जैसलमेर के सोनार किले का इतिहास
जैसलमेर एक गौरवशाली ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाला राजस्थान का एक महत्वपूर्ण नगर है। बारहवी सदी में महारावल जैसलदेव ने इस नगर की स्थापना की थी। पश्चिमी सीमा पर बसा यह नगर लगभग आठ सौ सालों तक राजस्थान राज्य का ही नही अपितु समूचे भारत के सीमान्त प्रहरी के रूप में विख्यात रहा है।
जैसलमेर के पुराने नामों में वल्लमंडल और माड मिलता है। माड नाम अधिक विख्यात है। इस क्षेत्र के लिये माडधरा का विशेषण प्रयुक्त होता है। बस्तर में अबूझमाड़ियों का निवास क्षेत्र अबूझमाड कहलाता है। घने वनों से आच्छादित एवं दुर्गम भौगोलिक विषमताओं के कारण आसानी से वापस आना संभव नहीं है उसी प्रकार रेत के इस विशाल थार को माडधरा संबोधित किया जाता है। दुर दुर फैले रेत के टीले और घने वनों का अबूझमाड़ दोनों ही क्षेत्र अति कष्टदायक है। माड़धरा की बेटी माडेची और बेटा माडेचा कहलाता है। यहां के लोक संसार में महेन्द्र मूमल की प्रेमकहानी ऐसी रची बसी है कि लोकगीतों में मूमल के लिये माडेची शब्द ही आता है :-
म्हारी माडेची मूमल
हालैनी अमरांणै रे देस
जैसलमेर के शुष्क भौगोलिक परिवेश ने स्थानीय जनजीवन को अत्यधिक कठोर बना दिया है। स्थानीय लोग कठोर परिस्थितियों का सामना करते हुए साहसी हो गए है। इन लोगों के साहस से ही इस राज्य को कालान्तर में उत्तर भिड़ किवाड़ के नाम से पुकारा जाने लगा। भाटी राजपूतों की कीर्ति गाथा की गवाह यह माडधरा अपने गौरवशाली इतिहास और उनके मूक गवाह किलो और मंदिरों को संजोये हुए है। जैसलमेर क्षेत्र पर इन्ही भाटी राजपूतों का शासन रहा है। इसी वंश के चंद्रवंशी यादव रावल भाटी जैसल ने 1156 ई में जैसलमेर नगर तथा दुर्ग की स्थापना की थी।
राजा जैसल के नाम एवं मेरू (पहाड़) पर स्थित होने के कारण इसे जैसलमेरू या जैसलमेर कहते है। मेरू तीन कोनों की होने के कारण इसे त्रिकुटगढ़ भी कहते है। स्वर्ण की तरह पीले पाषाणों से निर्मित यह कलापूर्ण नगर आज विश्व के पर्यटन मानचित्र पर तीव्र गति से उभर आया है। जैसलमेर दुर्ग के पीले पत्थर प्रातकाल की किरणों में सोने सा चमक उठते हैं जिसके कारण इसे सोनार किला कहा गया है। यह सोनार किला मरुभूमि के शीश पर स्वर्ण मुकुट सा सुशोभित है। रावल जैसलदेव के बाद रावल शालिवाहन और मूलराज जयंत सिंह के काल तक दुर्ग का विकास होता रहा।
वर्तमान जैसलमेर शहर के मध्य 250 फीट की त्रिकोण पहाड़ी पर जैसलमेर दुर्ग स्थित है। 99 गोलाकार बुर्ज तथा बलखाते सांप की तरह बनी हुई बुर्जाकार दीवारों के उपर विशाल बेलनाकार व गोल गोल पत्थर रखे हुए है जो उस युग में दुर्ग की रक्षा हेतु हथियार के रूप में काम आते थे। दुर्ग के चार मुख्य दरवाजे है जिसमें प्रथम अखेपोल सन 1722 से 1761 के मध्य उस समय की आवश्यकतानुसार इस बनाया गया। दुसरी सूरजपोल, तीसरी गणेश एवं चौथा हवापोल जिसे महारावल भीम ने 1577 से 1613 में अपने शासनकाल में बनवाया था।
दुर्ग जैसलमेर के विशाल पीले चट्टानों से बना है। इसमें कहीं भी चुने एवं सीमेंट का उपयोग नहीं किया गया है। दुर्ग का निर्माण इस तरह से किया गया है कि दूर से आने वाले शत्रु को उसका प्रवेश द्वार दिखाई नहीं देता है। सूरजपोल के आगे वेरिसाल बुर्ज बना कर दुश्मन को दुर्ग का मुख्य द्वार खोजने हेतु बाध्य करना अपने आप में अनूठी बात है। इस भव्य दुर्ग का निर्माण भिन्न भिन्न चरणो में हुआ है।
बारहवी से चौदहवी सदी तक जैसलमेर पर अलाउद्दीन खिलजी और तुगलक सुलतानों ने हमले किये थे। दुर्ग में बने मंदिरों एवम भवनों को तोड़ दिया गया था। इन आक्रमणों के बाद दुर्ग पर मुसलमानों का अधिकार हो गया था।मुगलों के साथ जैसलमेर के शासकों के संबंध मधुर थे जिसके कारण यहां शांति छाई रही फलस्वरूप दुर्ग में कई मंदिरों एवम भवनों का पुन निर्माण हुआ।
ओम प्रकाश सोनी
असिस्टेंट प्रोफेसर सुकमा
संदर्भ पुस्तके
1 जैसलमेर राज्य का सामाजिक इतिहास — डा मेघाराम गढ़वीर
2. जैसलमेर की सांस्कृतिक धरोहर — डा रघुवीर सिंह भाटी
3. जैसलमेर की हवेलियां — नंद किशोर शर्मा
4. सुनहरा नगर जैसलमेर — नंद किशोर शर्मा






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