मांडू की पहचान - होशंगशाह का मकबरा.....!
तैमूरलंग के आक्रमण के बाद मालवा के सूबेदार दिलावर खां गोरी ने 1401 में अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। दिलावर खां संभवतः फिरोज तुगलक द्वारा मालवा का सूबेदार नियुक्त किया गया था।
1405 में उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र अल्प खां , होशंगशाह के नाम से मालवा की गद्दी पर बैठा। होशंगशाह ने धार की जगह मांडू को अपनी राजधानी बनायी। उसने 27 वर्ष के अपने शासन अवधि में मांडू को मध्य भारत का महत्वपूर्ण शक्ति केन्द्र बना लिया था।
होशंगशाह ने मांडू मे जामा मस्जिद, दिल्ली दरवाजा और अपना स्वयं के मकबरे का निर्माण कार्य प्रारंभ कराया। होशंगशाह की मृत्यु के बाद उसके पुत्र महमूद शाह ने मकबरे का निर्माण पुरा कराया। (संदर्भ -मांडू - डी आर पाटिल)
होशंगशाह के लिये नियति ने कुछ और ही सोच रखा था। उसकी मृत्यु उसके बसाये शहर होशंगाबाद मे हुई और वही उसकी कब्र है। मांडू मे उसका मकबरा सिर्फ उसके नाम पर ही रह गया।
होशंगशाह का मकबरा भी इसके नाम के अनुरूप ही बेहद ख्यातिनाम हैं। जामी मस्जिद के पीछे एक उंचे प्लेटफार्म पर बना यह भव्य मकबरा संगमरमर से बना पहला पूर्ण मकबरा है। इस मकबरे की खासियत इसका विशाल गुम्बद है।
यह बेहद ही विशाल एवं भव्य है। इसके चारो तरफ चार उपगुम्बद बने हुए हैं। मकबरे का प्रवेशद्वार विशाल है। इसके किनारे पर पुष्पाकृतियां बनी हुई है। मकबरे मे रोशनदान की जालियां भी काफी आकर्षक है।
इस मकबरे मे 1659 ईस्वी का एक शिलालेख लगा हुआ था। उस शिलालेख के मुताबिक शाहजहाँ के चार वास्तुकार यहाँ श्रद्धांजलि अर्पित करने आये थे। उनमे से एक वास्तुकार उस्ताद हमीद भी था जो कि ताजमहल का मुख्य वास्तुकार था।(संदर्भ- याजदानी धार इन्स्क्रिपशन)
इस मकबरे के पास ही स्तम्भो पर आधारित धर्मशाला है जिसके छज्जो पर अश्व गज जैसे अन्य हिन्दु शिल्पो का प्रयोग देखने को मिलता हैं। जामी मस्जिद के छोटे छोटे गुम्बदो की कतार भी देखने योग्य हैं।
ओमप्रकाश सोनी दंतेवाड़ा













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