पद्मिनी कथानक की ऐतिहासिकता
चितौड़ गढ़ में रानी पद्मिनी का महल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। महल अधिक पुराना प्रतीत नहीं होता है। एक विशाल तालाब के मध्य होने के कारण महल की सुंदरता देखते ही बनती है। यह महल पद्मिनी का महल बताया जाता है। चितौड़ की रानी पद्मिनी का कथानक भारतीय इतिहास का चर्चित विषय रहा है।जनमानस में चितौड़गढ़ महारावल रतनसिंह , रानी पद्मिनी और अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण की तरह तरह की भ्रांतियां फैली हुई है। चितौड़ के महारावल रतनसिंह की रानी का नाम पद्मिनी बताया जाता है। उसकी सुंदरता पर मुग्ध होकर राघव चेतन नाम के तांत्रिक की सहायता से अलाउद्दीन खिलजी ने चितौड़गढ़ पर आक्रमण किया था। इस कथानक में कई विद्वानों को संदेह है। इससे जुड़े मुख्य ऐतिहासिक पात्रों पर प्रकाश डालना आवश्यक है।
(1) रतन सिंह
रतन सिंह समरसिंह के बाद मेवाड़ की गद्दी पर बैठा था। यह समरसिंह का दत्तक पुत्र था। सत्रहवी सदी की रचना अमरकाव्य वंशावली में इसको अधिक स्पष्ट किया गया है। इसका सारा काम काज लक्ष्मण सिंह ही देखता था। रतनसिंह के काल एक अभिलेख दरीबा से मिला है जो सन 1303 का है, अभिलेख अलाउद्दीन के आक्रमण से चार दिन पूर्व का है। अमीर खुसरो उस समय स्वयं आक्रमणकारी सेना में उपस्थित था। उसने लिखा कि राजा भाग खड़ा हुआ था किंतु पीछे शरण में आ जाने से छोड़ दिया गया था। अमीर खुसरो या इसामी लिखित तवारिखो में इन घटनाओं का अत्यंत संक्षिप्त वर्णन है। मात्र कुछ पंक्तियों में ही आक्रमण का उल्लेख है। साथ ही ये सुलतान के आश्रित लेखक द्वारा लिखी गई है अतएव एकपक्षीय है। इसमें पद्मिनी के कथानक की कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है।
वि.स. 1393 में जैन ग्रंथ नाभिनंदन जीनोद्धार प्रबंध लिखा गया था। इसमें प्रसंग वश सुलतान की मेवाड़ विजय और चितौड़ के शासक को बंदी बनाने का उल्लेख भी है। इस वर्णन से यह प्रतीत होता है कि सुलतान रतन सिंह को बंदी बनाकर अन्य स्थान पर अवश्य ले गया था। इससे परोक्ष रूप से सुल्तान के महल में आतिथ्य पाने और उसको बंदी बनाए जाने की घटना पुष्ट होती है।
मेवाड़ की ख्याते, गोरा बादल चौपाई आदि के वृतांत से प्रतीत होता है कि सुलतान से राजा को छुड़ाने के लिए गोरा बादल ने प्रयत्न किया था और राजा को वे सकुशल चितौड़ ले आए थे। सुल्तान ने इस बार अधिक तैयारी और भीषणता से आक्रमण किया। राजपूतो की साधन सामग्री दुर्ग पर पहले ही समाप्त हो गई थी। अतेव वे लोग अंतिम युद्ध के लिए तैयार हो गए। युद्ध में रतनसिंह की पहले ही मृत्यु हो गई बाद में लक्ष्मण सिंह अपने पुत्रों सहित काम आया।
(2) पद्मावत का वर्णन
मलिक मोहम्मद जायसी के 1538 ईस्वी के पद्मावत के कतिपय वर्णन को लेकर समस्त पद्मिनी कथानक में बड़ी भ्रांति पैदा हो गई है। उदाहरनार्थ इसे सिंहल के राजा की पुत्री मानना। उन्होंने अपने ग्रंथ में यह भी निर्देश दिया है कि यह ग्रंथ आध्यात्मिक प्रतीकों पर आधारित है। अतेव कई लेखकों ने इस कथानक को जायसी की कल्पना मात्र माना है। यह सत्य है कि पद्मावत एक काव्य ग्रंथ है। इसमें इतिहास के साथ साथ कल्पना का होना संभावित है।
इस ग्रंथ पर कई पूर्ववर्ती काव्यों का प्रभाव स्पष्ट है। कल्कि पुराण, भविष्य पुराण, आनंद रामायण, पदम पुराण में भी यह कथा पहले से मौजूद रही है। इन ग्रंथों में समुद्र पार देशों की राजकुमारियो से विवाह करने का उल्लेख मिलता है।
यहां प्रश्न यह उठता है कि रतनसिंह का शासन काल एक वर्ष का ही रहता है तब वह किस प्रकार पद्मिनी को प्राप्त करने के लिए यह सारे प्रयास कर सकता है जैसे कि पद्मिनी संबंधी कथानको में उल्लेखित है। अतेव यही कह सकते हैं कि कथानक में अधिक रस लाने के लिए इतिहास के साथ साथ कल्पना की गई है।
मेवाड़ में पद्मिनी की कथा जायसी से ली गई है ऐसा मानना एक पक्षीय है। राजस्थान के जैन भंडारों में इस संबंध में विशाल साहित्य उपलब्ध हैं। छिताई चरित में जो जायसी के पूर्व 1378 में लिखा जा चुका था उसमे पद्मिनी का उल्लेख है।
मेवाड़ की ख्यातो में ही जायसी से उक्त कथानक लेकर अबुल फजल ने उस समय की प्रचलित सारी कथाओं को बड़ी कुशलता से अंकित किया है। इसने मेवाड़ की रानी का नाम स्पष्टता पद्मिनी लिखा है।
(3) राघव चेतन
पद्मिनी कथानक का एक मुख्य पात्र राघव चेतन है। वह पद्मिनी के सौंदर्य पर मुग्ध हो जाता है और उसको प्राप्त करने के लिए सुल्तान को प्रोत्साहित करता है। यह एक ऐतिहासिक व्यक्ति है। मोहम्मद तुगलक के समय के कई वृतांतो में उसका उल्लेख है। जिन प्रभसूरी प्रबंध से पता चलता है कि वह बादशाह द्वारा सम्मानित था। कई विधाओं में पारंगत एवम तंत्र मंत्र और साधनाएं भी जानता था। यह प्रारंभ में चितौड़ में रहा था और वहां से दिल्ली गया प्रतीत होता है। दिल्ली में बादशाहो द्वारा सम्मानित होने से प्रकट होता है कि यह एक प्रभावशाली व्यक्ति था।
कुंभलगढ़ प्रशस्ति में प्रथम बार मेवाड़ का विस्तृत इतिहास लिखने का प्रयास किया गया था। इसमें पद्मिनी का उल्लेख नहीं है। रतन सिंह का भी नाम मात्र उल्लेख है। इस संबंध में स्पष्ट है कि उक्त प्रशस्ति में रानियों के नाम नहीं है।सुल्तान को रानी का मुंह कांच में बतलाना, गोरा बादल द्वारा वापस राजा को धोखे से बंदीगृह से मुक्ति दिलाना आदि घटनाएं मध्यकालीन राजपूत भावना के विरुद्ध है।उस युग में नारी की शुद्धि को कुल की शुद्धि माना जाता था। इसी कारण बड़े बड़े जौहर हुए हैं। इसमें केवल यही अंकित है कि रतनसिंह के मरने के बाद लक्ष्मण सिंह ने दुर्ग की रक्षा का भार अपने कंधो पर संभाला और लड़ता लड़ता अपने पुत्रों सहित काम आया।
उक्त प्रसंगों को दृष्टिगत रखते हुए यह मानना पड़ेगा कि कोई पद्मिनी अवश्य चितौड़ में ही हुई थी। इसके महल आज भी यथावत विद्यमान है। महाराणा सज्जन सिंह के बहिडा में उन पर किवाड़ लगवाने का जिक्र है। यह अवश्य है कि इसका उल्लेख सम सामयिक ग्रंथो में नहीं हुआ है। मेवाड़ की ऐतिहासिक साधन सामग्री दीर्घ कालीन युद्धों के कारण बहुत अस्त व्यस्त हो चुकी है।
संदर्भ पुस्तक : — चितौड़गढ़ का इतिहास —आदरणीय डा श्री कृष्ण जुगनू सर, पेज क्रमांक 37 से 45।
ओम प्रकाश सोनी





No comments:
Post a Comment