कुछ जानी सी कुछ पहचानी सी - बाघ की गुफाये.....!
मध्यप्रदेश के धार नगर से 90 किलोमीटर की दुरी पर, विंध्यपर्वत माला की ढलान में बाघ की प्राचीन गुफाये अवस्थित है। बौद्ध को समर्पित ये गुफायें लंबे समय तक लोगों की नजरों से ओझल रही। अब भी बेहद ही कम लोग इसके बारे में जानते है। प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण होने के बावजूद तंग घाटियों एवं धुमावदार रास्तों के कारण यहां जाना बेहद ही कष्टदायक है।
इन्हीं कठिनाईयों के चलते सामान्य पर्यटक तो यहां बेहद ही कम जाते है वहीं विदेशी एवं बौद्ध धर्मावलंबियों में इन गुफाओं को देखने की जिज्ञासा अधिक दिखलाई पड़ती है। इतिहास एवं पुरातत्व प्रेमियों के लिये ये गुफाये किसी सौगात से कम नही है। गुफाओं की वास्तुकला एवं यहां के प्राचीन भित्ती चित्र आज भी आकर्षण का केन्द्र बने हुये है। यहां के भित्ती चित्रों के कारण ये गुफायें भी अजंता की गुफाओं की तरह शोधकर्ताओं एवं कलाप्रेमियों के मध्य लोक प्रिय है।
कहते है कि ये गुफायें बहुत ही लंबे समय तक गुमनामी मे रही जिसके कारण इन गुफाओं में बाघ निवास करने लग गये थे। इन गुफाओं से 3 किलोमीटर पहले बाघ नामक छोटा सा ग्राम है। इस ग्राम की कुल देवी मां बाघेश्वरी है जिसका भव्य मंदिर बाघ ग्राम में बना हुआ है।
ये गुफाये जिस नदी के किनारे पर बनी हुई वह नदी भी बाघिनी नदी के नाम से ही जानी जाती है। यह नदी मां नर्मदा की सहायक नदी है। इस बाघिनी नदी और बाघ ग्राम के कारण ये गुफायें भी बाघ की गुफायें के नाम से ही चर्चित है। नदी के तल से लगभग 100 फीट उंचाई पर बांयी तट पर, चटटानों को काटकर बनाई गई ये गुफायें गुप्तयुगीन वास्तुकला की उत्तम उदाहरण है।
बाघ की गुफाओं का इतिहास भी इन गुफाओं की तरह गुमनाम होने के साथ-साथ बेहद ही रोचक है। भारतीय पुरातत्व विभाग इन गुफाओं के इतिहास पर रोशनी डालते हुये कहता है कि महाराजा सुबंधु के ताम्रपत्र अभिलेख में बौद्ध विहारों के रख रखाव एवं टूटे हुये भागों की मरम्मत हेतु दाशिलकापिली के पाठक में स्थित एक ग्राम के अनुदान के पंजीयन का उल्लेख मिलता है।
इसमें विहार का नाम कल्याण अर्थात कला वीथिका मिलता है। यह अभिलेख महाराजा सुबंधु द्वारा महिष्मति नगर से जारी किया गया था जिसकी पहचान आज नर्मदा नदी के किनारे महेश्वर से की गई है एवं विहार की पहचान बाघ की गुफाओं से की गई है। महाराजा सुबंधु का बड़वानी से प्राप्त एक अन्य ताम्रपत्र में कल्चुरी चेदि वर्ष 167 के आधार प्रोफेसर व्ही व्ही मिराशी ने बाघ ताम्रपत्र अनुदान की तिथी 416 - 417 ई निर्धारित की है।
इन सभी तथ्यों से कुछ नये तथ्य सामने आते है प्रथम की इन गुफाओं का निर्माण पांचवी सदी अनुमानित किया गया है परन्तु ताम्रपत्र में इनके मरम्मत हेतु ग्राम अनुदान का उल्लेख है जिससे स्पष्ट है कि ये गुफायें पांचवी सदी से भी पूर्व में निर्मित हुई होगी। आज हमें इन गुफाओं को बाघ की गुफाओं का संबोधन देते है किन्तु प्राचीन काल में ये गुफायें कल्याण विहार के नाम से ही जानी जाती थी।
भौगोलिक कठिनाईयों एवं मुख्य क्षेत्र से हटकर होने के कारण कई शताब्दियों तक ये गुफायें गुमनामी में रही। 1818 ई में सर्वप्रथम इन गुफाओ का परिचय तथा विवरण लेफ्टिनेंट डैन्गरफील्ड ने बम्बई से प्रकाशित किया । 1951 में इन गुफाओं को राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया था। इनका संरक्षण एवं सुरक्षा का दायित्व भारतीय पुरातत्व विभाग को दिया गया है।
नदी के तट पर रेतीली और भुरभुरी चटटानो से युक्त पहाड़ो का काटकर इन गुफाओं को बनाया गया है। ये गुफायें संख्या में कुल 09 है। पहली गुफा बेहद ही विशाल है। इस गुफा का नाम गृह है। दुसरी गुफा पंाडव गुफा, तीसरी गुफा हाथीखाना, चैथी गुफा रंगमहल और पांचवी गुफा पाठशाला के नाम से जानी जाती है। बाकि की चार गुफायें नष्टप्राय है।
इन गुफाओं का सभाकक्ष बेहद ही विशाल है जिसमें एक साथ सैकड़ो लोग बैठ सकते है। छत को संभाले रखने के लिये विशाल स्तंभ बनाये गये थे। इन स्तंभों का पुरातत्व विभाग ने पुनः जीर्णोद्धार किया हे। भिक्षुओं के साधना एवं निवास के लिये बहुत सी छोटी छोटी कोठरियां बनी हुई है। पहली गृह गुफा में भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा स्थापित है।
गुफा के बाहर भी भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा चटटान को काटकर बनाई गई है किन्तु अब यह क्षरित हो चुकी है। गुफाओं के सुक्ष्म अवलोकन से अनुमान होता है कि गुफा के बाहरी दिवारों पर देवी देवताओं और बौद्ध धर्म से संबंधित प्रतिमायें उकेरी गई थी किन्तु हजारों सालों से पड़ रही मौसम की मार ने उन प्रतिमाओं को क्षरित कर दिया।
गुफाओं की दीवारों पर बौद्ध धर्म से संबंधित अनेक चित्र बने हुये थे किन्तु उनको नष्ट होने से बचाने के लिये चित्रों को मूलत संग्रहालय में सुरक्षित कर लिया गया है। सोलह सौ सालों में बाघिनी नदी में करोड़ो लीटर पानी बह चुका है किन्तु ये चित्र आज भी नवीन से लगते है। इन चित्रों को देखकर अनुभव होता है कि तत्कालीन समय में इस क्षेत्र की चित्रकला कितनी उन्नत थी कि आज भी ये चित्र रत्ती भर भी खराब नहीं हुये।
ये गुफायें भी बेहद ही मनोरम स्थल पर अवस्थित है। नदी में विचरते जलीय पक्षियों के मधुर संगीत एवं नेत्र प्रिय हरियाली के कारण यहां मन रम सा जाता है। बाघ ग्राम में रूककर यहां की ग्रामीण संस्कृति को समझते बुझते इन गुफाओं की चित्रकारी और वास्तुकला का अवलोकन करना बेहद ही रूचिकर है। मैं आजीवन श्री नंदकिशोर प्रजापति श्री जितेन्द्र राष्ट्रवादी श्री कपिल पांचाल और श्री विजय डोडिया का आजीवन ऋणी रहुंगा। इनके सौजन्य से मुझे बाघ की गुफाओं को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
इन चारों मित्रों के साथ बिताया हर एक पल एक स्वर्णिम पल था। मुझे तनिक भी आभास नहीं हुआ कि हम फेेसबुक से निकलकर पहली बार मिले है। इनके आत्मीयपन से ऐसा ही लगा जैसे हम बचपन से पक्के मित्र रहे है। वाकई वह दिन मेरे जीवन का बेहद ही अनमोल दिन था। इसकी स्मृतियां सारी जिंदगी साथ रहेगी। ह्रदय से बहुत बहुत प्रेम और धन्यवाद।
ओम सोनी दंतेवाड़ा





















बहुत सुंदर फोटो ब्लॉग.
ReplyDeleteबहुत सुंदर फोटो ब्लॉग.
ReplyDeleteशुक्रिया सर
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