Monday, 1 January 2024

चितौड़गढ़ की शान कीर्ति स्तंभ

चितौड़गढ़ की शान कीर्ति स्तंभ

चितौड़गढ़ में स्थित कुम्भा कृत कीर्ति स्तम्भ आज चितौड़ की पहचान बन चुका है। विशाल दुर्ग में यह स्तंभ दूर दूर से ही दिखलाई पड़ता है। इस भव्य स्तंभ की प्रतिष्ठा महाराणा कुम्भा ने वि.स. 1505 माघ सुदी 10 को की थी, किंतु निर्माण कार्य आगे कुछ वर्षो तक और चलता रहा था।

ऐसी मान्यता है कि महाराणा कुम्भा ने मालवा के सुल्तान को विजय कर उसकी स्मृति में कराया था, किंतु यह धारणा गलत है। कीर्ति स्तंभ के नीचे एक शिला मिली है जिसमे कीर्ति स्तंभो के निर्माण का उल्लेख है। इसमें शैव वैष्णव आदि स्तंभों के मान का वर्णन है। यह कुम्भा कृत स्तंभराज का भाग है और शिल्प शास्त्र का उत्कीर्ण एकमात्र प्रमाण है। इससे प्रतीत होता है कि यह वैष्णव स्तंभ था। 

श्री हरमन गोटज की मान्यता है कि यह समिधेश्वर मंदिर का स्तंभ है, यह पूर्णत गलत है क्योंकि इसका निर्माता कुम्भा है, मोकल नही। इसका निर्माण वि. स. 1496 के आसपास शुरू हुआ होगा। वि.स. 1499 तक इसकी दो मंजिले पुरी हो चुकी थी, क्योंकि सूत्रधार जयता और उसके दो पुत्रों का इसमें भगवान समिद्धेश्वर को प्रणाम करने का लघु लेख है।

यह स्तंभ 12 फिट ऊंची और 42 फिट चौड़ी एक चौकोर चौकी पर स्थित है। यह नौ मंजिला ऊंचा है जो नीचे 30 फीट चौड़ा और 122 फिट ऊंचा है। यह स्तंभ हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियों का संग्रहालय प्रतीत होता है। इसके सभी मंजिलों में विभिन्न देवी देवताओं की असंख्य प्रतिमाएं उत्कीर्ण है।

इसकी नवमी मंजिल बिजली गिरने से नष्ट हो गई थी जिसे महाराणा फतेह सिंह ने 1911 में बनाया था।

संदर्भ पुस्तक —चितौड़गढ़ का इतिहास लेखक आदरणीय श्री कृष्ण जुगनू सर

ओम प्रकाश सोनी

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