रेगिस्तान का सबसे कीमती गहना है जैसलमेर
तालरिया मगरिया रे यह धोरा वाला देश राजस्थान आज पुरी दुनिया से आये अतिथियों को अपनी ओर लुभाता है। थार के रेगिस्तान में चटक रंगों का परिधान और बड़ी बड़ी मुछों की शान आज राजस्थान की पहचान बन चुकी है। राजस्थान के विशाल किले, राजशाही महलों और पुराने मंदिरों की विरासतें पुरे दुनिया भर के पर्यटकों का आकर्षण का केन्द्र बन चुके है।इन खूबियां को अपने में समेटे हुआ जैसलमेर राजस्थान के मरूमंडल का सबसे बेहतरीन पर्यटन स्थल है।
जैसलमेर के त्रिकुट पहाड़ी पर बना सोनार किला की किसी सिंह की तरह आराम फरमाते हुए लगता है। महारावलों का गौरवमयी इतिहास इस किले की दीवारों पर स्वर्ण अक्षरों से सुशोभित है। पीत पाषाणों से बना सोनार किला सूर्य की किरणों को पाकर स्वर्ण की तरह चमक उठता है और सारे जैसलमेर में स्वर्ण आभा बिखर जाती है।
किले के आसपास बनी हवेलियां मरूभूमि के स्थापत्य की सबसे शानदार उदाहरण है। जैसलमेर की पटवों की हवेलियों की नक्काशी, कला के सर्वोच्च स्तर को प्रदर्शित करती है। सुंदर गवाक्षों, बारिक जालीदार खिड़कियों और झरोखों से सुसज्जित जैसलमेर हवेलियों का शहर है। यहां की हवेलियां अपने आप में जीवंत संग्रहालय है। इन हवेलियों में सेठ साहुकारों के द्वारा उपयोग की जाने वाली दुर्लभ वस्तुओं का संग्रह राजस्थान की समृद्धि को दर्शाता है।
किले मे बने जैन मंदिरों की स्थापत्यकला और मूर्तिकला इतनी बेजोड़ है कि पर्यटक को पूर्ण विश्वास हो जाता कि इनका निर्माण तो निश्चित ही देवशिल्पियों ने किया है। पत्थरों पर की गई सोने सी कारीगरी के कारण ही पाषाण का काम सोने से भी महंगा माना जाता है और उन प्रतिमाओं पर अंकित सुत्रधारों के नाम गुम हुए शिल्पकारों को उनकी सही पहचान दिलाती है। इन जैन मंदिरों में मूर्तियां इतनी है जितनी कहीं के सौ मंदिरो में भी नहीं है। सभी प्रतिमाओं में शिल्पकारों की कला का सबसे उच्च स्तर देखने को मिलता है।
किले में आज भी लोक गायक दपू खां की आवाज कहीं न कहीं से सुनाई पड़ती है। दपू खान साहब ने ही अपनी गायकी से मूमल महेन्द्रा की अमर प्रेम कथा को जग भर में पहुंचाया है। आज भले दपू खान साहब इस दुनिया से रूखसत हो गये किन्तु उनकी आवाज आज भी जैसलमेर के किले में गूंजती रहती है। जल बिन सब सून, इस कहावत पर अमल करते हुए, जैसलमेर के महारावलों ने रेगिस्तान में जल के महत्व को भली भांति समझा, तभी तो उन्होने गड़सीसर तालाब खुदवाया और जैसलमेर की प्रजा की जलापूर्ति की समस्या का स्थायी समाधान किया। गडसीसर में बना टीलो की पोल समाज कल्याण के भाव को दर्शाता है जो रियासत काल में एक गणिका द्वारा बनवाया गया था।
जैसलेमर की बसाहट से कुछ दुर पर स्थित बड़ा बाग की सुनहरी छतरियां रेगिस्तान की तपन में हीरे की भांति चमकती प्रतीत होती है। उत्कृष्ट नक्काशियों से परिपूर्ण ये छतरियां महारावलों का स्मृति संग्रहालय है। महारावलों का यह खूबसूरत श्मशान प्रस्तर कला का सबसे बड़ा अजायबघर है। छतरियों का इतना विशाल स्मृति संसार शायद ही कहीं देखने को मिले। बड़ा बाग की छतरियों की कला को निहार कर जब पर्यटक कुलधरा के उस पुरानी बस्ती का रूख करता है तो उसे महसूस होता है कि पालीवालों ने रेगिस्तान के बीचों बीच कितनी सुंदर नगरी बसाई थी।
दशकों से जनशून्य हो चुका कुलधरा का गांव आज पर्यटकों से सर्वाधिक गुलजार नजर आता है। जैसलमेर से कुलधरा के समानांतर बसा लोद्रवा मूमल महेन्द्र की प्रेमकहानी का गवाह है। अमरकोट के राणा महेन्द्र और लुदरवे की मूमल की प्रेम कहानी गांव के कण कण में रची बसी है। यहां का जैन मंदिर की वास्तु शिल्प की अदभूत कारीगरी पर्यटकों को घंटो निहारने को विवश कर देती है। मंदिर में लगा इच्छापूर्ति करने वाला कल्पतरू के नीचे जाते ही आगतुंक अपनी अभिलाषा को पूर्ण करने का वरदान मांगता नजर आता है।
लोद्रवा से प्रारंभ होते रेत के धोरे सीधे सम की ओर ले जाते है। बालू के विशाल टीलो पर उछल कुद करती गाड़ियां और रेगिस्तान के जहाज पर शानदार सफर हर पर्यटक का सपना होता है। उंट की सवारी का असली आनंद तो रेत को धोरों पर ही मिलता है और यह शौक सम के सिवाय शायद ही कहीं पुरा हो पाता है। रात्रि को कालबेलियां नृत्य करती महिलाओं का नृत्य देख हर मन थिरक उठता है। इतनी सारी खूबियों से परिपूर्ण जगह सिर्फ और सिर्फ जैसलमेर ही हो सकता है जहां का हर कोना, हर इंसान और वो इमारत आपका खुशियों से स्वागत करती है जैसा स्वागत सत्कार बिरले ही नसीब होता है।
आज जैसलमेर के 867 वे स्थापना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
ओम प्रकाश सोनी
असिस्टेंट प्रोफेसर सुकमा







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