मध्यकालीन मांडू का इतिहास....!
दसवी से चौदहवी सदी के प्रारंभ तक मालवा परमार शासकों के अधीन बेहद ही शक्तिशाली एवं समृद्ध था। तेरहवी सदी के अंत में दिल्ली के खिलजी शासकों के आक्रमणों के बाद से मालवा पर मुस्लिम शासकों ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली। 1294 ई के आसपास मांडू को जलालुददीन खिलजी का कोप भाजन बनना पड़ा। इसके बाद अलाउददीन खिलजी ने 1305 ई में मालवा और जालौर को अपने साम्राज्य में मिलाने के लिये के आईन उल मुल्क मुल्तानी को आक्रमण करने भेजा।
मालवा में कोकदेव या गोगादेव नामक हिन्दु सेनापति ने इस आक्रमण का प्रतिरोध किया किन्तु जल्द ही वह मारा गया। कोकदेव ने मांडू में लोहानी गुफा क्षेत्र में एक मंदिर भी बनवाया था जहां से उसके नाम से उल्लेखित एक शिलालेख प्राप्त हुआ है। आईन उल मुल्क ने उज्जैन, धार , मांडू तथा चंदेरी पर अधिकार स्थापित कर लिया। इस आक्रमण ने मांडू पर मुस्लिम शासन की नींव रख दी थी। 1398 ईस्वी तक मालवा प्रान्त दिल्ली के सुल्तानों के अधीन रहा।
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| फूलों के बीच जहाजमहल |
तैमुर लंग के आक्रमण के बाद मालवा के सुबेदार दिलावर खां गोरी ने 1401 में अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। दिलावर खां संभवतः फिरोज तुगलक द्वारा सुबेदार नियुक्त किया गया था। हालांकि उसने स्वयं सुल्तान की उपाधि धारण नही की। दिलावर खां ने धार को अपनी राजधानी बनायी । कभी कभी वह मांडू में भी अपना दरबार लगाता था। मांडू में दिलावर खां द्वारा बनवाई गई एक मस्जिद और तारापुर द्वार ही आज देखने को मिलते है।
1405 में उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र अल्प खां होशंगशाह के नाम से मालवा की गददी पर बैठा।होशंगशाह ने धार की जगह मांडू को अपनी राजधानी बनायी। 27 वर्ष के अपने शासन अवधि में मांडू को मध्य भारत का महत्वपूर्ण शक्ति केन्द्र बना लिया था। मालवा की सीमायें गुजरात, जौनपुर और दिल्ली की सीमाओं को छुने लगी थी। गुजरात के शासक बहादुर शाह के आक्रमण के बाद भी होशंगशाह ने मांडू पर पुनः अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। होशंगशाह ने मांडू में जामी मस्जिद और अपना स्वयं को मकबरा बनवाया जो आज भी दर्शनीय है।
1435 ई में होशंगशाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र गाजी खां महमूद शाह की उपाधि लेकर मांडू के तख्त पर आसीन हुआ। महमूद शाह बेहद ही अयोग्य एवं निर्बल शासक था। उसके वजीर महमूद खां ने उसे सत्ता से पदच्यूत कर राजगददी हड़प ली। इस प्रकार मांडू में गोरी शासन का पतन हो गया।
महमूद ने शाह की उपाधि के साथ मांडू में खिलजी राजवंश की सत्ता स्थापित की। महमूद शाह ने 33 साल के अपने शासनकाल में गुजरात के अहमदशाह, बहमनी के महमूद शाह तृतीय और मेवाड़ के राणा कुंभा के विरूद्ध युद्ध किये। राणा कुंभा के साथ यह युद्ध शायद अनिर्णित रहा क्योंकि राणा कुंभा ने चित्तौड़ मे इस जीत के उपलक्ष्य में विजय स्तंभ बनवाया वहीं महमूद ने मांडू में सात मंजिला भवन बनाया।
फरिश्ता के कथनानुसार वह नम्र,वीर , न्यायप्रिय शासक था। शायद ही कोई वर्ष बीता हो उसने युद्ध ना किया हो , इसीलिये कहा जाता है कि उसका खेमा ही उसका घर,और युद्धक्षेत्र ही उसका विश्राम स्थल बन गया था।
1469 ई में महमूद की मृत्यु उपरांत उसका पुत्र ग्यासूददीन खिलजी के नाम से सिंहासन पर बैठा। यह बेहद धार्मिक व्यक्ति था। 31 वर्ष के शासन काल में इसका पारिवारिक जीवन काफी कलहपूर्ण बीता। इसके काल में मांडू के स्थापत्यकला का स्वर्णिम काल था। इसने मांडू में जहाजमहल, बाजबहादुर के महल जैसी भव्य ईमारते बनवाई।
इसके खुद के पुत्र नासिरूददीन ने 1500 ई में इसेे विष देकर मार डाला और सिंहासन हस्तगत कर लिया। 1510 ई में अत्यधिक मदिरा के नशे के कारण नासिरूददीन झील में डूबकर मर गया। उसके बाद इसका पुत्र महमूद द्वितीय तख्त पर बैठा।
इसने चंदेरी के राजपूत मेदिनीराय को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया। किन्तु दरबार में राजपूतों के बढ़ते प्रभाव के कारण अमीरो में असंतोष की भावना पनपने लगी। अमीरों ने गुटबंदी कर गुजरात के मुज्जफर शाह द्वितीय से मेदिनीराय के विरूद्ध मदद मांगी। मेदिनीराय ने राणा सांगा के मदद से सुल्तान महमूद द्वितीय को ही पराजित कर बंदी बना लिया।
किन्तु राणा सांगा ने अत्यधिक उदारता का परिचय देते हुये उसे रिहा करके उसे उसका राज्य भी वापस लौटा दिया। इसके शासन काल में मांडू में बनी हुई तीन इमारते आज भी देखने को मिलती है। इसमें गदाशाह का महल, गदाशाह की दुकान, और दरिया खान की मस्जिद। गदाशाह के महल से दो पेंटिंग प्राप्त हुई थी जो कि मेदिनीराय और उसकी रानी की पेंटिंग मानी गई।
महमूद ने गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के छोटे भाई चांद खां को शरण दे दी थी जिसके फलस्वरूप 1531 ई में बहादुर शाह ने मालवा पर आक्रमण कर मालवा को अपने गुजरात राज्य में मिला लिया। 1535 ई में हुमांयू ने गुजरात पर आक्रमण कर मालवा समेत गुजरात को मुगल साम्राज्य में मिला लिया। हुमायूं के बाद शेरशाह के शासनकाल तक मांडू दिल्ली के अधीन बना रहा।
शेरशाह ने सुजात खां को मालवा का सुबेदार नियुक्त किया। सुजात खां के बाद उसका पुत्र बाजबहादुर मालवा का सुबेदार बना। दिल्ली में इस्लामशाह सुर के अराजक शासन का लाभ उठाकर यह मालवा का स्वतंत्र सुल्तान बन बैठा।
बाजबहादुर मांडू का सर्वाधिक लोकप्रिय शासक था। रानी रूपमती और बाजबहादुर की प्रेमगाथा आज भी मालवा के लोकगीत में रची बसी हुई है। शासन के शुरूआती दौर में यह काफी आक्रमक था। गढ़ मंडला की रानी दुर्गावती से युद्ध में पराजित होने के बाद इसने राज्य विस्तार के विपरित रचनात्मक कार्यो में ध्यान केन्द्रित किया। बाज बहादुर एक उच्च कोटि का संगीतकार था। 1561 ई में मुगल सम्राट अकबर ने आधम खां के नेतृत्व में मालवा पर आक्रमण करने के लिये सेना भेजी।
बाजबहादुर और आधम खां के बीच सारंगपुर में टकराव हुआ। बाजबहादुर युद्ध के मैदान से भाग खड़ा हुआ किन्तु रानी रूपमती आधम खां के हाथ लग गई। रानी रूपमती ने अपना सतीत्व बचाने के लिये आत्महत्या कर ली। सारंगपुर में रानी रूपमती का मकबरा बना हुआ है। बाद में बाजबहादुर को भी अपनी प्रेयसी के पास ही दफनाया गया था। बाजबहादुर के काल में मांडू मे बना रेवाकुंड और पहाड़ी पर बना रानी रूपमती का झरोखा बेहद महत्वपूर्ण इमारत है। बाजबहादुर ने अपना आखिरी समय अकबर की सेवा में बिताया। अकबर ने बाजबहादुर को दो हजार का मनसब दिया था।
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| रानी रूपमती का झरोखा |
मुगलों के काल में मांडू अपनी चमक खोने लगा था। दक्कन पर हमलें के लिये जाते समय अकबर मांडू में चार बार रूका था। अकबर का एक शिलालेख मांडू से प्राप्त हुआ है। मांडू महमूद खिलजी के मकबरे के मरम्मत का श्रेय भी अकबर को ही है। अकबर के अधीन मांडू के किलेदार बुडगशाह ने मांडू में नीलकंठ महल बनवाया था।
अकबर के बाद जहांगीर भी मांडू में लगभग सात माह तक रहा था। जहांगीर को मांडू का नैसर्गिक सौंदर्य बेहद ही पसंद आया था। जहांगीर अपनी बेगम नूरजहां के साथ मांडू आया था। जामी मस्जिद के सामने बने अशर्फी महल के साथ नूरजहां और जहांगीर की जनश्रूति जुड़ी हुई है।
जहांगीर के बाद शाहजहां दो बार मांडू आया था। शाहजहां ने ताजमहल के निर्माण से पूर्व शिल्पकारों को मांडू के होशंगशाह के मकबरे को देखने के लिये भेजा था जिसका एक शिलालेख आज भी मांडू में सुरक्षित है। मुगलों ने मांडू में ईमारतों के निर्माण को कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। बाजबहादुर के मृत्यु के बाद मांडू का भाग्य भी निम्नतम स्तर पर आ गया।
मराठा शासन काल में मल्हार राव होलकर ने 1732 ईस्वी में मांडू के मुगल सुबेदार दियाबहादुर को तिरला के युद्ध में पराजित कर मांडू को मराठा साम्राज्य में मिला लिया। मल्हार राव ने धार और मांडू को पवारों के हवाले कर दिया।
पवार अपने को प्राचीन परमार राजवंश का वंशज मानते है। परमारों ने ही मांडू में सर्वप्रथम अपना राज स्थापित किया था। भाग्यचक्र पुन ऐसा घुमा कि उसी राजवंश के पास मांडू वापस आ गया। पवारों के समय मांडू के ईमारतों के देखरेख होती रही जिसके कारण आज मांडू पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है।
संदर्भ:- 1. दिल्ली सल्तनत 711 ई से 1526 ई आर्शीवादीलाल श्रीवास्तव
2. मांडू सिटी आफ जाॅय - एस0सी0 पाठक
3. मोनूमेन्टस आफ मांडू - ए0पी0 सिंह
4 याजदानी - द इनस्क्रिप्शन आफ धार एंड मांडू
5 मांडू आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया - डी आर पाटिल
लेख - ओम सोनी दंतेवाड़ा।




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