Friday, 5 January 2024

भूली बिसरी विरासतों का नगर अर्थूना

भूली बिसरी विरासतों का नगर अर्थूना

राजस्थान में बांसवाड़ा और डूंगरपुर का इलाका वागड़ कहलाता है। यह वागड़ क्षेत्र वन्य संपदा और आदिवासी बहुल क्षेत्र है। माही नदी द्वारा उपजाऊ यह क्षेत्र प्राचीन काल में काफी समृद्ध रहा। वह समृद्धि यहां के पाषाण स्थापत्य में दिखलाई पड़ती है। वागड़ में विभिन्न राजवंशों ने अपनी सत्ता की धाक जमायी किंतु स्थापत्य और मूर्तिकला के उच्च कोटि के प्रतिमान स्पष्टत परमार शासकों की देन हैं। मालवा के परमार जब अपनी शक्ति सत्ता के दम पर मध्य भारत के सिर मौर बन चुके थे तब उन्होंने अपने कुटुम्बियो को नए विजित प्रदेशों में स्थापित कर आर्थिक और राजनीतिक जड़े मजबूत करने का कार्य भी किया। 

वागड़ में भी परमारों की एक शाखा स्थापित हुई। मालवा के परमार अधिपति कृष्ण राज उपेंद्र ने (809 ई. से 837 ई.) अपने द्वितीय पुत्र डंबर सिंह को वागड़ इलाके की कमान सौंपी। वागड़ में नवमी सदी में डंबर सिंह द्वारा स्थापित यह परमार शाखा बारहवीं सदी के शुरुआती दशकों तक शासन करती रही। डंबर सिंह के बाद धनिक, चच्च, चंडप कंक और सत्यराज वागड़ के राजा हुए। 

वागड़ के परमार नरेश सत्यराज (995 ई से 1020 ई) मालवपति राजा भोज के समकालीन शासक हुए। सत्यराज के बाद लिंबराज और मंडलीक (1045 ई. से 1070 ई.) वागड़ के राजा बने। फिर चामुंडराज (1070ई से 1100ई) और फिर विजयराज (1100 ई से 1108ई) हुए। विजयराज के बाद गुजरात के चालुक्यो और मेवाड़ के गुहिलो ने परवर्ती परमारों को परास्त कर इस क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया। (परमार शासकों का इतिहास डी सी गांगुली)

वागड़ में वर्तमान अर्थूना ग्राम प्रत्यक्ष तौर पर परमार राजाओं की राजधानी हुआ करती थी। दुरस्थ, उजाड़ और श्री विहीन यह अर्थूना उस काल में बेहद समृद्ध नगरी हुआ करता था जिसे अभिलेखो में उत्थूनक कहा गया है। उस काल के वैभव को दर्शाते हुए आज कई पूर्ण और भग्न देवालय अर्थुना में मौजूद हैं जिनके पाषाण शिलाओ पर परमार शासकों की गौरवगाथाएं लिखी हुई है। 

लगभग एक किलोमीटर की परिधि में फैले छोटे मोटे कुल तीस मंदिरों का समूह यह बताने के लिए काफी है कि परमारों ने अपनी राज लक्ष्मी धर्म और कला को पूर्ण रूप से समर्पित कर दी थी। इन मंदिरों मे धुनी रमाते साधु, हरे भरे पेड़ों की छाया, कृष्ण मय मूर्तियों की सजीवता, शांत चित्त लोगों का देव दर्शन और पुरे इलाके में पसरी एक विरक्ति पूर्ण शांति, यहां ऐसा अनुभव होता है जैसे यहां कोई अबूझ रहस्य है जिसे सिर्फ़ अनुभव ही किया जा सकता है।

ये सारे देवालय शैव और जैन धर्म को समर्पित हैं। यहां लकुलीश मत का भी प्रभाव रहा है। ये मंदिर हनुमान गढ़ी, कंधार डेरा इन दोनो समूहों में विभक्त है। सभी मंदिरों में मंडलेश्वर शिव मंदिर सबसे प्राचीन माना गया है जिसका निर्माण 1080 ईस्वी में परमार राजा चामुंडराज ने अपने पिता मंडलीक की स्मृति में कराया था। हनुमान गढ़ी में प्राचीन गढ़ का द्वार मात्र शेष है जिसमे सोमेश्वर शिव मन्दिर हनुमान मन्दिर, बावड़ी और अन्य कई लघु मन्दिर अवस्थित है। 

सोमेश्वर मन्दिर सबसे सुरक्षित अवस्था में है। यह भव्य देवालय गर्भगृह, अंतराल और स्तंभों पर आधारित गोलाकार मंडप युक्त है। गर्भगृह का शिखर उरु शृंगो और मण्डप संवरना शैली में निर्मित आकर्षक है। मंडप में नंदी की प्रतिमा के नयन कमल पुष्प सदृश्य मोहक है। इसके पास एक हनुमान मन्दिर है जो परमार शासक विजयराज द्वारा 1108 ईस्वी में बनवाया गया था। सामने एक कनफड़े साधु का मन्दिर है, पास ही अन्य ध्वस्त शिव मन्दिर है जिसका शिवलिंग भव्य, सुगठित एवम आकर्षक है। 

गढ़ी से बाहर एवम टीले के पीछे तालाब के आसपास कई मंदिर दूर दूर तक फैले हुए हैं। इन मंदिरो में जैन मंदिर, शिव मंदिर, मुख्य है। कुछ मंदिर मुस्लिम शासकों द्वारा आक्रमण कर पुरी तरह से ध्वस्त कर दिए गए हैं। ये मंदिर अपने आकार प्रकार में बेहद ही विशाल रहें, इनकी जगती मात्र ही दो दो मंजिल ऊंची रही। इन जगती के चारों तरफ लगी चौंसठ योगिनियों की प्रतिमाओ से अनुमानित होता है कि तंत्र साधना में इनका कितना महत्व रहा। पंचायतन शैली के इन देवालयों के आज सिर्फ अवशेष बिखरे पड़े हैं जो कभी मंत्रो से गुंजायमान रहें। इनके आकर्षक तोरण द्वार और काले पत्थरों से बनी विभिन्न देव प्रतिमाएं परमार कला के उच्च सोपानों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इनमे कई मंदिर टीलो में समाए हुए थे जिनकी खुदाई कर फिर से प्रकाश में लाया गया। यहां मंदिरों में लगी असंख्य प्रतिमाएं परमार युगीन मूर्तिकला के अध्ययन के लिए सबसे उपयुक्त है। अर्थुना एवम इस पुरे वागड़ इलाके में माही के किनारे गांवो में परमार शासकों के बनाए कई देवालय है जो आज भी अनजाने से है। कभी बेहद समृद्ध नगरी रही अर्थूना आज श्री हीन है, जन शून्य है, आवागमन के उचित साधन नही है, जन सामान्य के नजरो से कहीं दूर है, फिर भी यहां परमार इतिहास की रोचकता है, शैव साधुओं की जलती धुनी है, घने जंगलों की बसाहट है, माही की शांत जलधाराएं है, और भी बहुत से अबूझ रहस्य है जो अर्थूना को अर्थूना बनाते हैं।

ओम प्रकाश सोनी

असिस्टेंट प्रोफेसर ( इतिहास)

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