रानी रूपमती और बाजबहादुर की अमर प्रेमगाथा.......!
मांडू में प्राकृतिक एवं पुरातात्विक सौंदर्य के अलावा पर्यटकों को बाज बहादुर और रानी रूपमती की प्रणयगाथा भी काफी प्रभावित करती है। यहां आने के बाद हर कोई दोनों की अमर प्रेमगाथा को जानने में दिलचस्पी जरूर लेता है। मांडू में बाज बहादुर का महल और रानी रूपमती का झरोखा इन दोनों के अमर प्रेम का जीवंत साक्षी है। यहां के हर कोने कोने में दोनों का नाम सुनने को मिलता है। यहां के हर पत्थर पर दोनों की प्रेम कथायें लिखी हुई मिलती है। यहां के हर शख्स से रानी रूपमती और बाजबहादुर से जुड़ी कई बाते जानने को मिलती है। मालवा क्षेत्र के कई लोकगीतों में बाज बहादुर और रानी रूपमती की प्रेम कहानी आज भी अमर है।
रानी रूपमती के बारे में जानने की कोशिश करते है तो सबसे पहला प्रश्न यही आता है कि रूपमती कौन थी हमारा इतिहास इसकी वास्तविक जानकारी देने में अब भी मौन है। कुछ खोजबीन करने से मालूम होता है कि रूपमती मालवा के सारंगपुर क्षेत्र में फूलपुर ग्राम की ब्राहमण कन्या थी। फूलपुर ग्राम में यदुराय नामक ब्राहमण रहता था। वह संगीत का जानकार व्यक्ति था। बस उसी की कन्या का नाम रूपमती था। अपने पिता की तरह उसे भी संगीत से बहुत प्रेम था। वीणा को बजाते हुये उसकी उंगलियां पुरे वातावरण में जितनी मधुर धुन बिखेरती थी उससे कई गुना अधिक वह रूप सुंदरी भी थी। उसका नाम ही उसके गुणों को चरितार्थ करता था। कहा जाता है कि स्वर्ग की अप्सरायें भी रूपमती के सौंदर्य से ईष्र्या करती थी।
बाजबहादुर मालवा का अंतिम स्वतंत्र शासक था। इसके पिता सुजातखां शेरशाह द्वारा नियुक्त मालवा का सुबेदार था। इसका वास्तविक नाम मलिक बायजीद था। 1661 ई में वह मांडू के सिंहासन पर बैठा। बेहद लोकप्रिय शासक होने के साथ-साथ वह कला का भी पुजारी था। उसे संगीत से बहुत प्रेम था।
यदुराय के यहां एक दिन जलसे का आयोजन किया गया था जिसमें बाजबहादुर को आमंत्रित किया गया था। यहीं पर बाजबहादुर ने रूपमती को पहली बार देखा था। रूपमती के सौंदर्य को देखकर बाजबहादुर रूपमती पर मोहित हो गया था। इसके बाद एक दिन बाजबहादुर आखेट पर निकला। जंगल में रूपमती के हाथों से निकलती संगीत की मीठी तान को सुनकर वह रूपमती की तरफ खींचा चला गया। उसने रूपमती को विवाह का प्रस्ताव दिया। रूपमती ने बाज बहादुर के सामने यह शर्त रखी कि विवाह के उपरांत भी मैं अपना जीवन हिन्दु धर्म और उसकी संस्कृति का पालन करूंगी। इस शर्त को स्वीकार करने के बाद बाज बहादुर ने रूपमती से विवाह कर लिया।
बाजबहादुर के शासन पर अकबर की दृष्टि लगी हुई थी। अकबर ने 1561 ई में आधम खां के नेतृत्व में बाज बहादुर पर आक्रमण करने के लिये सेना भेजी। दोनों पक्षों के मध्य सारंगपुर नामक जगह में युद्ध हुआ। बाजबहादुर को युद्ध के मैदान से पीछे हटना पड़ा किन्तु रूपमती पकड़ी गई। अपनी सतीत्व को बचाने के लिये रूपमती ने जहर खाकर आत्म हत्या कर ली। एक अन्य जनश्रूति के मुताबिक आधम खां जीतकर मांडू आ पहंुचा। आधम खां रानी रूपमती को पाना चाहता था। रानी रूपमती ने चतुराई दिखाते हुये आधम खां को संदेशा भेजा कि मैं पूर्ण श्रंृगार करके खुद को तुम्हें सौंप दूंगी। रानी रूपमती ने पूरा श्रंृगार किया और पान मूंह में डाला। उसने पान में हीरे को पीसकर डाला था। पान खाते ही उसके पुरे शरीर में जहर फैल गया । आधम खां को रानी रूपमती की सिर्फ लाश ही मिली।
कुछ लोगों की मान्यता है कि सारंगपुर का मकबरा रानी रूपमती और बाजबहादुर की कब्र पर बना हुआ है। रानी रूपमती के मरने के बाद बाज बहादुर की अंतिम इच्छानुसार उसे भी उसके बगल में दफनाया गया था।
उन्हे मरे हुये आज भले ही चार सदियां बीत गई किन्तु उनकी प्रेम कहानी सदियों के लिये अमर हो गई है। बाजबहादुर का महल, रानी रूपमती का झरोखा, रेवाकुंड और जहाज महल के संग्रहालय में रखी बाज बहादुर और रानी रूपमती की यह छविचित्र दोनों की अमर प्रेम गाथा के जीवंत गवाह है।
ओमप्रकाश सोनी दंतेवाड़ा

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