चितौड़गढ़ किले का प्राचीन कालिका माता मंदिर
चितौड़गढ़ किले में कालिका माता का प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर एक बेहद ऊंचे अधिष्ठान पर बना है। यह मंदिर मूल रूप से सूर्य मंदिर था जो कि आठवी नवमी सदी में निर्मित माना गया है। तुर्क आक्रमणकारियो ने इस मंदिर की मूल प्रतिमा को खण्डित कर दिया था। लंबे समय तक यह मंदिर वीराने में रहा। कहा जाता है कि चौदहवीं शताब्दी में शाक्त साधुओं ने इसमें देवी भद्रकाली की प्रतिमा स्थापित की तब से यह मंदिर कालिका माता मंदिर के नाम से विख्यात हो गया है।
इस मंदिर को एक विशाल परकोटे से सुरक्षित किया गया है। मंदिर का मूल स्वरूप में काफी परिवर्तन हो चुका है।मंदिर बाहर से भले ही साधारण सा है किंतु मंदिर के गर्भगृह एवम मंडप में दुर्लभ मूर्तिशिल्प सज्जित है।गर्भगृह के मुख्य द्वार पर सप्ताश्व रथ सवार सूर्य की बेहद कलात्मक प्रतिमा बनी हुई है।
बाईं ओर सपत्नीक विष्णु और दाईं ओर शिव पार्वती की प्रतिमा लगी हुई है। इसके अतिरिक्त मंदिर में अश्विनी कुमार, इंद्र, अग्नि, सूर्य, यम, वरुण आदि की मूर्तियां भी है।मंदिर के बाहर की ताको में आसनस्थ चतुर्बाहु लकुलीश , शिव पार्वती, वराह और समुद्र मंथन के फलक लगे हुए हैं।
संदर्भ पुस्तक :— चितौड़गढ़ का इतिहास —आदरणीय डा श्री कृष्ण जुगनू सर, पृष्ट 163
बहुत सुंदर और सुगढ़ चित्र खींचे हैं...चिरायु रहें।
यह मंदिर बहुत कमाल लिए है... उस दौर का साक्षी है जबकि शासकों ने माना कि राजवंश के लिए मार्तंड जैसी प्रभा, प्रभाव हो तो प्रजा का प्रिय रंजन राजा हुआ जा सकता है ... उन्होंने सूर्य की आराधना की!( जिस जिस देवता का गुण चाहिए, उसको पाने के लिए उसके प्रिय हों और फिर प्रतिष्ठा करें) प्रतिहार सूर्य के विरूद को धारण करने वाले हुए... लाल पाषाण से यह मंदिर बना क्योंकि प्रत्युष वेला का अरुण रंग होता है... अब भी वह पत्थर इसमें दिखाई देता है।
इसके संरक्षण और दुर्ग पर अनेक आस्थाओं के विकास के काल में इसमें समुद्र मंथन, वराह ( वैष्णव मत) लकुलीश ( पशुपत मत प्रभाव)शिव और पार्वती ( शैव मत में शाक्त संयोग)आदि दिखाई देता है... परिक्रमा पथ में लगाई ये प्रतिमाएं उन सबकी परिचायक है। इनकी कहानियांभी कही जाती थीं : शिव ने अपने दंड पर इस मंदिर को उठा रखा है (लकुलीश)... पक्ष विपक्ष के झगड़े को मिटाने कोयह मंदिर बनाया ( समुद्र मंथन) आदि।
वस्तुत: यह सूर्य मंदिर स्थापत्य और शिल्प के सुंदर समन्वय का लावण्यमय रूपक है। संधार प्रसाद, नवग्रह, दिकपाल, गंगा यमुना और कोष्ठकों में सूर्य की रथारूढ मूर्तियां... बहुत कुशल कलाकारों की देन है। परिक्रमा पथ में सूत्रधारों के नाम पूर्वनागरी में हैं।
श्री कृष्ण जुगनू सर 🙏




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