लोद्रवा का कलात्मक जैन मंदिर
मूमल महेन्द्रा की परिणय गाथा से आलोकित लोद्रवा थार के रेगिस्तान का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है। कभी जैसलमेर के भाटी राजपूतो की राजधानी रहा लोद्रवा आज एक भव्य जैन प्रासाद के कारण सैलानियों का आकर्षण का केन्द्र है। श्रद्धा एवं आस्था का केन्द्र यह जैन मंदिर स्थापत्य कला के नये मानकों को प्रदर्शित करता है।
किलेनुमा विशाल प्रस्तर दीवारों से घिरा यह जैन प्रासाद पंचायतन शैली में निर्मित है। मुख्य द्वार से अंदर मंदिर के सम्मुख विशाल तोरण द्वार स्थापित है जो कि विभिन्न प्रतिमाओं से सुशोभित है। इस द्वार की बारीक नक्काशियां इस बेहद खास बनाती है। मुख्य मंदिर के गर्भगृह में प्रभु पार्श्वनाथ की कसौटी पत्थर की भव्य प्रतिमा स्थापित है। मंडप के गुंबद का वितान बेहद ही अंलकृत है जिसमें पत्थर निर्मित झूमरों को लगाया गया है।
मंदिर की बाहरी दीवारों पर छोटी छोटी जालियां बनी है जो कि मंदिर के अतुल्यनीय स्थापत्यकला को प्रदर्शित करती है। मंदिर के किनारे एक प्रस्तर अधिष्ठान पर कल्पवृक्ष की प्रतिकृति स्थापित है जहां मन की मुराद पुरी होने की मान्यता प्रचलित है।
जैसलमेर के प्रसिद्ध पीले पत्थर से बना यह मंदिर की किसी दमकते स्वर्ण आभूषण से कम नहीं है। कला और शिल्पी दोनों का सर्वाच्च प्रतिमान इस मंदिर के स्थापत्य में प्रदर्शित होता है। इस मंदिर का निर्माण 1618 ईस्वी में थाहरूशाह भंसाली ने करवाया था। कालांतर में पुन 1971 के आसपास इस मंदिर का जीर्णाद्धार किया गया है।
लोद्रवा का मंदिर स्थापत्य में रूचि रखने वाले सैलानियों का पसंदीदा स्थान है। जैसलमेर की यात्रा इस मंदिर के दर्शन के बिना अधुरी ही समझी जानी चाहिए।
ओम प्रकाश सोनी




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