चित्तौड़गढ़ के मौर्य (मोरी) राजाओं का इतिहास
राजस्थान के अंतिम मौर्य या मरी या मोरी राजाओं का उल्लेख कोटा के कंसवा और चितौड़ के मान मोरी के लेख में है। मान मौर्य का मूल लेख नष्ट हो गया है किंतु कर्नल टाड ने इसका जो अनुवाद किया, वह उपलब्ध हैं। इस लेख में चार राजाओं का उल्लेख है 1. महेश्वर 2.भीम 3. भोज और 4. मान।
महेश्वर को शत्रुओं का विनाश करने वाला वर्णित किया गया है। भीम को अवंतिपुरी का शासक बतलाया है उसके लिए लिखा है कि वह कारागृह में पड़े शत्रुओं की उन चंद्रवदनियो के हृदय में बसता था, जिनके होंठो पर उनके पतियों के दंतक्षत अभी बने हुए थे। भोज ने युद्ध में हस्ती का मस्तिष्क विदिर्ण किया था। मान उसका पुत्र था। उसने पुठौली के पास मान सरोवर का निर्माण कराया था।
मेवाड़ की ख्यातो में चित्रांगद मोरी का भी उल्लेख मिलता है। इसे बड़ा प्रबल वर्णित किया है, किंतु 18 वी सदी में लिखी ख्यातो में किया गया वर्णन ऐतिहासिक महत्व का नहीं है। उदाहरण के लिए राजरूपक में इसके लिए लिखा है कि मेवाड़, मालवा, सिंधु, सौवीर, सपादलक्ष, सोरठ, गुजरात, कच्छ, आदि देश जीते, जो अतिश्योक्ति है। जैन ग्रंथो में वर्णित हैं कि कन्नौज के राजा संभलीश ने इसे हराकर चितौड़ जीत लिया था, जिसे उसके पुत्र को लौटा दिया। डा दशरथ शर्मा इसे चौहान राजा शंभरीष मानते हैं। चित्रांगद मौर्य के मुख्य निम्नांकित कार्य है
1. चितौड़ दुर्ग का निर्माण, संभवत इसे इसने सामरिक महत्व का बनाया था। कीर्ति स्तंभ के पास एक द्वार पर इसका नाम अंकित है।
2. चित्रांगद तालाब का निर्माण। वि स 1344 के अभिलेख के शिलालेख में जो यद्यपि बाद का है, इस घटना का उल्लेख है।
भीम के समय तक इन राजाओं का अधिकार अवंति तक रहा प्रतीत होता है। संभवत इंद्रगढ़ के राठौड़ राजा नन्न से उसका संघर्ष हुआ था और उसके फलस्वरूप उसे मालवा छोड़ना पड़ा हो। उसका पुत्र मान मोरी का हाल ही में चितौड़ के शंकर घट्टा से मिला है। लगभग इसी समय अरब आक्रमण हुआ था। आक्रमणकारी बढ़ते हुए उज्जैन तक चले गए थे। नागभट्ट ने उन्हें हरा दिया और उज्जैन के भू भाग पर अधिकार कर लिया। चितौड़ के मौर्यों को संभवत सबसे बड़ा धक्का लगा। प्रतिहारों का अधिकार उज्जैन से कुछ समय संभवत हट गया। राष्ट्रकूट दांतिदुर्ग ने उसे जीत कर वहां हिरण्यगर्भ यज्ञ किया। चितौड़ से वि संवत 811 का एक लेख कुकड़ेश्वर का मिला है। संभवत वह मौर्य राजा ही था। कोटा के मौर्य राजा धवल या धवलप्प देव इसका क्या संबंध था, स्पष्ट नहीं हो सका है।
हेनसांग के आगमन तक चितौड़ नाम प्रचलित हो चुका था। उसके विवरण से ज्ञात होता है कि 641 ईस्वी तक मौर्य यहां नही आए थे। यहां के राजा को वह ब्राह्मण बताता है।
संदर्भ पुस्तक।।1. चितौड़गढ़ का इतिहास लेखक आदरणीय श्री कृष्ण जुगनू सर पृष्ठ 25।।
ओम प्रकाश सोनी


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