Monday, 1 January 2024

चितौड़गढ़ में कुम्भा कालीन मूर्तियां

चितौड़गढ़ में कुम्भा कालीन मूर्तियां

अमर टांकी यानी अथक कारीगरी। यह विशेषण महाराणा कुम्भा के काल के लिए प्रयोग में लाया जाता है। इस काल में शिल्प शास्त्र का बड़ा उपयोग हुआ और हर तरह की मूर्तियां बनाकर उनके लक्षणों को सुरक्षित किया गया। नवीन प्रयोग से अधिक ध्यान परंपरा के पोषण पर रखा गया। 

ये सब प्रतिमाएं महाराणा कुम्भा कालीन है। सबके नीचे सूत्रधार जैतो और उसके पुत्रों की लिपि में संबंधित देवता के नाम लिखे हैं। ये नाम वैसे ही हैं जैसे कुम्भाकालीन कीर्तिस्तंभ की मूर्तियों पर हैं। मैंने यहां लगी एक एक प्रतिमा के अध्ययन से पाया है कि ये उसी काल की वे प्रतिमाएं हैं जो काम नहीं आ पाई अथवा हमलें में तोड़ फोड़ की शिकार होकर पड़ी रहीं। 

ये महल महाराणा सज्जन सिंह (1874 से 84 ई.) ने बनवाए और उदयपुर की पिछोला झील में महल तथा सलूंबर के सेरिंग तालाब पर महल की परंपरा में बनवाए। मूर्तियां कलात्मक होने से उनका उपयोग जलाशय की भित्ति में किया गया ताकि यह तालाब तीर्थ तुल्य हो जाए... अन्यथा यह गर्त स्थल सूर्यमंदिर के सामने की ओर उत्तर से दक्षिण लंबकाय एक ही जलस्रोत था। 

साभार श्री कृष्ण जुगनू सर 🙏

पद्मिनी महल चितौड़ के तालाब में लगी देवी देवताओं की मूर्तियां।

इनमे उमा महेश्वर, सूर्य, वरुण, वैष्णवी, शिव, सरस्वती, वामन की मुख्य प्रतिमाएं हैं।

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