पश्चिम में परमार कालीन स्थापत्य कला का प्रवाह नर्मदा के तीरे तीरे मालवा से गुजरात तक हुआ। वहीं पूर्व में परमार कला दक्षिण कौसल के मैकल घाटी तक पहुंची। मालवा में परमार काल के प्रसिद्ध मंदिर स्थापत्य की छाप छत्तीसगढ़ के सुविख्यात भोरमदेव मंदिर में भी दिखलाई पड़ती है। भूमिज शैली और शिखर पर उरुश्रृंगो की कलात्मक सज्जा सहित ऊपर से मध्य तक की चौड़ी पट्टिका, परमार कालीन स्थापत्य की ऐसी खूबियां मध्यप्रदेश राजस्थान गुजरात के मंदिरों में दिखती है।
यही खासियत छत्तीसगढ़ के भोरमदेव मंदिर में भी दिखती है। ग्यारहवीं सदी की यह स्थापत्य शैली आज खुद ही प्रमाणित कर देती है कि अमुक देवालय परमार काल की निर्मिति है और इस कला के संरक्षक राजा भोज जैसे परमार वंशीय शासक हुए। उस दौर में यह स्थापत्य शैली बेहद फली फूली, इसका अधिकतम प्रसार नर्मदा के प्रवाह के साथ साथ हुआ। वहीं छत्तीसगढ़ में भी इस शैली में एक मंदिर निर्मित हुआ है जिसे आज भोरमदेव शिव मंदिर कहा जाता है।
मैकल पर्वत मालाओं से घिरे कवर्धा क्षेत्र में स्थित भोरमदेव का प्राचीन प्रासाद आज छत्तीसगढ़ की मुख्य पहचान बन चुका है। मैकल की घाटियों में परमार स्थापत्य शैली का यह देवालय स्थानीय फणि नागवंशी राजाओं की देन है। कवर्धा से 18 किलोमीटर दूर मैकल पहाड़ियों की घाटी में चौरा ग्राम स्थित हैं। इसी चौरा ग्राम में भोरमदेव के तीन प्राचीन मंदिर है जिनमे सबसे प्राचीन विशाल शिव मंदिर जो भोरमदेव मंदिर के नाम से विख्यात है, दूसरा छैरकी महल और तीसरा मड़वा महल, यह भी पास ही स्थित है। माना जाता है गोंड आदिवासियों के देवता भोरमदेव के कारण यह नामकरण प्रसिद्ध हुआ।
वास्तु और स्थापत्य योजना में यह देवालय छत्तीसगढ़ की स्थापत्य क्षेत्र में मुकुट मणि की तरह है। प्रस्तर निर्मित यह मंदिर नागर शैली में बना हुआ पूर्वाभिमुख स्थिति में है। एक ऊंचे अधिष्ठान पर बना यह मंदिर गर्भगृह अंतराल और मण्डप में विभक्त है। मंदिर में पूर्व, उत्तर और दक्षिण से प्रवेश हेतु द्वार निर्मित है। प्रत्येक प्रवेश द्वार में अर्ध मंडप और मध्य में चौकोर मंडप स्थित हैं। मंदिर का गर्भगृह वर्गाकार है, यहां गर्भगृह में नीचे जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई है। गर्भगृह में शिवलिंग प्रतिष्ठापित है। इसके अतिरिक्त राजपुरूष, योगी, उमा महेश्वर, नाग आदि प्रतिमाएं गर्भगृह और मंडप में रखी हुई है। मंदिर का शिखर कलश विहीन है। शिखर से मध्य तक चौड़ी सज्जा पट्टियां बनाई गई है। इसकेे साथ ही शिखर लघु शिखरों से सज्जित है। मंदिर की इस तरह की वास्तु योजना इसे परमार स्थापत्य शैली का आभास कराती है।
मन्दिर के बाहरी भित्तियो पर देवी देवताओं की विभिन्न प्रतिमाओं यथा गणेश, वामन, चामुंडा, विष्णु आदि की प्रतिमाएं स्थापित है। इसके अतिरिक्त अत्यधिक मात्रा में नायक नायिकाओ की प्रेम लीला, मैथुन प्रतिमाएं, जन सामान्य, युद्ध, विनोद आदि की सैकड़ों मूर्तियां मन्दिर में लगी हुई है। इस कारण इसे छत्तीसगढ़ का खजुराहो भी कहा जाता है।
मंदिर स्थापत्य और मूर्तिकला में जितना जीवंत है उतना ही रुचिकर इतिहास इसके निर्माता राजवंश फणि नागवंशी के राजाओं का है। ग्यारहवीं सदी में छत्तीसगढ़ में दो नागवंशी राज घराने शासन कर रहे थे एक था बस्तर में छिंदक नाग घराना और दूसरा वर्तमान कवर्धा में शासनरत रहा फणि नागवंश। फणि नागवंश के इतिहास की जानकारी के लिए कई अभिलेख और प्रतिमा लेख प्राप्त हुए हैं। इनमे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है भोरमदेव क्षेत्र के मड़वा महल से मिला अभिलेख। मड़वा महल अभिलेख से फणि नागवंश के प्राचीन इतिहास पर प्रकाश पड़ता है।
1349 ईसवी के मड़वा महल अभिलेख राजा रामचंद्र देव से सम्बन्धित है जिसमे उन्होंने शिव मंदिर बनवाने का उल्लेख किया है। रामचंद्र देव ने कल्चुरी राजकुमारी अम्बिका देवी से विवाह किया था। अभिलेख में इस वंश के अहिराज से लेकर रामचंद्र देव और उसके पुत्र अर्जुन तक कुल 25 राजाओं की वंशावली दी गई है। इसमें नागवंश की उत्तपति की कथा दी गई है जिसके अनुसार विंध्य पर्वत पर एक साधु जातुकर्ण रहता था जिसके दो पुत्र सुशर्मा, देवशर्मा तथा एक पुत्री मिथिला थी। अपने बेटों को चौदह विद्याओं की शिक्षा देकर, उन्हें अपनी पुत्री को सौंपकर जातुकर्ण अपनी पत्नी के साथ स्वर्ग चला गया। एक दिन मिथिला आंगन में खेल रही थी तब एक सर्पराज के सेवक ने उसे देख लिया और मिथिला की जानकारी सर्पराज को दी। सर्पराज ने ब्राह्मण कुमार का वेश धारण कर मिथिला को देखने गया। मिथिला और सर्पराज में प्रेम संबंध हो गया और दोनों ने विवाह कर लिया। इन दोनों का पुत्र अहिराज हुआ। अहिराज ने आसपास के राजाओं पर विजय प्राप्त कर राज्य स्थापित किया। अहिराज के बाद राजल्ला शासक हुआ। राजल्ला का बेटा धरणीधर अल्प वयस्क होने के कारण उसका भाई धारल्ला राजा बना। बाद में धरणीधर ने अपने चाचा धारल्ला को हटाकर राज प्राप्त कर लिया। धरणीधर के बाद शक्ति चंद्र और उसके बाद गोपाल देव हुआ। गोपाल देव के बाद नल देव और फिर भुवनपाल राजा हुए।(संदर्भ पुस्तक भोरमदेव क्षेत्र लेखक श्री अजय चंद्रवंशी)
इसी गोपाल देव को भोरमदेव के इस प्राचीन शिव मंदिर का निर्माता भी माना जाता है। मंदिर में ही 1551 के लेख में इसे भुवन पाल का शिवालय कहा गया है। अधिकांश इतिहासकार गोपाल देव को ही भोरमदेव के इस शिव मंदिर का निर्माता मानते हैं। भोरमदेव शिव मंदिर में ही योगी की मूर्ति पर राणक गोपाल देव कल्चुरी संवत 840अंकित है जिससे यह समय 1088–89 ठहरता है। भारतीय इतिहास में यह कालखंड मध्य भारत के परमार राजाओं का रहा। 1055 में राजा भोज की मृत्यु के बाद उसका भतीजा उदयादित्य राजा हुआ और उसी के शासन अवधि 1059 ईसवी में मध्य भारत में परमार स्थापत्य कला का मुकुट मणि उदयपुर का नीलकंठेश्वर देवालय प्रतिष्ठित हुआ और 1080 में पुन उदयादित्य ने उसका जीर्णोद्धार कराया। फणि नागवंश के राजा गोपाल देव द्वारा 1088 ईस्वी में भोरमदेव के शिव मंदिर का निर्माण काल भी , तदयुगीन परमार स्थापत्य कला के प्रभावित होने से भी उचित प्रतीत होता है।
भोरमदेव मंदिर के पास ही छेरकी महल और मड़वा महल मंदिर भी दर्शनीय है। कवर्धा क्षेत्र में पचराही, कटंगी, बिरखा, घटियारी, सहसपुर, हरमो आदि गांवों में फणि नागवंश के काल की पुरा संपदा बिखरी पड़ी है। फणि नागवंश का इतिहास भी इस क्षेत्र के मंदिरो की तरह रुचिकर है जिसे इन मंदिरो में छिपे रहस्यों की तरह अनुभूत किया जा सकता है।
ओम प्रकाश सोनी
असिस्टेंट प्रोफेसर इतिहास
सुकमा








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