Saturday, 6 January 2024

एरन का गुप्तकालीन गरुड़ स्तंभ

एरन का गुप्तकालीन गरुड़ स्तंभ

आज आषाढ़ शुक्ल द्वादशी और त्रयोदशी दोनों ही है किंतु द्वादशी की यह तिथि ऐतिहासिक रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण है, वह इसलिए,  क्योंकि आज से 1538 वर्ष पूर्व आषाढ़ शुक्ल द्वादशी सन 484 ईस्वी के दिन एरीकिण (ऐरन जिला सागर मध्यप्रदेश) में यह गरुड़ खम्ब स्थापित किया गया था।

उस समय गुप्त अधिपति बुधगुप्त हुआ करते थे। इनके अधीनस्थ मालवा में राजा सुरश्मिचंद्र में राज कर रहे थे और एरीकिण (ऐरन) विषय में विषयपति के रूप में मातृविष्णु और धन्य विष्णु नियुक्त थे। यह वही धन्यविष्णु था जब गुप्त,  हूण शासक तोरमाण द्वारा पराजित कर दिए और तोरमाण ने मध्य भारत पर कब्जा किया तो उसकी अधीनता स्वीकार कर ली और वराह की विशाल प्रतिमा बनवाई। उस समय इसके भाई मातृविष्णु की मृत्यु हो चुकी थी । 

इन्ही दोनो भाई मातृविष्णु और धन्यविष्णु ने आषाढ़ शुक्ल द्वादशी सन 484 ईस्वी वार गुरुवार को यह गरुड़ स्तंभ स्थापित कराया और इस स्तंभ में भी वराह प्रतिमा अभिलेख की तरह ही अपने पूर्वजों का गुणगान उत्कीर्ण कराया। यह लेख 1838 में कैप्टन टी एस बर्ट द्वारा खोजा गया था और जनरल कनिंघम ने इसे अंतिम रूप से संशोधन उपरांत प्रकाशित कराया था।

यह गरुड़ स्तंभ फीट 48 ऊंचा है। ऊपर चौकी पर चारों तरफ चार सिंह निर्मित है। उसके ऊपर दोनो ही तरफ नाग पकड़े हुए गरुड़ की प्रतिमा स्थापित है। दोनो ही गरुड़ प्रतिमाएं चक्र से विभाजित है जो कि खंडित है।यह गरुड़ खम्ब गुप्त सम्राटो का राजकीय चिन्ह है। साथ ही नाग पकड़े गरुड़ नागों पर गुप्त सम्राटो की विजय का प्रतीक है। गुप्तों से पूर्व एरन पर नाग राजाओं का शासन था। यहां से गणपति नाग और रवि नाग की कई मुद्राएं भी प्राप्त हो चुकी है।

इस गरुड़ स्तंभ में और भी अन्य छोटे लेख खुदे हुए हैं। एक लेख में कुलयजगुप्तवांग कनोत्कीरणम अंकित है जो कि विद्वान कुलयजगुप्त द्वारा बुधगुप्त के लेख उत्कीर्ण करने की सूचना है। एक अन्य अभिलेख में तोरमाण के किसी सामंत का नाम मात्र उल्लेखित है।

ओमप्रकाश सोनी

असिस्टेंट प्रोफेसर (इतिहास)

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