Sunday, 13 July 2025

बालोद का कपिलेश्वर मंदिर समूह

छत्तीसगढ़ में बालोद जिला दुर्ग जिले से 2012 में  अलग होकर एक नया जिला बना है। बालोद का पुरा क्षेत्र मध्यकालीन पुरातात्विक स्मारकों के लिये भी प्रसिद्ध है। बालोद शहर के अंतिम छोर पर कपिलेश्वर मंदिर समूह है। इस मंदिर समूह में भगवान शिव, देवी दुर्गा, भगवान गणेश, भगवान कृष्ण, देवी संतोषी और राम जानकी को समर्पित छः मंदिर है। इसके अतिरिक्त बालोद में एक प्राचीन किले के भग्नावशेष उसका द्वार, कई प्रतिमाएं मौजूद है। बालोद के आसपास की परिधि में जगन्नाथपुर, पलारी, मालीघोरी , चिरचारी, महामाया, डौंडी लोहारा, गौरेया आदि स्थलों में ऐतिहासिक महत्त्व के स्मारक, मूर्तियां और भग्नावशेष प्राप्त होते हैं।

ये सारे स्मारक मध्यकाल में निर्मित अनुमानित है। छत्तीसगढ़ में दसवीं ग्यारहवीं सदी से लेकर अठारहवी सदी तक कल्चुरी शासकों का शासन रहा। ग्यारहवी बारहवी सदी इनके राजत्व का स्वर्णिम युग था। इस दौरान पुरे छत्तीसगढ़ में इन्होंने कई देवालय बनवाए जो स्थापत्य और मूर्तिकला के बेजोड़ नमूने हैं। इस दौरान बस्तर क्षेत्र में छिंदक नागवंशी और कवर्धा क्षेत्र में फणि नागवंशी राजाओं का शासन रहा। मध्य काल में कल्चुरी शासकों की सत्ता कमजोर पड़ गई थी और इनकी राज्य लक्ष्मी भी लुप्त हो गई थी। 

इस दौरान बालोद क्षेत्र में ऐसा कौन सा राजवंश शासनरत रहा जिसने इन मंदिरों का निर्माण कराया? स्थानीय तौर पर लोगों का मानना है कि यहां नागवंशी राजाओं का शासन रहा और उन्होंने ही ये सारे मन्दिर बनवाए। कपिलेश्वर मन्दिर में नाग की प्रतिमाएं उत्कीर्ण है जिससे इस बात को थोड़ा बल मिलता है। बालोद के कपिलेश्वर मन्दिर परिसर में कोई अभिलेख अभी मौजूद नहीं है किंतु दुर्ग गजेटियर में यहां दो अभिलेख मौजूद होने की बात कही गई किंतु उन्हें वहां से हटा लिया गया ऐसा उल्लेख मिलता है। 

अगर वो अभिलेख कहीं सही स्थिति में है या उनका अनुवाद कहीं छपा होता तो यह पता चल जाता कि यहां अतीत में कौन सा वंश रहा और किसने कब इन मंदिरों को बनवाया। अगर स्थानीय स्तर की बात को सही मानकर चले कि यहां नागवंशियो की राज रहा तो वे नागवंशी शासक कौन रहे? अनुमान कर सकते हैं कि नागों की वो शाखा कवर्धा के फणी नागवंशी शाखा से संबंध रही या फिर बस्तर के छिंदक नागवंशी शाखा से या फिर स्वतंत्र कोई अलग शाखा। 

दुसरी महत्त्वपूर्ण बात मुझे देखने को मिली कि छत्तीसगढ़ में बस्तर के बाद बालोद ऐसा क्षेत्र है जहां सर्वाधिक गणेश प्रतिमाएं देखने को मिलती है। जिसमे अधिकांश गणेश प्रतिमाएं पांच फीट या उससे भी बड़ी है। तब ऐसा अनुमान होता है कि यहां नागवंशियो की स्थानीय शाखा निश्चित ही बस्तर के छिंदक नागवंश से सम्बन्धित रही तभी इन्होंने बस्तर के नागवंशियो की तरह ही गणेश की इतनी प्रतिमाएं बनवाई। हालांकि यह सिर्फ़ अनुमान है। यहां कौन राजवंश रहा इसकी कोई लिखित जानकारी मुझे प्राप्त नहीं हुई है। महासिंह और बाला शाह जैसे राजाओं के नामोल्लेख की कुछ अपुष्ट जानकारी बस प्राप्त हुई है।यदि इस बारे में कोई जानकारी किसी को हो तो अवश्य साझा करें।

बालोद में शहर से दूर कुल छह मंदिरों का एक समूह है जिसे कपिलेश्वर मंदिर समूह कहा जाता है। यह कपिलेश्वर नाम कैसा पड़ा? इसका कोई उल्लेख नहीं मिला है।भगवान शंकर को समर्पित कपिलेश्वर मंदिर इनमें सबसे बड़ा मंदिर है। पूर्वाभिमुख इस मंदिर में सिर्फ गर्भगृह मात्र है। मंदिर का शिखर भी काफी उंचा है। दोनों तरफ भगवान गणेश की 6 फीट की प्रतिमायें स्थापित है। मंदिर के द्वारशाखा के दायें  और बायें तरफ गंगा यमुना और द्वारपाल की प्रतिमायें स्थापित है। 

इन मंदिरों समुहों में दुसरा मंदिर भगवान गणेश को समर्पित है। इस मंदिर के गर्भगृह में भगवान गणेश की छ फीट की प्रतिमा स्थापित है। इस मंदिर का शिखर उपर की ओर संकरा होता गया है। मंदिर का शिखर पीड़ा देवल प्रकार में निर्मित है। छत्तीसगढ़ में भगवान गणेश की अनेकों प्रतिमायें मिलती है किन्तु अधिकांश प्रतिमायें खुले में या किसी मंदिर के मंडप में स्थापित प्राप्त होती है किन्तु ऐसे मंदिर बेहद की कम प्राप्त होते है जो कि सिर्फ भगवान गणेश को समर्पित है। भगवान राम का मंदिर गर्भगृह और मंडप में विभक्त है। इसमें भगवान राम की आधुनिक प्रतिमा स्थापित है।  

भगवान कृष्ण और मां दुर्गा के पुराने मंदिरों में इनके आधुनिक प्रतिमायें स्थापित है। संतोषी माता का मंदिर इन सभी मंदिरों में सबसे छोटा है। इस मंदिर का शिखर पीड़ा देवल आकृति में बना हुआ है। मंदिरों के पास बावड़ी या तालाब बनाने की परंपरा यहां पर भी देखने को मिलती है। 

शिव मंदिर के सामने एक बावड़ी बनी हुई है।  जिसमें योद्धाओं की प्रतिमायें स्तंभों पर स्थापित  है। इन मंदिरों का निर्माण काल 15 वी -16 वी सदी माना गया है। शहर में ही कुछ दूरी पर बूढ़ा तालाब मौजूद हैं जिस पर किले की चार दिवारी और एक बड़ा प्रवेशद्वार अवस्थित है। जिससे प्रतीत होता है यहां कभी बड़ा सा किला रहा होगा जिसमे राजपरिवार निवासरत रहा होगा। इसके पास ही चार दिवारी में खुला संग्रहालय है जिसमे कई प्रतिमाएं रखी हुई है।

ओम प्रकाश सोनी

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