मेवाड़ का प्राचीन विष्णु प्रासाद
राजस्थान के उदयपुर में घसियार गांव से अंदर की तरफ पहाड़ियो की तराई में किसनियावाड़ या कसनियावाड गांव बसा है। इस गांव में सातवीं शताब्दी में निर्मित विशाल देव प्रासाद अवस्थित हैं। भगवान विष्णु को समर्पित यह देवालय पंचायतन शैली में निर्मित है। लगभग 15 फीट ऊंची जगती पर निर्मित इन देवालयों का जीर्णोद्धार हाल ही में किया गया है।
इसमें मुख्य मंदिर की पीछे के दोनो देवालय आज भी खंडित ही है।मंदिर गर्भगृह अंतराल और मंडप में निर्मित है। मुख्य मंदिर के गर्भगृह में विष्णु जी की भव्य प्रतिमा प्रतिष्ठापित है। अन्य मंदिरो के गर्भगृह रिक्त हैं। ये मंदिर संभवत सूर्य, गणेश, शक्ति और शिव को समर्पित रहे होंगे। मंदिर के पास ही बावड़ी भी बनी हुई है जो ढह गई है।
राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार श्रीकृष्ण जुगनू सर जी इस मंदिर के रहस्यों को उजागर करते हुए लिखते हैं कि राजस्थान के अभिलेखों में जिस प्रासाद के लिए पहली बार 'मन्दिर' शब्द का प्रयोग हुआ है, यह वही मंदिर है। पंचायतन शैली में बना हुआ है यह प्रासाद कुंडेश्वर नामक स्थान का है और यहां से जो अभिलेख मिला है, वह 2 नवंबर, 661 ई. का है और गुहिल नरेश अपराजित के काल का है।
यह वही अपराजित है जिसके नाम पर बाद में अपराजित पृच्छा जैसे शिल्पग्रंथ का प्रणयन हुआ। उसके सेनापति शिवात्मज महाराज वराहसिंह की पत्नी यशोमती थी, उसने यहां नरकासुर के शत्रु श्रीकृष्ण का मंदिर बनाया। वराहसिंह की यशकीर्ति सभी दिशाओं में रही, उस काल में शिलालेखों में उसकी कीर्ति का गान एक सेनापति के पराक्रम का दिग्घोष करती प्रतीत होती है, मगर यह भी बडा सच है इस काल में महिलाएं श्रीकृष्ण की भक्ति के प्रति सचैतन्य थीं जबकि पुरुषवर्ग शिव के प्रति श्रद्धाववनत था।इसकी रचना के आधार पर इसको जहाजाकार या पोताकार मंदिर भी कहा गया है। इसका जीर्णोधार 11वीं सदी में हुआ। सूत्रधारों में केशवदेव भी एक था जिसके हस्ताक्षर एक पत्थर पर उत्कीर्ण हैं।
ओम प्रकाश सोनी



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