चितौड़गढ़ दुर्ग का अद्भुतनाथ जी मंदिर
चितौड़गढ़ दुर्ग में किनारे की तरफ एक मध्यकालीन स्थापत्य में निर्मित एक ऐतिहासिक महत्व का देवालय है। पश्चिमाभिमुख मंदिर का शिखर और सभामंडप खंडित है। मंदिर में तीन तरफ से प्रवेश द्वार है। गर्भगृह में त्रिमुखी शिव की भव्य प्रतिमा स्थापित है।
इसकी विकरालता के कारण इस मंदिर का नाम अद्भुतनाथ जी का मंदिर पड़ा। यह प्रतिमा चितौड़गढ़ किले में ही निर्मित समधिश्वर शिव मंदिर की मुख्य प्रतिमा की तरह ही है। गर्भगृह में प्रवेश हेतू चार सीढ़ियां नीचे उतरकर जाना होता है।
बाहर की भित्तियो पर कई प्रतिमाएं उत्कीर्ण है। उमा महेश्वर, नटराज, शिव, ब्रम्हा, भैरव, नर्तिकियो आदि की मूर्तियां सज्जित है।यह मंदिर विक्रम संवत 1546 — 47 तदनुसार 1483 ईस्वी में महाराणा रायमल के काल में निर्मित है। यह मंदिर थोड़ी ऊंची जगह पर निर्मित है जिसके कारण दुर्ग में फैली हरियाली, कीर्तिस्तंभ, कुंभस्वामी मंदिर के सुंदर दृश्य दिखलाई पड़ते हैं।
डॉ श्री कृष्ण जुगनू सर के अनुसार इस मंदिर का शिल्पी हरदास था जिसका नाम एक मूर्ति के नीचे खुदा है । जुगनू जी के अनुसार ये मंदिर अपूर्ण रह गया था। मंदिर का निर्माण महाराणा रायमल के समय प्रारम्भ हुवा किन्तु महाराणा सांगा के बाबर के साथ युद्ध मे संलिप्त हो जाने के कारण तथा बाद में मेवाड़ की निरंतर अस्थिर राजनीति स्थिति के कारण मंदिर निर्माण अधूरा ही रह गया।
संदर्भ पुस्तक चितौड़गढ़ का इतिहास आदरणीय डॉ श्री कृष्ण जुगनू सर पृष्ट 166
ओम प्रकाश सोनी



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