छत्तीसगढ़ में दुर्ग शहर से लगभग सोलह किलोमीटर की दूरी पर नगपुरा नाम का गांव है। यह गांव छत्तीसगढ़ की संस्कृति सरिता शिवनाथ नद के तट पर स्थित है। यह नगपुरा गांव जैन तीर्थ के रुप में आज विश्व विख्यात है। यहां भगवन पार्श्वनाथ की प्राचीन प्रतिमा स्थापित है। इस गांव की घनी आबादी में तालाब के किनारे एक प्राचीन देवालय है जो कि भगवन शिव को समर्पित है। यह मन्दिर पूर्वाभिमुख है। नागर शैली में निर्मित इस मन्दिर में सिर्फ गर्भगृह है जिसमे शिवलिंग प्रतिष्ठापित है। इसकी द्वार शाखा अलंकृत है। जिसमे गरुड़ एवं नवग्रहों का अंकन है।साथ ही द्वारपाल एवम नदी देवियों की प्रतिमाएं स्थापित है।
मन्दिर के शिखर में सिर्फ आमलक ही शेष है। सामने की तरफ़ मानव मुख के सदृश्य कीर्तिमुख बना हुआ है। इसके इसके अतिरिक्त गणेश, भैरव, नटराज, ब्रम्हा आदि एवम मैथुन प्रतिमाएं जड़ी हुई है।मन्दिर मूर्तिकला एवम स्थापत्य की दृष्टि से साधारण ही है। कोई विशेष आकर्षण इस मन्दिर में दिखलाई नहीं पड़ता है।
इस मंदिर में सामने मानव मुख सदृश्य कीर्ति मुख की तुलना बारसूर में मामा भांजा मंदिर में बने इसी मानव मुख कीर्ति मुख के साथ की जा सकती है जो इसी तरह से बना हुआ है। मंदिर से कुछ पास ही एक सती स्मारक भी मौजूद है।
इस मंदिर का निर्माण कल्चुरी शासकों के शासन काल में बारहवी सदी में निर्मित अनुमानित किया गया है। इस क्षेत्र में कलचुरी शासकों का आधिपत्य रहा है। भिलाई के पास देव बलौदा का शिव मंदिर भी कल्चुरी शासकों द्वारा निर्मित माना गया है। इस क्षेत्र में देवर बीजा, गंडई, सहसपुर में भी इसी शैली आकार में बने हुए प्राचीन मंदिर है जो लगभग एक निश्चित अंतराल में बने हुए हैं।
दुर्ग जिले के गजेटियर के अनुसार इस क्षेत्र में कल्चुरी शासकों का प्रमुख सामंत जगपाल देव स्वयं इस दुर्ग क्षेत्र में निवास करता था। इसके साथ ही उल्लेख है कि नगपुरा, देव बलौदा और आरंग के मंदिर इन तीनो का निर्माण भी एक ही साथ हुआ है ऐसा यहां माना जाता है।
ओम प्रकाश सोनी




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