना है कि यह इस क्षेत्र में शासनरत फणिनागवंशी शासकों द्वारा निर्मित है।

हालांकि मेरा मानना है कि यह देवालय किसी कल्चुरी शासक द्वारा निर्मित कराया गया है। ऐसा इसलिये कि इस मंदिर के शिखर या अन्य किसी भाग पर फणिनागवंशियों के प्रतीक नाग का कोई शिल्पांकन नहीं है जबकि इस क्षेत्र में देवरबीजा, सहसपुर, नगपुरा के देवालयों के शिखर पर नाग का अंकन है जिससे वे फणिनागवंशियों द्वारा निर्मित माने जा सकते है। गंडई के इस मंदिर में नाग का अंकन नहीं है जबकि अंतराल के उपर गज शार्दुल की प्रतिमा स्थापित है। कल्चुरी शासक जाजल्यदेव जो बारहवी सदी के पूर्वाद्ध में इस कौसल अंचल के सबसे शक्ति शाली राजा के रूप में प्रतिष्ठित हुए थे। जाजल्यदेव ने पुरे कौसल अंचल, बस्तर और उसके आगे के भी शासकों को भी पराजित कर अपना शासन क्षेत्र विस्तृत किया था। 

जाजल्यदेव ने गज शार्दुल की उपाधि धारण की थी अर्थात हाथियों का शिकारी। ऐसी गज शार्दुल की प्रतिमा गंडई के इस प्राचीन मंदिर के अंतराल के उपर स्थापित है जिससे अनुमान होता है कि यह मंदिर कल्चुरी शासक संभवत जाजल्यदेव या उसके किसी शक्तिशाली सामंत द्वारा निर्मित होना चाहिए। यह देवालय फणि नागवंशियों पर कल्चुरियों के विजय का प्रतीक है। इसके अतिरिक्त अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि देवरबीजा, सहसपुर, नगपुरा के देवालय इस मंदिर के निर्माण के बाद निर्मित हुए है। देवरबीजा का प्राचीन सीता मंदिर शिल्प स्थापत्य में गंडई के इस मंदिर की नकल ही प्रतीत होता है। 

उस मंदिर के प्रवेशद्वार पर भी इसी तरह पांडवों को महिषपीठ पर स्थापित शिवलिंग के पूजन करते दर्शाया गया है। ऐसा शिल्पांकन जांजगीर के कल्चुरीकालीन प्राचीन नकटा मंदिर में भी किया गया है। जांजगीर का इतिहास सीधे कल्चुरी शासक जाजल्यदेव से जुड़ता है। इन तीन मंदिरों में एक जैसा यह अनुपम शिल्पांकन विशेष तौर पर गंडई और जांजगीर के मंदिर का शिल्पांकन कल्चुरी शासक जाजल्यदेव का स्मरण कराता है। पांडवों के द्वारा महिषपीठ पर स्थापित शिवलिंग के पूजन का दृश्य उनके स्वर्गारोहण के समय को प्रदर्शित करता है। 


यह शिल्पांकन कहीं न कहीं जाजल्यदेव से भी जुड़ता है। संदर्भ तो याद नहीं किन्तु कहा जाता है कि जाजल्यदेव भी अपने अंतिम समय में प्रसिद्ध शैवाचार्य मकरध्वज जोगी के साथ चले गये और फिर कभी नहीं लौटे। पांडवों के स्वर्गारोहण से पूर्व शिव पूजन का दृश्य और जाजल्यदेव का शैवचार्य के साथ सब कुछ छोड़कर मोक्ष और भक्ति की तलाश में जाना , इस शिल्पांकन और इस कथा में कुछ ना कुछ  संबंध जरूर रहा होगा। 

ओमप्रकाश सोनी

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