विश्व विरासत दिवस के अवसर पर आज के बस्तर का ही अंग कांकेर और उसके प्राचीन धरोहरों की चर्चा करना नितांत आवश्यक है। आज कांकेर अपनी अलग संस्कृति और इतिहास के बावजूद भी बस्तर में विलीन हो गया है। बस्तर की छाप कांकेर पर इतनी गहरी पड़ चुकी है कि कांकेर का गौरवपूर्ण इतिहास और यहां की प्राचीन विरासत अपनी अलग पहचान खो चुके हैं।
कांकेर एक अलग राज्य रहा है। इसका अपना समृद्ध इतिहास रहा है। आजादी के बाद बस्तर और कांकेर दोनो रियासतों को मिलाकर बस्तर जिला बना दिया गया था। आज बस्तर में कुल 7 जिले है एवं संभाग का नाम बस्तर है।
कांकेर मे ग्यारहवी सदी से चौदहवी सदी के पूर्वाद्ध तक सोमवंशी राजाओं का शासन था। सोमवंशी शासकों ने कांकेर के अलावा सिहावा क्षेत्र में भी अपनी राजधानी बनाई थी। सिहावा क्षेत्र वर्तमान धमतरी जिले के अंतर्गत आता है। सिहावा 1830 ई तक बस्तर रियासत का महत्वपूर्ण परगना था।
बस्तर ग्यारहवीं सदी में चक्रकोट के नाम से छिंदक नाग राजाओं द्वारा शासित कल्याणकारी राज्य था। पड़ोसी कांकेर जिला काकरय के नाम से तत्समय सोमवंशी शासकों का शासन क्षेत्र था। काकरय के सोमवंशी राजाओं में सिंहराज, व्याघ्रराज, बोपदेव, कर्णराज, पंपराज प्रमुख शासक हुए। कर्णराज की शासन अवधि काकरय राज्य का स्वर्ण काल था। आज भी कांकेर के जन सामान्य में कर्ण राजा की कई अनुश्रुतियां व्याप्त है। कर्णराज के समय कांकेर में कई देवालयों का निर्माण हुआ। ये मंदिर आज भी करप सिहावा में देखे जा सकते हैं।
सिहावा में कांकेर के सोमवंशी राजा कर्णराज द्वारा बनवाये हुये कुल 5 प्राचीन मंदिर है। इन मंदिर समूह को कर्णेश्वर महादेव मंदिर समूह के नाम से जाना जाता है। इन मंदिरों में एक मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। दुसरा मंदिर रामजानकी मंदिर है जिसमें भगवान राम सीता लक्ष्मण की संगमरमर की नवीन प्रतिमा एवं विष्णु की दो तथा सूर्य की एक प्राचीन प्रतिमा रखी हुई है। अन्य दो मंदिरों मे क्रमश भगवान गणेश, दुर्गा की प्रतिमायें कालांतर में रखी गई है। एक मंदिर बेहद छोटा है जिसमें सूर्य की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर परिसर में सूर्य, गणेश, सरस्वती, सती, और योद्धाओ की कई प्रतिमाएं भी रखी हुई।
शिवमंदिर के मंडप की भित्ति में शिलालेख जड़ा हुआ हे। शिलालेख की भाषा संस्कृत और लिपि नागरी है। इस शिलालेख के अनुसार सोमवंशी राजा कर्ण ने स्वयं के पूण्य लाभ के लिये देवहदा में भगवान शिव और केशव के मंदिर बनवाये। राजा कर्ण ने अपने माता पिता के पूण्य लाभ के लिये त्रिशुलधारी शिव के दो मंदिर एवं अपने भाई रणकेसरी के लिये एक मंदिर बनवाया था। देवहदा आज का देऊरपारा है जहां ये मंदिर अवस्थित है।
इन मंदिर समुह से एक किलोमीटर की दुरी पर तालाब के किनारे एक प्राचीन कुंड है। इसके पास ही एक नदी बहती है। नदी के तट पर एक मंदिर के अवशेष बिखरे पड़े है। इस मंदिर का निर्माण कर्णराज की रानी भोपल देवी ने करवाया था। जिसमें विष्णु की प्रतिमा स्थापित थी।
ये सभी मंदिर ओडिसा शैली में है। शिलालेख में तिथि शकसंवत 1114 ई तदनुसार सन 1192 अंकित है। यही मंदिरों के निर्माण तिथि भी है। बस्तर और कांकेर के मंदिरो की एक ही निर्माण अवधि के बावजूद भी शिल्प और स्थापत्य दोनों में बेहद ही भिन्नता नजर आती है।
धमतरी के पास स्थित नगरी से पहले बायीं तरफ पांच किलोमीटर दुर देवपुर गांव है इस देवपुर गांव के देउरपारा में ये मंदिर स्थित है। पास ही महानदी का उदगम एवं श्रृंगी ऋषि का आश्रम भी स्थित है , इन मंदिरो के साथ ही आश्रम के दर्शन भी किए जा सकते हैं।





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