धार दुर्ग का अनजाना इतिहास......!
सदियों से धार नगर की सुरक्षा का भार उठाये हुये धार का यह दुर्ग (किला) परमारयुगीन गौरवशाली इतिहास का साक्षी रहा है। सल्तनत कालीन उठापटक से लेकर ब्रिटिशकाल की कुटिल चालों के बीच बहुत सी क्षतियों को सहते हुये आज भी शान से खड़ा है। इस दुर्ग ने राजा भोज के समृद्धशाली शासन को बेहद ही करीब से महसूस किया है। मध्यकाल में खिलजी और गौर सुल्तानों के आपसी झगड़ो का भी गवाह यही किला है। धार दुर्ग ने मुगलों का स्वागत किया तो इसी किले के अंदर पेशवा बाजीराव द्वितीय का जन्म भी हुआ है। अंग्रेजों ने तो इस किले को नेस्तोनाबूद करने की सौगंध ही खा ली थी किन्तु सौभाग्यवश यह किला अपना अस्तित्व बचाने में कामयाब रहा।
इस किले के प्राचीन इतिहास को देखने के लिये हमें हजार साल पीछे जाना आवश्यक हो जाता है। 1010 ई से 1055 ई तक राजा भोज के काल में धार का वैभव चरम सीमा पर रह। राजा भोज के काल में धार देवालयों, फव्वारों, और उदयानों से सुसज्जित था। राजा भोज के काल में यह दुर्ग धारागिरी लीलो्दयान के नाम से प्रसिद्ध था। परवर्ती परमार शासकों के समय इस लीलोदयान का दुर्गीकरण किया गया था। तेरहवी सदी में परमारों के प्रधानमंत्री गोगा चैहान से इसे महत्वपूर्ण सैन्य केन्द्र के रूप में विकसित किया था।
1305 ई में मालवा विजय के बाद अलाउददीन खिलजी ने आईन उल मुल्क को मालवा का सुबेदार नियुक्त किया। आईन उल मुल्क ने आक्रमण के दौरान इस किले के प्रवेशद्वार को तोड़ कर दुर्ग पर कब्जा कर लिया। आईन उल मुल्क ने इस किले को मैदानी दुर्ग के रूप में विकसित कराया। इस किले का पुर्ननिर्माण आईन उल मुल्क ने प्रारंभ कराया और मुहम्मद तुगलक के काल में यह लगभग तीस वर्षो में पूर्ण हुआ। दिल्ली सुल्तानों के समय किले में सैनिकों के बैरक और आवासीय भवनों का निर्माण कराया गया।
मध्यकाल में पंद्रहवी सदी के प्रारंभ तक दिलावर खां गोरी के समय तक शासन की सारी गतिविधियां धार के इस किले से संचालित होती थी। होशंगशाह के शासक बनते ही 1407 में गुजरात के सुल्तान मुजप्फर शाह ने आक्रमण कर दिया। होशंगशाह ने भागकर इसी किले में शरण ली। मुजफरशाह ने होशंगशाह को बंदी बनाकर किले का शासन भार अपने भाई नुसरतशाह को सौंप दिया। मालवी सैनिकों के आक्रमण के कारण नुसरतशाह को किले को छोड़कर भागना पड़ा।
बाद में मुजफफर शाह ने अहमदशाह को आक्रमण के लिये भेजा। अहमदशाह ने फिर से धार नगर पर कब्जा कर लिया। 1531 में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने धार किले पर अधिकार कर लिया था। इस प्रकार सल्तनत काल से मध्यकाल तक इस किले की दीवारों ने बहुत से आक्रमणों को झेलते हुये मुगलकाल में भी अपना महत्व बनाये रखा। मुगलों में अकबर, जहांगीर और शाहजहां ने कई बार धार आये और इसी दुर्ग में अपने पैरों को विश्राम दिया।
मुगलों के काल तक अपनी महत्ता बनाये रखने में कामयाब यह दुर्ग 18 वी सदी में पवारों के हाथो में आ गया। 1735 में पेशवा ने धार दुर्ग को आनंदराव पवार को दे दिया। उसका उत्तराधिकारी यशवंतराव पवार 1761 ई में पानीपत के युद्ध में मारा गया। मराठों के काल में इस दुर्ग की मरम्मत करवायी गई। मराठो ने इस किले में ही खरबूजा महल का निर्माण कराया गया।
पूना के पेशवा राघोबा ने अपने पत्नी आनंदीबाई को सुरक्षा कारणो से धार दुर्ग में भेजा। आनंदीबाई अपने समय की अद्वितीय सुंदरी और महत्वाकांक्षी महिला थी। इसी दुर्ग में खरबूजा महल में आनंदीबाई ने पेशवा बाजीराव द्वितीय को जन्म दिया। अंग्रेजों की योजना थी कि इस दुर्ग को पुरी तरह से तोड़ दिया जाये किन्तु सौभाग्य से नगर के मध्य प्राचीन स्थापत्य कला की यह विरासत बची रह गई।
किले के बुर्ज बड़े ही मजबूत और संतुलित है। किले में प्रवेश करने के लिये तीन द्वार बने हुये है। यह किला वैसे तो मैदानी दुर्ग है फिर भी धरातल से इसे कुछ उंचाई पर ही बनाया गया है। हजार साल के कालखंड में इस किले ने बहुत से उतार चढाव देखे। कई आक्रमणों के बावजूद भी यह किला नजरों से नजर मिलाते हुये पुरे शान से खड़ा है।
संदर्भ:- धार एंड मांडू - लार्ड मेजर
मौलाना कमालुददीन चिश्ती और उनका युग - रामसेवक गर्ग
आर्कियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया
ओम सोनी दंतेवाड़ा








where please? Not a word of English anywhere, OM. THanks
ReplyDeleteDhaar near maandu
ReplyDeleteHistory of dhar Fort
ReplyDelete