भानुगुप्त का ऐरन अभिलेख –सती प्रथा का प्रथम अभिलेख साक्ष्य
भानुगुप्त का एरन अभिलेख पूरे विश्व में भारतीय इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण अभिलेख है क्योंकि , यह अभिलेख भारत में सती प्रथा का यह पहला अभिलेखीय साक्ष्य माना जाता है, और यह ऐतिहासिक लेखों में भानुगुप्त का ऐरन अभिलेख के नाम से ही लिखा जाता है।यह एरन में ही बस्ती से दूर खेतों में एक टीले पर पेड़ो के नीचे है।अभिलेख एक पांच फीट के स्तम्भ पर खुदा हुआ है। यह लेख 1874 —75 में जनरल कनिंघम द्वारा खोजा गया था।
इस लेख की भाषा संस्कृत और लिपि ब्राम्ही है। यह गद्य और पद्य दोनों में रचा गया है। लेख में श्रावण कृष्ण सप्तमी गुप्त संवत 191 की तिथि अंकित है। तदनुसार इसे 510 ईस्वी का माना गया है।इस अभिलेख में वर्णित है कि 510 ईस्वी में गुप्त राजा भानुगुप्त के सेनापति गोपराज एरन में शत्रु पक्ष से युद्ध करने के लिए आए और अद्वितीय वीरता प्रदर्शित करते हुए वीर गति को प्राप्त हुए, तब उनकी प्रिय पत्नी भी उनके साथ अग्नि में चली गई अर्थात सती हो गई। इसमें भानुगुप्त की तुलना अर्जुन से की गई वहीं गोपराज को शरभराज का दोहित्र कहा गया है।
इस अभिलेख में पूर्व से ही शक महाक्षत्रप श्रीधरवर्मा का लेख भी खुदा हुआ था। इस लेख की खोज 1950—51 में भारतीय पुरातत्व विभाग के अधीक्षक श्री कृष्णदेव ने की थी। अभिलेख पर प्राकृत का प्रभाव है।इस अभिलेख में लिखा है शकों के महाक्षत्रप राजा शकनंदी के धर्मविजयी पुत्र श्रीधरवर्मा के राज्यकाल के सत्ताईसवे वर्ष में वैजयिक संवत्सर में उसके पुण्य वृद्धि के लिए एरीकिन अधिष्ठान में नारायण स्वामी के तीर्थ और नदी तक जानें के लिए सीढ़ियों के निर्माण उपरांत उसके सेनापति सत्य नाग जो कि महाराष्ट्र का निवासी था उसने यष्टि (स्मृति स्तंभ) स्थापित किया।
शक क्षत्रप श्रीधर वर्मा का एक अन्य अभिलेख सांची के कान्हाखेड़ा से भी मिला है। शक महाक्षत्रप श्रीधर वर्मा का राजत्वकाल 339 ईस्वी से 368 ईस्वी तक माना गया है। समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में एरिकिन के इसी शक क्षत्रप को पराजित किए जाने का संकेत है।
इस अभिलेख को वर्तमान में जीर्णोद्धार कर एक शिवलिंग की तरह प्रतिष्ठापित कर दिया गया है। यह मूल रूप से यष्टि (स्मृति स्तंभ) है जिस पर चौथी सदी में सबसे पहले श्रीधर वर्मा के नाग सेनापति सत्यनाग ने स्थापित कराया और उसी पर छठवीं सदी में भानुगुप्त के सेनापति गोपराज के वीर गति और उसकी पत्नी द्वारा अग्नि प्रवेश का प्रसिद्ध लेख अंकित किया गया।
ओमप्रकाश सोनी
असिस्टेंट प्रोफेसर (इतिहास)




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