भागवत धर्म के साक्ष्य का प्राचीन अभिलेख घोसुंडी शिलालेख।
भाषा लिपि व उत्कीर्णन की दृष्टि से यह शिलालेख भारतीय अभिलेखो में बड़ा महत्त्वपूर्ण है। इसे घोसुंडी के लेख के नाम से भी कहा गया है। इस लेख को सबसे पहले कविराजा श्यामल दास ने प्रकाशित कराया था। इस शिलालेख के प्रकाशन के संबंध मे सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य इसके कई टुकड़ों को मिलाकर संशोधित पाठ प्रस्तुत करना। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के बस्सी और घोसुंडी गांव की सीमा पर एक टुकड़ा मिला था।
इन टुकड़ों को मिलाकर श्री गौरीशंकर हीराचंद ओझा और हलद्वार ने संशोधित पाठ प्रस्तुत किया। इसके बाद डी आर भंडारकर ने सब टुकड़ों के पाठों को प्रस्तुत करते हुए एपिग्राफिका इण्डिका भाग 22 में विस्तृत लेख लिखा। डी आर भंडारकर जी ने इस अभिलेख का समय 350 ईसा पूर्व माना है वहीं काशी प्रसाद जायसवाल ने इसकी तुलना खारवेल के लेख से तुलना करते हुए 200 से 150 ईसा पूर्व माना है।(संदर्भ चितौड़गढ़ का इतिहास डा श्री कृष्ण जुगनू)
इस लेख की लिपि ब्राह्मी और भाषा संस्कृत है। यह अभिलेख बेहद महत्त्वपूर्ण है इसलिए है कि ईसा पूर्व दूसरी तीसरी सदी में भागवत धर्म के अंतर्गत भगवन वासुदेव और संकर्षण की पूजा का उल्लेख है।
पहले लेख में तीन पंक्तियां हैं। इसमें उल्लेखित है भगवान् वासुदेव और संकर्षण के पूजा के निमित्त एक पत्थरों का घेरा (नारायण वाटिका) बनवाया गया था। इसमें किसी राजा जो सर्वतात गजायन के मध्य किसी राजा का नाम होना चाहिए था के द्वारा अश्वमेघ यज्ञ किया गया था। यह परकोटा मंदिर निर्माण का पहला नमूना माना गया है।
वर्तमान में यह अभिलेख शासकीय संग्रहालय उदयपुर राजस्थान में स्थित है।
ओम प्रकाश सोनी
असिस्टेंट प्रोफेसर सुकमा



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