छत्तीसगढ़ का कवर्धा क्षेत्र पुरातन काल में फणि नागवंशी राजाओं का शासन क्षेत्र रहा। मैकल पर्वत श्रृंखला के खूबसूरत दृश्यों से सज्जित यह क्षेत्र इतिहास पुरातत्व से समृद्ध है। यहां का भोरमदेव का देवालय अपनी स्थापत्य शैली में पुरे छत्तीसगढ़ में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। इसी तरह यहां के हरे भरे खेतों में स्थित एक सदियों पुराना देवालय अपने नाम विशेष के कारण आकर्षण का केंद्र है।
भोरमदेव मंदिर के पास ही चौरा ग्राम में मध्यकाल का एक पुराना मंदिर स्थित है जिसे स्थानीय तौर पर छेरकी महल कहा जाता है। छत्तीसगढ़ में बकरी के लिए स्थानीय लोग छेरी शब्द का उपयोग करते हैं। इस मंदिर का नामकरण छेरकी महल होने का कारण यह माना जाता है कि यहां लोग अपनी बकरियां छोड़ देते थे जो कि मंदिर में बैठी रहती थी और दूसरा कारण यह प्रसिद्ध है कि यहां मंदिर के गर्भगृह में बकरी की गंध महसूस होती है। किसी पशु के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर संभवत छत्तीसगढ़ में इकलौता मंदिर है।
मंदिर स्थापत्य और मूर्तिकला की दृष्टि से सामान्य ही है। एकायतन शैली का मंदिर सिर्फ गर्भगृह युक्त है जिसमे काले पत्थर का बना शिवलिंग प्रतिष्ठापित है। द्वार शाखा अलंकृत है। ललाट बिंब पर पद्मासन में विराजित लक्ष्मी अंकित है। द्वार शाखा में शैव द्वारपाल और चंवर धारिणी की सुंदर प्रतिमाएं स्थापित है।
मंदिर का शिखर खंडित और साधारण है। हालांकि यहां से कोई भी अभिलेख नहीं मिला है, जिससे इसके निर्माता और वंश की कोई प्रत्यक्ष जानकारी नहीं मिलती है। मंदिर चौदहवीं सदी में स्थानीय फणि नागवंशी राजाओं द्वारा निर्मित अनुमानित किया गया है।
ओम प्रकाश सोनी



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