छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहे जाने वाले भोरम देव देवालय के पास ही एक मध्य कालीन शिव मंदिर अवस्थित हैं। वर्तमान में यह मंदिर मड़वा महल के नाम से चर्चित है। यह मंदिर स्थापत्य की अपेक्षा इतिहास की दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण है। कारण कि इस मंदिर से एक अभिलेख प्राप्त हुआ है जिससे फणि नागवंशी राजाओं के प्राचीन इतिहास की दुर्लभ जानकारी प्राप्त होती है।
देवालय स्थापत्य की दृष्टि से सामान्य ही है। मंदिर गर्भगृह अंतराल और मण्डप में विभक्त है। शिखर पूरी तरह से खंडित है। मण्डप सादे प्रस्तर स्तंभों पर आधारित है। गर्भगृह का प्रवेश द्वार अलंकृत है। द्वार पर शिव, गणेश, परिचारिका आदि का अलंकरण है। गर्भगृह में शिवलिंग प्रतिष्ठापित है।इस शिव मंदिर को मड़वा महल या दूल्हा देव मंदिर कहा जाता है। माना जाता है कि इस मंदिर में विवाह होता था इसलिए इसे मड़वा महल कहा जाता है।
इस मंदिर से फणि नागवंशी राजा रामचंद्र देव का विक्रम संवत 1406 सन 1349 का अभिलेख प्राप्त हुआ है। संस्कृत में लिखा यह लेख वर्तमान में महंत घासीदास संग्रहालय रायपुर में प्रतिस्थापित है। इस अभिलेख के अनुसार मड़वा महल मंदिर मूल रूप से रामेश्वर शिव मंदिर है। यह मंदिर फणि नागवंशी राजा रामचंद्र देव ने बनवाया था। इसका वास्तुकार महादेव था जो शिल्प शास्त्र का ज्ञाता था। मन्दिर के भोग प्रसाद के लिए राजपुरा ग्राम दान दिया गया था।
इस अभिलेख में फणि नागवंशी राजाओं की उत्पत्ति की कथा का उल्लेख है। इसमें अहिराज से लेकर रामचंद्र देव तक राजाओं की वंशावली का भी लेख मिलता है। राजा रामचंद्र की सात रानियों और उसके कई पुत्र पुत्रियों का नाम भी लेख में आया है। इसमें प्रशस्ति कार का नाम विट्ठल है जो दक्षिण का है। प्रशस्ति के उत्कीर्ण कर्ता का नाम नष्ट हो गया है। मड़वा महल का अभिलेख फणि नागवंशी राजाओं के इतिहास की आधार पूर्ण जानकारी उपलब्ध कराता है। (अभिलेख की महत्त्वपूर्ण जानकारी के लिए संदर्भ पुस्तक भोरमदेव क्षेत्र लेखक श्री अजय चन्द्रवंशी)
मंदिर के बाहरी दीवारों पर कई मिथुन प्रतिमाएं स्थापित है जिसके कारण यह मन्दिर भी खजुराहो के मंदिरो की तरह छत्तीसगढ़ मे अपनी पहचान रखता है। मन्दिर परिसर में कई योद्धा स्मारक, सती स्मारक रखे हुए हैं।
ओम प्रकाश सोनी


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