बिजोलिया का मंदाकिनी मंदिर समूह
राजस्थान का बिजोलिया धार्मिक और ऐतिहासिक रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण स्थल है। विशेष तौर यह जैन धर्मावलंबियो के लिए आस्था का मुख्य केंद्र भी है क्योंकि यहां के ग्यारहवीं सदी के अभिलेख अनुसार भगवान पार्श्वनाथ ने बिजोलिया में ही एक धावड़े के पेड़ के तले घोर तप कर कैवल्य प्राप्त किया था। बिजोलिया प्रतिहार परमार और चौहान शासकों की भूमि रही है। इतिहास में बिजोलिया चौहान के प्रसिद्ध वंशावली अभिलेखो के लिए विख्यात है।
परमार और चौहानों के काल में निर्मित मंदाकिनी मंदिर समूह और कुंड के कारण बिजोलिया का पुरातात्विक महत्त्व बढ़ जाता है। यहां नगर के मध्य एक किला भी मौजूद है जो ढहने की कगार पर है। बिजोलिया किसान आंदोलन और विजय सिंह पथिक द्वारा अंग्रेजों को धूल चटाने की वीरतापूर्ण गाथा से अधिक आलोकित है। भीलवाड़ा जिले में बिजोलिया के मुख्य आकर्षण पुरातात्विक मंदाकिनी मंदिर समूह है जो कला स्थापत्य के आकर्षण केंद्र है।
मंदाकिनी मंदिर समूह में सबसे मुख्य मंदिर महाकाल वैद्यनाथ मंदिर है। नागर शैली में निर्मित यह देवालय दो गर्भगृह और संयुक्त सभा मंडप युक्त विशाल शिव मंदिर है। इसमें पश्चिम मुखी गर्भगृह महाकाल को और दक्षिण मुखी गर्भगृह वैद्यनाथ को समर्पित है। सभामंडप में ही एक अधूरी नंदी प्रतिमा रखी हुई है। किनारे नीचे की तरफ एक कुआं बना हुआ जिसमे उतरने के लिए सीढ़ियां बनी हुई है। मंदिर का शिखर आमलक कलश बिजपूरित से शोभित है। मंदिर की ताकों पर विभिन्न देवी देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित है।
इस मंदिर के दक्षिण में ताराकृति में बना हजारेश्वर मंदिर है। पूर्वाभिमुख यह मंदिर मंडप अंतराल और गर्भगृह में विभक्त है। गर्भगृह में सहस्त्रलिंग स्थापित है जिसके कारण इसे हजारेश्वर मंदिर कहा जाता है। मंदिर का शिखर उरूश्रृंग, आमलक कलश बिजपूरित से शोभित है। यह मंदिर इन मंदिरों में सबसे आकर्षक है।
इन मंदिरों के समूह के मध्य में एक विशाल कुंड है जिसे मंदाकिनी कुंड कहा जाता हैं। इस कुंड में उत्तर पूर्व और पश्चिम से प्रवेश करने के लिए सीढ़ियां बनी हुई है। दक्षिण में एक अलंकृत चबूतरा बना हुआ है। इस कुंड में विभिन्न प्रकार धार्मिक उत्सव आयोजित किए जाते रहे हैं। इस कुंड में तीर्थयात्रियों के विभिन्न लेख खुदे हुए हैं।
इन सभी मंदिरों में पीछे की तरफ उंडेश्वर महादेव मंदिर है। यह मंदिर भूमिज शैली में निर्मित है। देवालय गर्भगृह, अंतराल और मंडप में बंटा हुआ है। यह मंदिर पश्चिममुखी और ताराकृति में बना हुआ है। मंदिर के मंडप के मध्य वर्गाकार आधार है। जो चारो तरफ मकर तोरण द्वार से सज्जित है। इसके सभा मंडप का शिखर काफी प्रभावी है जिसमे तीनो तरफ चौकोर स्तंभों पर आधारित छतरियां बनी हुई है। इन सारे मंदिर और कुंड में विभिन्न देवी देवताओं, अप्सराओ, नृत्यांगना, वादक दल आदि की दुर्लभ प्रतिमाएं जड़ी हुई।
मंदाकिनी मंदिर समूह में उंडेश्वर महादेव मंदिर को छोड़कर शेष ग्यारहवीं सदी में निर्मित अनुमानित है जबकि यह बारहवीं सदी में निर्मित माना गया है। अधिकांश विद्वान बिजोलिया के इन मंदिरों के चौहान शासकों के काल में निर्मित मानते हैं। जबकि ये मंदिर बिजोलिया में चौहान शासकों के अधिकार में आने से पूर्व निर्मित हो चुके थे। इसका प्रमाण चौहान शासकों का प्रथम बिजोलिया अभिलेख विक्रम संवत 1226 में बिजोलिया के महाकाल, हजारेश्वर और मंदाकिनी कुंड का उल्लेख मिलता है।
अत: चौहानों के अधिकार में आने से पूर्व ही बिजोलिया में ये मंदिर बन चुके थे। हालांकि इन मंदिरों में ऐसे कोई स्पष्ट अभिलेख नही मिले हैं ये सारे मंदिर किसने बनवाए?चौहान शासकों से पूर्व इस क्षेत्र में परमार शासकों का शासन रहा। चितौड़ में परमार भोज और नरवर्मा के अभिलेख इसकी पुष्टि करते हैं। चितौड़, मेनाल और बिजोलिया के मंदिर मालवा के भूमिज शैली और शिखर पर शुकनास और उरूश्रृंग आदि का अलंकरण इन मन्दिरों को परमारो के काल में निर्मित होने का आभास कराते हैं।
ओम प्रकाश सोनी
असिस्टेंट प्रोफेसर सुकमा







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