Saturday, 2 February 2019

रोचक तथ्यों के साथ महाराजा रणजीत सिंह का परिचय

महाराजा रणजीत सिंह .....!

आधुनिक पंजाब के निर्माण का श्रेय सुकरचकिया मिसल के प्रधान रणजीत सिंह को जाता है। महाराजा रणजीत सिंह का जन्म 13 नवंबर 1780 ई में गुजरानवाला में हुआ। रणजीत सिंह भारत के अन्य सम्राटों के तरह किसी प्राचीन राजवंश से संबंधित नहीं थे और ना ही इनके पूर्वज कोई राजा महाराजा थे। इनके पूर्वज तो साधारण सिक्ख सरदार थे। बचपन में चेचक के कारण इनकी एक आंख की रोशनी जाती रही। साधारण परिवार में जन्मे रणजीत सिंह ने अपनी सुझबूझ, इच्छाशक्ति के चलते सभी मिसलों को एकत्रित कर आधुनिक पंजाब राज्य की स्थापना थी। रणजीत सिंह की वंश जागीर सुकरचकिया मिसल थी।

नादिर शाह के आक्रमण के बाद सिख शक्ति को काफी नुकसान पहुंचा था। कपूरसिंह ने सिक्खों को जत्थों के रूप में संगठित किया और उन्हे दल खालसा का नाम दिया। कपूरसिंह की मृत्यु के बाद दल खालसा जस्सासिंह अहूलवालिया के नेतृत्व में 12 स्वतंत्र मिसलों में विभक्त हो गया। मिसल एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ है एक जैसा या समान।
Maharaja Ranjit Singh 1800-39 Water colour on ivory laid on card Credit: The Royal Collection Trust

इन  12 मिसलों में एक मिसल सुकरचकिया मिसल थी। इस मिसल का प्रभाव रावी और चिनाब नदियों के बीच था। सुकरचकिया मिसल के प्रधान महासिंह थे। महासिंह के पुत्र हुये रणजीत सिंह। रणजीत सिंह की माता जींद के राजा गजपति सिंह की पुत्री राजकौर थी। 1792 ई में रणजीत सिंह बारह वर्ष के थे तभी इनके पिता महासिंह की मृत्यु हो गई। 1792 ई में इनकी माता, सास सदाकौर और दीवान लखपतराय ने प्रतिशासन परिषद का गठन कर शासन संचालन किया। रणजीत सिंह अपनी सास सदाकौर के नियंत्रण में थे। इनकी सास कन्हैया मिसल की थी। रणजीत सिंह का पहला विवाह सदाकौर की पुत्री मेहताब कौर से हुआ था।


Mehtab Kaur

 ये अपनी सास के नियंत्रण से निकलना चाहते थे। इनकी सास ने शिक्षा दीक्षा का भी कोई प्रबंध नहीं किया था। 1797 ई में रणजीत सिंह ने शासन का भार अपने हाथो में ले लिया। 1798 ई में पंजाब से लौटते समय अफगान के शासक जमान शाह जो कि अहमदशाह अब्दाली का पौत्र था। उसकी 12 तोपे चिनाब नदी में गिर गई थी। रणजीत सिंह ने उसमें से 08 तोपे निकलवा कर पेशावर भिजवा दी। इसके बदले जमानशाह ने रणजीत सिंह को राजा की उपाधि दी और लाहौर की सुबेदारी प्रदान की।

रणजीत सिंह ने 1805 ई में भंगी मिसल से लाहौर और अमृतसर छिनकर लाहौर को अपनी राजधानी बनाई। 1808 ई में उसने सतलज पार के कोटला अंबाला, फरीदकोट  और मालेर को जीत लिया। पुराने सिक्ख सरदारों को ही बड़ा जागीरदार एवं जमींदार बनाकर अपना राज कायम किया। 1809 ई में कांगड़ा के डोगरा सरदार संसारचंद पर जब गोरखा सरदार अमरसिंह ने आक्रमण किया तो संसारचंद्र ने रणजीत सिंह से मदद मांगी। रणजीत सिंह ने सेना भेजकर कांगड़ा पर अधिकार कर लिया। उत्तर पश्चिम में विस्तार करते हुये रणजीत सिंह 1813 ई में अटक, 1818 ई में मुल्तान, 1819 ई में कश्मीर को जीत लिया। 

रणजीत सिंह ने युरोपीय प्रशिक्षको अलार्ड, वेंटूरा व कोर्ट, गार्डनर, एवं अविटेबिल के मदद से युरोपीय ढर्रे पर शक्तिशाली, अनुशासित और सुसज्जित फौज तैयार की। उसकी नई फौज न केवल सिक्खों तक सीमित थी वरन उसमें गोरखा बिहारी पठान उडिया डोगरा और पंजाबी मुसलमानों की भी भर्ती की। रणजीत सिंह सैनिक आदेश फ्रांसीसी में देता था। 1822 ई में अलार्ड और वेन्टूरा के द्वारा फौज ए खालसा नामक आदर्श सेना का गठन किया।  कहा जाता है कि उसकी फौज एशिया की दुसरी सबसे अच्छी फौज थी। इसे फौज ए आईन के नाम से जाना जाता था। हरिसिंह नलवा इसके प्रधान सेनापति थे। पहला स्थान अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की फौज का था। धर्म के मामले में रणजीत सिंह बेहद सहनशील तथा उदारवादी था।

ने केवल सिक्ख बल्कि मुसलमान तथा हिन्दु संतो को भी वह सम्मान आदर एवं संरक्षण देता था। कहा जाता है कि अपने सिंहासन से उतर कर मुसलमान फकीरों के पैरों की धुल अपनी लंबी सफेद दाढ़ी से झाड़ता था। दीनानाथ और भवानीदास उसके वित्त मंत्री थे। फकीर अजीजुददीन उसका विश्वसनीय विदेश मंत्री था। मोहकमचंद उसके दीवान थे। ध्यानसिंह डोगरा उसका प्रधानमंत्री था। नूरूददीन शाही परिवार विभाग का मंत्री था। 
रणजीत सिंह ने सभी मिसलों को संगठित करने के लिये अपने राज्य को सरकार ए खालसा नाम दिया। और नानकशाही सिक्के चलाये। इन्होने अपने पंजाब राज्य को चार प्रांतों में बांटा था लाहौर, कश्मीर मुल्तान तथा पेशावर। फं्रासीसी लेखक विक्टर जैक्वीमों ने रणजीत सिंह को एक असाधारण पुरूष व छोटे पैमाने पर बोनापार्ट कहा है। रणजीत सिंह भारत के प्रथम शासक थे जिन्होने सहायक संधि को स्वीकार नहीं किया और न ही कभी अंग्रेजों के सामने समर्पण किया।

1809 में अंग्रेजों ने रणजीत सिंह को सतलज पार करने से मना कर दिया और नदी के पूरब के सिक्ख राज्यों को अपने संरक्षण में ले लिया तब उसने चुप्पी साध ली। वे अंग्रेजों से सीधे टकराव से बचना चाहते थे। रणजीत सिंह ने 25 अप्रैल 1809 को लार्ड मिन्टों के दूत चाल्र्स मेटकाफ से अमृतसर की संधि की। इस संधि से रणजीत सिंह ने सतलज के पूर्व में अपने दावों को छोड़ दिया। रणजीत सिंह को उत्तर में साम्राज्य विस्तार की छुट दी गई। अपने राजनयिक सुझबूझ से रणजीत सिंह ने अपने राज्य को अंग्रेजों के अतिक्रमण से बचा लिया। मगर वे विदेशी खतरे को हटा नहीं सके और उसके खतरे को अपने उत्तराधिकारियों के लिये छोड़ दिया।

महाराजा रणजीत सिंह को कोहीनूर हीरा कैसे मिला इससे संबंधित एक रोचक जानकारी जुड़ी हुई है। गोलकुंडा के सिपहसलार मीर जुमला ने कोहिनूर हीरा शाहजहां को भेंट दिया था। शाहजहां ने कोहिनूर को अपने सिंहासन तख्ते ताउस में जड़वा दिया। नादिरशाह ने जब भारत पर आक्रमण किया तो वह तख्ते ताउस को लूट कर ले गया। नादिरशाह से यह हीरा उसके उत्तराधिकारी अहमदशाह को मिला। बाद में यह हीरा अहमदशाह के वंशज शाह जमान के पास था। यह अफगानिस्तान का शासक था।

जब जमान शाह कश्मीर में बंदी बनाया गया था तब महाराजा रणजीत सिंह ने यह हीरा उससे मांगा। शाह ने बहाना बनाकर कहा कि वह किसी महाजन के यहां गिरवी रखा हुआ है। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक रणजीत सिंह ने शाह से मिलने आने वाले एवं उसके खाने पीने पर प्रतिबंध लगा दिया और सालेपिल ग्रिफीन के अनुसार भूखे मरने के कारण शाह ने कोहिनूर रणजीतसिंह को दे दिया। कुछ लेखकों के मतानुसार शाह की बेगम से रणजीत सिंह को कहा कि आप अफगानिस्तान का शासन फतेह खां का ना सौंपे और आप मेरे पति की रक्षा करे तो मैं आपको कोहिनूर हीरा दे दूंगी। इस प्रकार रणजीत सिंह को कोहिनूर हीरा मिला।

लगभग 42 वर्ष शासन करने के बाद रणजीत सिंह ने अपने पुत्रों खडगसिंह नौनिहाल सिंह शेरसिंह  में खडगसिंह को अपना उत्तराधिकारी चुना। खड़गसिंह का अपने मृत्यू पूर्व राजतिलक कर राज्य की बागडोर खड़गसिंह के हाथो सौंप दी। ध्यानचंद को उसका प्रधानमंत्री बनाया गया। कहा जाता है कि अपने मृत्यु से पूर्व लगभग 25 लाख रू. की संपत्ति तथा 22 लाख रू. फकीरो संतो एवं संस्थाओ को नकद दान दिया गया। कांगड़ा में ज्वालामुखी मंदिर में ढाई मन घी भेजा गया।

ध्यानसिंह ने दस लाख रूपये का एक चबूतरा बनवाया और उस पर दस हजार के शाल बिछवाये गये। महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद उनके शव को उसी चबूतरे पर रखा गया। कहते है रणजीत सिंह ने अपने मृत्यु से पूर्व कोहिनूर जगन्नाथ जी या अमृतसर के मंदिर को दान देने का विचार किया था।

27 जून 1839 ई में महराजा रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई। पंजाब का सिरमौर चला गया। रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद उनके राज्य का भाग्य भी निम्नतम स्तर पर आ गया। अंग्रेजों ने अपने कुटील चालों एवं रणजीत सिंह के परिवार की आपसी फूट का फायदा उठाकर पंजाब पर अधिकार स्थापित कर लिया और वह कोहिनूर हीरा महारानी विक्टोरिया को स्वागत में दे दिया जो आज भी ब्रिटेन की महारानी के ताज में जड़ा हुआ है।

संदर्भ:- 
1. महाराजा रणजीत सिंह - अशफाक अहमद अनंत
2 रणजीत सिंह - खुशवंत सिंह
3. आधुनिक भारत का इतिहास - विपिन चंद्र पाल
4. भारतीय इतिहास - प्रेमप्रकाश एवं निर्मल कुमार

ओम प्रकाश सोनी
दंतेवाड़ा बस्तर छ0ग0

1 comment:

  1. Betturkey giriş adresine buradan ulaşabilirsiniz.
    betturkey giriş
    CDB

    ReplyDelete

आदित्य नायक ने बनवाया था गुरुर का काल भैरव मंदिर

बारहवीं सदी में छत्तीसगढ़ के कल्चुरी और बस्तर के नागवंश के मित्रता और शत्रुता के काल में एक राजवंश का उदय हुआ। वह राजवंश था कांकेर क्षेत्र क...