धार की लाट में छिपी है कहां राजा भोज कहां गंगू तेली की कहानी.....!
कहां राजा भोज कहां गंगू तेली इस सदियों पुरानी कहावत का प्रयोग किसी की वास्तविक सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति बताने के संदर्भ में ही प्रयोग होते देखा है। प्रायः हम सभी ने यह कहावत कहीं ना कही अवश्य सुनी है। इस कहावत का एक पक्ष तो यह स्पष्ट कर देता है कि यह निश्चित तौर पर राजा भोज से ही जुड़ी है और दुसरे पक्ष में तात्कालिक तौर पर किसी गंगू तेली से जुड़े होने का ही आभास होता है। दुसरे पक्ष मंे अस्पष्टता के साथ कई सारी किंवदंतियां भी जुड़ी हुई है जो समय के साथ बदली भी है। इस कहावत के पीछे का इतिहास जानने से पहले राजा भोज के संक्षिप्त इतिहास को भी जानना आवश्यक हो जाता है।
मालवा के परमार शासकों में मुंज के बाद भोज महाप्रतापी राजा हुये। इनका राजत्वकाल 1010 ई से 1055 ई तक माना गया है। उदयपुर की प्रशस्ति से इसके राजनैतिक उपलब्धियों की विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है जिसके अनुसार भोज ने चेदिश्वर, इंद्ररथ, तोग्गल, राजा भीम, कर्नाट, लाट व गुर्जर राजाओं तथा तुर्को को पराजित किया। इसने अपने बाहुबल से मालवा को मध्य भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य बना दिया था। हमारे इतिहास में राजा भोज की ख्याति युद्ध विजयों की तुलना में विद्वता तथा विद्या कला के संरक्षक रूप में अधिक है। भोज ने परमार राज्य की राजधानी उज्जैन से हटाकर धारा में स्थानांतरित कर उसे विविध प्रकार से अलंकृत किया। राजा भोज के प्रयासों के कारण ही धारा मध्य भारत का शिक्षा एवं कला का सुप्रसिद्ध केन्द्र बन गया।
भोज ने धारा में सरस्वती कंठाभरण या भोजशाला नामक संस्कृत विद्यालय की स्थापना की। उसने महान मुर्तिकार मंथन की सहायता से इसमें भुरे रंग की स्फटिक पत्थर से वाग्देवी सरस्वती की प्रतिमा का निर्माण करवाया और 1034 ई में इसकी मंदिर में स्थापना करवाई। भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार का प्रतीक चिन्ह वाग्देवी प्रतिमा इसी की प्रतिकृति है। मुस्लिम शासको ने आक्रमण के दौरान इस भोजशाला को ध्वस्त कर दिया गया तथा इसके अवशेषों पर कमाल मौला मस्जिद का निर्माण हुआ।
राजा भोज ने तेलंगाना विजय की स्मृति में लौह स्तंभ (लाट) की स्थापना की। भारत में मेहरौली के बाद यह दुसरी लाट है जो अपने युग की अद्वितीय कृति है। इसकी ख्याति दुर देशों तक फैली हुई है। यह लाट वर्तमान में धार के ईदगाह के पास ही तीन खंडो में सुरक्षित है। इसी लाट के कारण पास वाली मस्जिद को लाट मस्जिद भी कहा जाता है। जहां पर यह स्थापित थी वहां इसके अवशेष अभी भी विद्यमान है।
मालवा के परमार शासकों में मुंज के बाद भोज महाप्रतापी राजा हुये। इनका राजत्वकाल 1010 ई से 1055 ई तक माना गया है। उदयपुर की प्रशस्ति से इसके राजनैतिक उपलब्धियों की विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है जिसके अनुसार भोज ने चेदिश्वर, इंद्ररथ, तोग्गल, राजा भीम, कर्नाट, लाट व गुर्जर राजाओं तथा तुर्को को पराजित किया। इसने अपने बाहुबल से मालवा को मध्य भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य बना दिया था। हमारे इतिहास में राजा भोज की ख्याति युद्ध विजयों की तुलना में विद्वता तथा विद्या कला के संरक्षक रूप में अधिक है। भोज ने परमार राज्य की राजधानी उज्जैन से हटाकर धारा में स्थानांतरित कर उसे विविध प्रकार से अलंकृत किया। राजा भोज के प्रयासों के कारण ही धारा मध्य भारत का शिक्षा एवं कला का सुप्रसिद्ध केन्द्र बन गया।
भोज ने धारा में सरस्वती कंठाभरण या भोजशाला नामक संस्कृत विद्यालय की स्थापना की। उसने महान मुर्तिकार मंथन की सहायता से इसमें भुरे रंग की स्फटिक पत्थर से वाग्देवी सरस्वती की प्रतिमा का निर्माण करवाया और 1034 ई में इसकी मंदिर में स्थापना करवाई। भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार का प्रतीक चिन्ह वाग्देवी प्रतिमा इसी की प्रतिकृति है। मुस्लिम शासको ने आक्रमण के दौरान इस भोजशाला को ध्वस्त कर दिया गया तथा इसके अवशेषों पर कमाल मौला मस्जिद का निर्माण हुआ।
राजा भोज ने तेलंगाना विजय की स्मृति में लौह स्तंभ (लाट) की स्थापना की। भारत में मेहरौली के बाद यह दुसरी लाट है जो अपने युग की अद्वितीय कृति है। इसकी ख्याति दुर देशों तक फैली हुई है। यह लाट वर्तमान में धार के ईदगाह के पास ही तीन खंडो में सुरक्षित है। इसी लाट के कारण पास वाली मस्जिद को लाट मस्जिद भी कहा जाता है। जहां पर यह स्थापित थी वहां इसके अवशेष अभी भी विद्यमान है।
कहां राजा भोज कहां गंगू तेली की इस कहावत की उत्पत्ति का मूल कारण यही लाट है जिसके कारण यह कहावत आज पुरे भारत में प्रचलित हेै। इस लाट से जुड़ी जानकारी जहांगीर द्वारा लिखित तुजूके जहांगीरी में भी मिलती है - जहांगीर लिखता है कि धारानगरी एक बड़ा शहर है। यहीं पर हिन्दुस्तान का बड़ा राजा भोज हुआ। देहली के बादशाह सुल्तान फिरोज के लड़के सुल्तान मोहम्मद के जमाने में उम्मीदशाह गोरी जिसका दुसरा नाम दिलावर खां गोरी था और वह मालवे का हकीम था। किले के बाहर वाले इलाके मे मस्जिद बनाकर लोहे की लाट खड़ी की थी। इसके बाद जब सुल्तान गुजराती ने मालवे पर कब्जा कर लिया तब इसने इस लाट को गुजरात ले जाना चाहा। परन्तु बेऐतिहाती से यह उस समय टूट गई।
कुछ विद्वानों के मुताबिक यह लाट राजा भोज का विजय स्तंभ था। राजा भोज ने दक्षिण के चालुक्यों और त्रिपुरी के कल्चूरियों पर विजय के उपलक्ष्य में यह लाट स्थापित कराई थी। इस लाट के विषय में रोचक किंवदंती जुड़ी हुई है - एक समय में धारा नगरी में गांगली (गांगी) नाम की तेलन रहा करती थी। उसका डील डौल राक्षसी के समान था। यह लाट उसकी तुला के बीच का डंडा था। लाट के पास रखे बड़े बड़े पत्थर उसके वजन करने के बांट थे। उसका घर धार के पास नालछा में था। धार और मांडू के मध्य नालछा के पास एक पहाड़ी उसी के लहंगा को झाड़ने से गिरी हुई रेत से बनी थी। इसी कारण उस पहाड़ी को तेलन टेकरी के नाम से जाना जाता है। इसी तेलन और राजा भोज के लक्ष्य में रखकर लोगों के मध्य यह कहावत चली कि कहां राजा भोज और कहां गांगली तेलन। इस कहावत का तात्पर्य यह था कि तेलन इतने विशाल डील डौल वाली थी फिर भी वह राजा भोज की बराबरी नहीं कर सकती थी। आशय यह है कि सिर्फ शरीर से बलशाली होना ही पर्याप्त नहीं होता वरन बुद्धि से भी तेज होना आवश्यक है।
कल्चूरी गांगेयदेव और तिलंगाने (दक्षिण) के चालुक्य जयसिंह द्वितीय पर राजा भोज की विजय के तार भी इसी लाट से जुड़ते है। इस आधार पर विद्वानों ने इसका नाम गांगेय तिलंगाना लाट अनुमानित किया है। जयसिंह द्वितीय द्वारा धारा पर आक्रमण के दौरान उसके डेरे नालछा के समीप पहाड़ी पर अनुमानित किये गये है जिसके कारण वह पहाड़ी तेलंगानी टेकरी हो गई। इसके बाद वहां के लोग लाट और टेकरी के असली संबंधो को भूल गये और कहां राजा भोज कहां गंगू तेली के कहावत में इन नरेशों के जगहों गांगली तेलन या गंगू तेली का नाम जोड़ दिया। संभव है कि गांगेय का निरादर सुचक नामक गंगू और तेलंगानी का तेलन या तेली हो गया हो।
इस संबंध में एक श्लोक इस कहावत से जुड़ता है। डा प्राणनाथ शुंक ने अपने एक लेख में लिखा है कि भोज की पाठशाला में एक श्लोक खुदा हुआ है जिसका भावार्थ इस प्रकार है -
जिस प्रकार भगवान श्री कृष्ण ने गांगेय नामक शक्तिशाली राक्षस को और पांडव गांगेय (भीष्म) को मारकर संतुष्ट हुये। उसी प्रकार हे भोज! तु भी त्रिपुरी के गांगेय देव और तेलंगाने की राजधानी कल्याणपुर के चालुक्य नरेश को पराजित कर प्रसन्न हुआ। (वीणा अभिषेकांक डा प्राणनाथ )
उक्त अनुमानों के आधार पर कहां राजा भोज कहां गंगू तेली की कहावत गांगेय देव कल्वूरी और दक्षिण के चालुक्य राजा की पराजय से जुड़ी होनी प्रतीत होती है। धार में रखी वह लाट इस कहावत की जीवंत साक्षी है। इसी लाट के कारण यह कहावत कहां राजा भोज कहां गंगू तेली पुरे भारत में प्रचलित है।
संदर्भ:- 1. प्राचीन भारत नवीन सर्वेक्षण - पप्पू सिंह प्रजापत 2018 पृ. 481
2. हजरत मौलाना कमालुददीन चिश्ती रह0 और उनका युग - रामसेवक गर्ग 2005 पृ. 130
3. राजा भोज -श्री युत विश्वेश्वरनाथ रेउ 1932 पृ. 89
आलेख - ओम सोनी दंतेवाड़ा

No comments:
Post a Comment